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क्या 'डीज़ल डिप्लोमेसी' सुधार सकती है बांग्लादेश से भारत के संबंध? क्या कहते हैं एक्सपर्ट
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
ईरान पर इसराइल-अमेरिका के हमले के बाद मध्य-पूर्व में छिड़ी जंग की वजह से दुनिया के कई देशों की तरह बांग्लादेश में भी ईंधन का संकट पैदा हो गया है.
देश में पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लाइनें लग रही हैं और लोग शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें ज़रूरत के मुताबिक तेल नहीं दिया जा रहा है.
इस सबके बीच भारत से बांग्लादेश को 5000 मीट्रिक टन डीज़ल की आपूर्ति की गई है.
बांग्लादेश ने ऊर्जा संकट में मदद के लिए भारत से 50,000 मीट्रिक टन डीज़ल और देने की मांग की है लेकिन अभी भारत की ओर से इस पर कोई जवाब नहीं दिया गया है.
बांग्लादेश की बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) के साथ भारत के संबंध पारंपरिक रूप से अच्छे नहीं रहे हैं हालांकि फरवरी में तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी की सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने उसका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था.
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लेकिन कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि भारत को इस संकट के समय में बांग्लादेश की तेल, ख़ासकर डीज़ल, की आपूर्ति कर उसकी मदद करनी चाहिए क्योंकि वह चीन से भी मदद मांग चुका है.
उनका यह भी कहना है कि चीन भारत के पड़ोस में अपनी स्थिति मज़बूत करने का कोई मौका शायद ही गंवाएगा.
भारत, चीन दोनों से मांगी मदद
बांग्लादेश ने संकट से निपटने के लिए भारत को पत्र लिखकर अतिरिक्त 50,000 मीट्रिक टन डीज़ल की आपूर्ति करने की गुज़ारिश की है. ढाका में भारतीय उच्चायुक्त प्रणॉय कुमार वर्मा ने 11 मार्च को बांग्लादेश के विद्युत, ऊर्जा और खनिज संसाधन मंत्री इकबाल हसन महमूद टुकू से मुलाकात की थी.
इसके बाद टुकू ने कहा, "उन्होंने कहा कि वे हमारे प्रस्ताव की समीक्षा करेंगे और निर्णय लेंगे. अभी वे खुद संकट में हैं."
बांग्लादेश पेट्रोलियम निगम (बीपीसी) के अनुसार बीपीसी और भारत की सरकारी स्वामित्व वाली नुमालीगढ़ रिफाइनरी लिमिटेड के बीच हुए एक पूर्व समझौते के तहत बीते बुधवार को बांग्लादेश में 5,000 टन डीज़ल पहुंचा.
इस बीच, बांग्लादेश ने दीर्घकालिक अनुबंधों के तहत ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में चीन से सहायता भी मांगी है. यह भी बताया गया है कि सरकार के ऊर्जा मंत्री और राज्य मंत्री ने हाल ही में ढाका में चीनी राजदूत याओ वेन के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की.
टुकु का कहना है कि सरकार ऊर्जा आयात के लिए वैकल्पिक स्रोत वाले देशों के साथ बातचीत कर रही है.
'पता नहीं युद्ध कितना लंबा चलेगा'
मौजूदा स्थितियों में बांग्लादेश के अलावा भारत के पड़ोसी देशों श्रीलंका, और मालदीव ने भी अतिरिक्त तेल की आपूर्ति की मांग की है. भारत ने कहा है कि वह अपनी ज़रूरतों और उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए इन मांगों पर विचार कर रहा है.
भारत के महत्वपूर्ण पड़ोसी देश बांग्लादेश में भारत को पसंद न करने वाली पार्टी की सरकार बनने के बाद राजनीतिक हलकों में यह मांग भी की जा रही है कि भारत को इस मौके का फ़ायदा उठाकर 'डीज़ल डिप्लोमेसी' के तहत बांग्लादेश को कुछ अतिरिक्त मदद करनी चाहिए ताकि उससे संबंध बेहतर किए जा सकें.
इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर भारत के पूर्व सचिव शशांक ने बीबीसी संवाददाता चंदन कुमार जजवाड़े से कहा, "भारत की हमेशा 'नेबरहुड फ़र्स्ट' या पड़ोसियों को प्राथमिकता देने की नीति रही है और जो भी हमारे लिए संभव रहा है, वह मदद हम करते रहे हैं... वैक्सीन मैत्री उसका उदाहरण है. लेकिन अभी वह समय नहीं है."
"लेकिन अभी हमें ख़ुद ही मालूम नहीं है कि युद्ध का क्या परिणाम होगा, यह कितनी देर तक चलेगा... हमारे यहां भी गैस की किल्लत है, शहरों में कतारें लगी हुई हैं और संसद में सवाल पूछे जा रहे हैं. इस सबको ध्यान रखते हुए सरकार को निर्णय लेना होगा."
शशांक आगे कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह निर्णय आपसी विश्वास के आधार पर होगा. ऐसा नहीं होगा कि हमने इन्हें कोई चीज़ दे दी और किसी दूसरे ने कोई और चीज़ दे दी... कल को कोई नहीं दे पाया तो उसके ख़िलाफ़ हो गए. नेबरहुड फ़र्स्ट हमारी नीति पहले से है लेकिन कोई भी निर्णय इस पर होगा कि देश में क्या परिस्थिति है."
'सिर्फ़ डीज़ल डिप्लोमेसी काफ़ी नहीं'
कौटिल्य स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक मामलों की सहायक प्रोफ़ेसर डॉक्टर कनिका राखरा कहती हैं, "शेख़ हसीना सरकार के अपदस्थ होने और हसीना को भारत में शरण दिए जाने के बाद से बांग्लादेश में काफ़ी भारत विरोधी भावनाएं हैं. 'डीज़ल डिप्लोमेसी' एक तरीका हो सकता है उन्हें शांत करने का. लेकिन यह भी ध्यान रखना है कि भारत की नेबरहुड फ़र्स्ट की नीति रही है. भारत ने पहले भी बांग्लादेश को डीज़ल दिया है (5000 टन) और आगे भी दे सकते हैं लेकिन यही अकेली रणनीति नहीं हो सकती."
वह आगे कहती हैं, "देखिए मार्च के महीने में ही बांग्लादेश के मिलिट्री इंटेल का दौरा था. इसके अलावा भारत और बांग्लादेश के एनएसए की भी मुलाक़ात भी हुई है. इसका अर्थ यह है कि बैक चैनल से बातचीत चल रही है. ऐसे में यह मानना कि भारत तेल के संकट में मदद कर देगा और भारत-बांग्लादेश संबंध अच्छे हो जाएंगे, थोड़ा बचकाना हो जाएगा. बेहतर यह होगा कि हम आपकी मदद भी कर रहे हैं लेकिन हमें अपना काम भी चलाना है- जो हो भी रहा है."
चीन की मदद मिलने पर बांग्लादेश के चीन के पक्ष में झुकने की संभावना के सवाल पर डॉक्टर कनिका कहती हैं, "बांग्लादेश एक संप्रभु देश है और वह अपनी ज़रूरत, अपना फ़ायदा देखेगा. उन्होंने चीन से भी मदद मांगी है और चीन ने मदद करने की बात कही भी है. इसलिए हमें लगातार देखना पड़ेगा कि यह स्थिति किस तरह विकसित होती है. हमें देखना होगा कि चीन कितना डीज़ल भेजता है."
वह आगे कहती हैं, "देखिए 'डीज़ल डिप्लोमेसी' जैसे कॉन्सेप्ट ख़बरों में तो अच्छे लगते हैं लेकिन कूटनीति के बहुत सारे हिस्से होते हैं जिन्हें साथ चलना होता है. इसलिए मैं यह नहीं मानती कि हम सिर्फ़ डीज़ल डिप्लोमेसी करेंगे और हमारा रिश्ता अच्छा हो जाएगा. हमें मदद करनी है लेकिन उसके साथ और भी बहुत सारी चीज़ें करनी हैं. सिर्फ़ मदद करने से संबंध अच्छे नहीं हो जाएंगे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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