ईरान ने हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया पर दागीं मिसाइलें, भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

डिएगो गर्सिया

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इमेज कैप्शन, ईरान ने हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया स्थित ब्रिटिश सॉवरेन बेस की ओर दो मिसाइलें दागी हैं
    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

ईरान ने हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया स्थित ब्रिटिश सॉवरेन बेस की ओर दो मिसाइलें दागी हैं. हालांकि, दोनों में से कोई भी मिसाइल बेस तक नहीं पहुंच पाई.

शुक्रवार को ब्रिटेन ने कहा था कि उसके मिलिट्री बेस का इस्तेमाल स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर ईरानी हमलों को रोकने के लिए किया जा सकता है. इसके जवाब में ईरान ने ब्रिटेन को चेतावनी दी थी कि अमेरिका की ओर से मिलिट्री बेस का इस्तेमाल किए जाने को 'तनाव बढ़ाने' के रूप में लिया जाएगा.

ईरान के शनिवार को 'असफल' मिसाइल हमले के साथ ही कई सवाल खड़े हो गए हैं जिनमें सबसे बड़ा यह है कि क्या ईरान और मध्य-पूर्व की जंग भारत के क्षेत्र यानी हिंद महासागर तक पहुंच गई है...और भारत के लिए इसका क्या अर्थ है?

दूसरा सवाल ये कि क्या ना-ना करते हुए ब्रिटेन भी इस जंग में शामिल हो गया है और क्या इससे इस युद्ध का दायरा और बढ़ जाएगा?

इन हालातों पर बारीकी से नज़र रख रहे विशेषज्ञों ने बीबीसी हिन्दी से बातचीत में कहा कि भारत के लिए इस घटनाक्रम से कई चिंताएं पैदा होती हैं, साथ ही डिएगो गार्सिया पर हमले से इस जंग के और तीव्र होने की आशंका बढ़ गई है.

ईरान का हमला

ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर

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इमेज कैप्शन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री ईरान के साथ इस जंग में सीधे शामिल होने से हिचकते रहे हैं

डिएगो गार्सिया की ओर दागी गईं मिसाइलों की ख़बर सबसे पहले 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने दी थी, जिसमें अमेरिका के अज्ञात अधिकारियों के हवाले से जानकारी दी गई थी.

इसके बाद बीबीसी ने अलग अलग स्रोतों से बात की, जिन्होंने इसकी पुष्टि कर की.

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने स्वयं ना तो इस बात की पुष्टि की है और न ही खंडन किया है कि ईरान ने अड्डे की ओर दो मिसाइलें दागी थीं.

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हालांकि, मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पूरे क्षेत्र में ईरान के लापरवाह हमले 'ब्रिटिश हितों और ब्रिटेन के सहयोगियों के लिए ख़तरा' हैं.

ब्रिटेन ने अमेरिकी सेना को डिएगो गार्सिया से, जिसे वह "रक्षात्मक बमबारी मिशन" कहता है, ऐसे अभियानों को अंजाम देने की अनुमति दी है.

फ़िलहाल, ऐसी कोई ख़बर नहीं है कि अमेरिका ने हिंद महासागर में स्थित इस ब्रिटिश सॉवरेन बेस से बमबारी मिशन चलाए हों.

अब भी इस बात को लेकर संदेह बना हुआ है कि ईरान के पास ऐसी मिसाइलें हैं या नहीं, जो हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया तक पहुंच सकें.

दरअसल यह ब्रिटिश सैन्य अड्डा, जिसका इस्तेमाल अक्सर अमेरिकी वायुसेना के लंबी दूरी के बमवर्षक करते हैं, ईरान से लगभग 3,800 मील दूर है.

अब तक माना जाता रहा है कि ईरान के पास मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिनकी मारक क्षमता लगभग 2,000 किलोमीटर तक है.

हालांकि, कुछ सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की खोर्रमशहर मिसाइल की रेंज इससे ज़्यादा हो सकती है.

इसराइल के अल्मा रिसर्च एंड एजुकेशन सेंटर के अनुसार, ईरान की खोर्रमशहर मिसाइल की मारक क्षमता 3,000 किलोमीटर तक हो सकती है.

माना जाता है कि इसे उत्तर कोरिया की एक मध्यम दूरी की मिसाइल के आधार पर विकसित किया गया है.

भारत के लिए चुनौती

प्रेमानंद मिश्रा का कोट

हिंद महासागर में ईरान के मिसाइल हमले से क्या भारत की स्थिति पर कोई फ़र्क़ पड़ता है?

बीबीसी हिन्दी के इस सवाल के जवाब में जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "डिएगो गार्सिया सबसे सुरक्षित इलाक़ा माना जाता है और अगर वहां पर ईरान का हमला हुआ है, भले ही वह टार्गेट न भेद पाई हों लेकिन ऑपरेशन सफल है तो वह भविष्य के लिए एक ख़तरा है. भारत की जो हिंद-प्रशांत रणनीति है, उसके लिए यह चिंता की बात है."

"यह इस समुद्री क्षेत्र में जहाज़ों के स्वतंत्र रूप से आवागमन के साथ ही भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता, ख़ासकर मैरीटाइम सिक्योरिटी, की पॉलिसी पर सवालिया निशान है."

प्रोफ़ेसर प्रेमानंद मिश्रा यह भी कहते हैं, "अगर कल को यह जंग बढ़ जाती है और चीन-अमेरिका के बीच में जंग हो जाती है तो भारत क्या करेगा, या क्या कर पाएगा? दरअसल भारत की हिंद-प्रशांत, हिंद महासागर को लेकर जो रणनीतिक स्वतंत्रता है उसके लिए डिएगो गार्सिया बहुत महत्वपूर्ण है."

"डिएगो गार्सिया को लेकर भारत-अमेरिका के बीच एक तरह का संबंध रहा है. तो अगर इस तरह का ख़तरा अगर बढ़ेगा तो भारत की निर्भरता अमेरिका पर बढ़ेगी क्योंकि भारत इस स्थिति में नहीं है कि अमेरिका के बिना चीन के विस्तारवाद को या चीन के सर्विलांस पर सवाल उठाए."

मिडिल ईस्ट इनसाइट्स प्लेटफ़ॉर्म की संस्थापक डॉक्टर शुभदा चौधरी को ईरान का डिएगो गर्सिया पर मिसाइल हमला भारत के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण लगता है, जिसने भारत की ऐसी कार्रवाई की क्षमताओं को सीमा को उजागर किया है.

वह कहती हैं, "डिएगो गार्सिया भारत के दक्षिणी छोर से लगभग 4,000 किमी दूर स्थित है, जो अधिकांश भारतीय लड़ाकू विमानों की युद्ध सीमा से कहीं अधिक है. बिना कई बार हवा में ईंधन भरे यह संभव नहीं, और भारत की इस क्षेत्र में क्षमता बेहद सीमित है."

"इसके अलावा अग्नि-III/IV/V जैसी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें, जो डिएगो गार्सिया तक पहुंचने में सक्षम हैं, परमाणु निवारण के लिए डिज़ाइन की गई हैं, न कि दृढ़ सैन्य बुनियादी ढांचे पर सटीक पारंपरिक हमलों के लिए."

शुभदा चौधरी यह भी ध्यान दिलाती हैं कि हिंद महासागर में भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं.

वह कहती हैं, "डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य संपत्तियां तैनात हैं जिनमें कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, पैट्रियट/थाड श्रेणी की वायु रक्षा प्रणालियां और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताएं शामिल हैं, जो अधिकांश पारंपरिक हमलों को विफल कर सकती हैं."

"इसके अलावा, अमेरिकी और ब्रिटिश परमाणु पनडुब्बियां इन जलक्षेत्रों में नियमित रूप से संचालित होती हैं.

कोई भी भारतीय नौसैनिक टास्क फोर्स हमले की सीमा में पहुंचने से पहले ही पनडुब्बी-रोधी युद्ध के गंभीर ख़तरे का सामना करेगी."

'जंग की तीव्रता बढ़ेगी'

प्रेमानंद मिश्रा का कोट

ब्रिटेन और यूरोप दोनों ही ईरान के साथ इस जंग में सीधे शामिल होने से हिचकते रहे हैं. लेकिन क्या डिएगो गार्सिया पर ईरान के मिसाइल हमले से यह स्थिति बदल जाएगी?

प्रोफ़ेसर प्रेमानंद कहते हैं, "इस हमले से यूके की जो हिचक थी वह ख़त्म हो जाएगी. अगर डिएगो गार्सिया पर आप आईआरबीएम इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि दुनिया भर में ब्रिटेन के नेवल या मिलिट्री बेस ख़तरे की जद में आ जाते हैं. इसलिए यूरोप और कम से कम ब्रिटेन के मामले में तो यह हिचक ख़त्म होगी और उन्हें अमेरिका की छतरी के नीचे आना ही होगा."

वह कहते हैं, "इसका यूरोप के लिए भी सिग्नल है कि उनके भी मिलिट्री बेस सुरक्षित नहीं हैं और ईरान की तरफ़ से हुआ यह हमला इस जंग की तीव्रता को और बढ़ाएगा ही."

शुभदा चौधरी कहती हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन का 'विशेष संबंध' इतना गहरा है कि अमेरिका के किसी भी बड़े सैन्य अभियान में ब्रिटेन की तटस्थता लगभग असंभव है.

नाटो ढांचे के भीतर ख़ुफिया जानकारी साझा करने की प्रक्रिया और सैन्य समन्वय स्वतः सक्रिय हो जाते हैं.

वह कहती हैं, "ब्रिटेन, फ़ाइव आइज़ गठबंधन का अभिन्न हिस्सा है. ईरान से जुड़े किसी भी संघर्ष में अमेरिका के साथ खुफ़िया जानकारी साझा करना उसकी संधि-बाध्यता है,चाहे ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर चाहें या न चाहें."

"इसके अलावा डिएगो गर्सिया हिंद महासागर में ब्रिटिश क्षेत्र (बीआईओटी) है जिसे अमेरिका को पट्टे पर दिया गया है. मध्य-पूर्व में किसी भी अमेरिकी हवाई अभियान में इस अड्डे का उपयोग होता है, जिससे ब्रिटेन स्वतः सहभागी बन जाता है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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