पीएम मोदी के साथ गर्मजोशी, आख़िर नेतन्याहू दुनिया को क्या दिखाना चाहते हैं?

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दो दिवसीय इसराइल दौरे के पहले दिन वहां की संसद कनेसेट को संबोधित किया.

बुधवार को यरुशलम पहुंचे नरेंद्र मोदी कनेसेट को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के 2017 में इसराइल के दौरे के बाद दोनों मुल्कों के बीच नज़दीकियां बेहद तेजी से बढ़ी हैं. बुधवार को दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के संबोधन में भी इन रिश्तों की एक नई ऊंचाई की झलक मिली.

नरेंद्र मोदी की मौजूदा इसराइल यात्रा काफ़ी अलग मानी जा रही है.

इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी और इसराइल के पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू के बीच जो गर्मजोशी दिखी वो हाल के दिनों में बहुत कम राजनेताओं के बीच दिखी है.

इसराइल के साथ अपने विशेष संबंधों का ज़िक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनका जन्म 17 सितंबर, 1950 को हुआ था. इसी दिन भारत ने इसराइल को मान्यता दी थी.

उनसे पहले इसराइली संसद कनेसेट को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने पीएम मोदी को 'दोस्त से बढ़कर भाई' बताया.

विश्लेषकों का मानना है कि जब दुनिया के दो देशों के राष्ट्र प्रमुखों के बीच इस तरह के निजी रिश्ते हों तो ये संबंधित देशों के रिश्ते में एक नए मायने के संकेत देते हैं.

सवाल ये है कि भारत और इसराइल के प्रधानमंत्रियों के बीच इस गर्मजोशी के मायने क्या हैं?

निजी और भावुक रिश्ता

विश्लेषकों का मानना है कि जब नेतन्याहू अपने देश की संसद को संबोधित कर रहे थे तब वो ये दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि भारत के साथ उनके देश का संबंध सिर्फ़ ट्रांजेक्शनल यानी लेन-देन वाला नहीं है.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजॉल्यूशन के फ़ैकल्टी मेंबर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, ''एक ऐसे समय में जब दुनियाभर की जियोपॉलिटिक्स में भारी अनिश्चतता का आलम है, नेतन्याहू ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत के साथ इसराइल के रिश्ते निजी और भावनात्मक हैं.''

''यही वजह है कि उन्होंने पीएम मोदी को 'दोस्त से बढ़कर भाई' बताया.''

''उनकी नज़र में दोनों देशों के रिश्ते दो सभ्यताओं के रिश्ते हैं और इनमें बड़ी गहराई है. इससे ये संदेश जाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उथल-पुथल के इस दौर में भारत और इसराइल साथ खड़े हैं.''

घरेलू राजनीति में संदेश

इसराइल में अक्तूबर में चुनाव होने हैं. माना जा रहा है कि घरेलू राजनीति में नेतन्याहू की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. ग़ज़ा पीस बोर्ड में शामिल होना भी नेतन्याहू के लिए काफ़ी मुश्किल फ़ैसला था.

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, ''इसराइल जैसे 'सिक्योरिटी स्टेट' में सुरक्षा के पहलू का घरेलू राजनीति से जो रिश्ता है वो देखना होगा.नेतन्याहू ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके नेतृत्व में इसराइल अलग-थलग नहीं पड़ने जा रहा है. भारत जैसा दुनिया का बड़ा देश उसके साथ खड़ा है. क्योंकि ग़ज़ा युद्ध के बाद नेतन्याहू दुनिया में अलग-थलग पड़ते दिखे थे.''

उनका कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अलावा किसी देश के नेता ने 7 अक्तूबर 2023 के बाद इसराइल का दौरा नहीं किया था. नेतन्याहू अपने चुनाव अभियान में अपनी इस कूटनीतिक पहल को भी भुनाने की कोशिश करेंगे.

''नेतन्याहू विपक्ष के राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं. वो यात्रा को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में से एक के रूप में भी पेश कर रहे हैं.''

इसराइल में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा ने बीबीसी से कहा कि इसराइल में विपक्षी दलों के नेता और बिन्यामिन समर्थक वोटर भी भारत को एक अच्छे दोस्त के तौर पर देखते हैं.

हरेंद्र मिश्रा के मुताबिक नेतन्याहू के वोटरों का मानना है कि इसराइल के प्रधानमंत्री में वो क्षमता है कि वो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत दुनिया के बड़े ताक़तवर देशों के सामने तन कर खड़े हो सकें.

''नेतन्याहू भी ये दिखाना चाहते हैं कि दुनिया के बड़ी और तेजी से उभरती ताक़त के तौर पर भारत जैसा देश उनके साथ खड़ा है.''

हरेंद्र मिश्रा का कहना है यहां विश्लेषक ये भी कह रहे हैं भारत के पीएम नरेंद्र मोदी का ये दौरा नेतन्याहू को भी मजबूती देने के लिए हो रहा है.

आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश

पिछले कुछ समय में भारत ने यूरोपीय यूनियन समेत कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते यानी एफटीए किए हैं.

भारत इसराइल के साथ भी अपने आर्थिक संबंधों को एफटीए की ओर ले जाने की कोशिश कर रहा है.

भारत ये भी दिखाने की कोशिश कर रहा है कि इसराइल के साथ उसके संबंध सिर्फ़ रक्षा समझौतों तक ही सीमित नहीं है.

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब ये कह रहे थे कि दोनों देशों के बीच संबंधों में स्केल और स्कोप कोई सीमा नहीं है तो इसका मतलब ये है कि भारत दोनों देशों के बीच लगभग चार अरब डॉलर के व्यापार को और आगे ले जाना चाहता है.''

एग्रीकल्चर, टेक्नोलॉजी और एआई

प्रधानमंत्री ने भारत में खेती में रिसर्च में इसराइल की मदद को याद किया और 'हर बूंद ज़्यादा फसल' जैसी इसराइली टेक्नोलॉजी को भारतीय कृषि में मददगार बताया. ये तकनीक 2015 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का हिस्सा रही है.

प्रेमानंद मिश्रा के मुताबिक़ ''पीएम ने इसका ज़िक्र कर ये बताना चाहा है कि भारत इसराइल से अपनी टेक्नोलॉजी एंगेजमेंट को और बेहतर बनाना चाहता है. प्रधानमंत्री को लगता है कि दुनिया के किसी भी देश की तुलना में इसराइल भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर में ज्यादा खुलापन अपनाएगा.''

हमास, फ़लस्तीन बनाम ऑपरेशन सिंदूर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कहा कि वो 7 अक्तूबर 2023 के हमास के हमले की साफ़ शब्दों में निंदा करते हैं लेकिन साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पहल, ग़ज़ा पीस इनीशिएटिव्स का समर्थन भी करते हैं.

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भारत को ऐसा देश बता रहे थे जो लंबे समय तक 'आतंकवाद' का सामना करता रहा है तो उनके दिमाग़ में ये बात भी थी कि 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारत के साथ जो देश सबसे ज्यादा खुलकर खड़ा था वो इसराइल ही था.''

''भारत ने ये साफ़ संदेश दिया है कि वो फ़लस्तीन के मुद्दे को मानवीय आधार सुलझाने की कोशिश करना चाहता है लेकिन इसके लिए वो इसराइल से अपने संबंधों को सीमित नहीं करना चाहेगा.''

वो कहते हैं, ''इस मुद्दे का भारत और इसराइल दोनों की घरेलू राजनीति में काफी महत्व है. भारत में भारतीय जनता पार्टी के वोटरों का रुझान इसराइल समर्थक रहा है. इसराइल का समर्थन कर पीएम मोदी घरेलू राजनीति में भी एक संदेश देना चाहते हैं. ठीक ऐसा ही संदेश नेतन्याहू पारंपरिक यहूदी वोटरों को देना चाह रहे हैं.''

इसराइल के श्रम बाज़ार में हिस्सेदारी

भारत इसराइल समेत दुनिया के संघर्ष वाले इलाकों में श्रम क्षमता विकसित करने वाले देश के तौर पर खुद को पेश करना चाहता है.

7 अक्तूबर के हमले के बाद इसराइल के अंदर फ़लस्तीनियों के लिए परमिट खत्म कर दिया गया था. इससे इसराइल में भारतीय श्रमिकों की मांग काफी बढ़ी है. इससे भारत के सैकड़ों लोगों को वहां काम मिला है. बड़ी तादाद में भारतीय श्रमिक वहां गए हैं.

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, ''भारत इस तरह संघर्ष वाले इलाकों में श्रम बल सप्लाई कर अपने द्विपक्षीय संबंधों को और विस्तार देने की कोशिश कर रहा है. भारत ये बताना चाहता है कि वो इसराइल समेत पूरी दुनिया के लिए बड़ा बाज़ार ही नहीं है बल्कि उसके पास श्रम क्षमता भी है जो दुनिया के बाज़ार के काम आ सकती है.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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