तारिक़ रहमान की जीत लेकिन मज़बूती जमात-ए-इस्लामी की, बांग्लादेश का मीडिया ऐसा क्यों कह रहा?

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बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को प्रचंड बहुमत मिलने और जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख विपक्ष के रूप में उभरने के बाद देश की सियायत में एक नए युग की शुरुआत हुई है.
300 सीटों में से बीएनपी को अकेले 209 सीटें और उसके सहयोगियों को तीन सीटें मिली हैं. जमात और उसके सहयोगी दलों को 77 सीटें मिली हैं.
जबकि साल 2024 में छात्र आंदोलनों से निकली पार्टी नेशनल सिटिजंस पार्टी (एनसीपी) के खाते में छह सीटें आई हैं.
बीएनपी की प्रचंड जीत को बांग्लादेश के मीडिया में 'सुपरमेजोरिटी' कहा जा रहा है. अब तय माना जा रहा है कि बीएनपी के अध्यक्ष तारिक़ रहमान देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे.
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बांग्लादेश के मीडिया में तारिक़ रहमान की चुनावी जीत की ख़ास चर्चा है और कहा जा रहा है कि एक तरफ़ तो बीएनपी को अवसर मिला है तो दूसरी तरफ़ हाल के समय में 'बहुत अधिक ध्रुवीकृत हो चुके देश को पटरी पर लाने की चुनौती' भी है.
स्थानीय मीडिया में ये भी चर्चा है कि जमात-ए-इस्लामी भले ही बीएनपी से बहुत पीछे रह गई और दूसरे नंबर पर आई लेकिन ख़ासा फ़ायदा हुआ है.
इसके अलावा मीडिया में ये भी चर्चा है कि बीएनपी की सरकार बनने के बाद देश की विदेश नीति में क्या बदलाव आने की संभावना है.

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तारिक़ रहमान की सफलता की वजह
बांग्लादेश के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द डेली स्टार ने आम चुनावों में बीएनपी की प्रचंड जीत को देश की राजनीति का 'टर्निंग पॉइंट' कहा है.
अख़बार ने लिखा है, "तारिक़ रहमान ने जनता के प्रति जवाबदेह और सभी नागरिकों, यहां तक कि आलोचकों के प्रति भी संवेदनशील सरकार बनाने के अपने संकल्प से लाखों लोगों का भरोसा जीता. लंदन में लगभग दो दशक के निर्वासन के बावजूद उन्होंने अपनी मां और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया के जेल जाने के बाद भी पार्टी को एकजुट रखने में दृढ़ता दिखाई.''
''उन्होंने शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली तत्कालीन सत्तारूढ़ अवामी लीग के दबाव के बीच युवा नेताओं को आगे बढ़ाकर, ज़मीनी ढांचे को फिर से संगठित करके और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखकर बीएनपी को सक्रिय किया."
"उन्होंने छात्र-नेतृत्व वाले एंटी-कोटा आंदोलन का समर्थन किया और हसीना के सत्ता से हटने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम प्रशासन के गठन का समर्थन किया. 2025 के भीतर समयबद्ध सुधार एजेंडा और चुनाव कराने की मांग करते हुए उन्होंने अंततः प्रोफेसर यूनुस की ओर से प्रस्तावित फरवरी की समयसीमा पर सहमति जताई."
डेली स्टार ने लिखा है, "इन चुनावों में क़रीब 60 प्रतिशत मतदान लोकांत्रिक जनादेश को दिखाता है और बताता है कि चुनाव के समावेशी न होने के दावों का कोई वैध आधार नहीं है. इस चुनाव में अवामी लीग की ग़ैरमौजूदगी का मुख्य कारण अतीत में किए गए अपराधों को स्वीकार करने, ऐसी ग़लतियों के लिए माफ़ी मांगने और आंतरिक सुधारों को आगे बढ़ाने में उसकी विफलता थी. उसके पारंपरिक गढ़ों में 40 प्रतिशत से अधिक मतदान भी दर्शाता है कि उसके समर्थकों ने अब उसका साथ छोड़ दिया है."

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विदेश नीति में बदलाव के संकेत
बांग्लादेश की न्यूज़ वेबसाइट बोनिकबार्ता में विदेश नीति के बारे में बीएनपी नेता अमीर खसरू महमूद चौधरी के बयान को जगह दी गई है.
वेबसाइट के अनुसार, शुक्रवार शाम बीएनपी स्थायी समिति के सदस्य अमीर खसरू महमूद ने बांग्लादेश की विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत दिया.
खसरू महमूद ने पत्रकारों से कहा, "भविष्य में बांग्लादेश की विदेश नीति किसी विशेष देश पर केंद्रित नहीं होगी. सभी देशों के साथ संबंध बनाए रखने में बांग्लादेश के अपने हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी. बीएनपी सभी के साथ संबंध बनाए रखना चाहती है, जिसमें बांग्लादेश के हितों, स्वतंत्रता और संप्रभुता को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि किसी विशिष्ट देश को."
चुनाव रिज़ल्ट आने के बाद बीएनपी के वरिष्ठ नेता सलाहुद्दीन अहमद ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है, जिन्हें अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए युवाओं के आंदोलन के बाद अपदस्थ कर दिया गया था.
अहमद ने कहा, "हमें भारत समेत सभी देशों के साथ पारस्परिक सम्मान और समानता पर आधारित मित्रतापूर्ण संबंध चाहिए."

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'सबसे बड़ी चुनौती अब शुरू होती है'
बांग्लादेश के अंग्रेज़ी अख़बार न्यू एज ने लिखा कि 'बीएनपी की भारी जीत अपने साथ अवसर भी लेकर आई है और परीक्षा भी.'
न्यू एज के ओपिनियन कॉलम में मोनवरुल इस्लाम ने लिखा, "स्पष्ट बहुमत के साथ सार्थक सुधार लागू करने की क्षमता मिलती है. लेकिन इसके साथ ढिलाई और अधिकारों के अति प्रयोग का जोखिम भी जुड़ा रहता है. इतिहास बताता है कि अनियंत्रित सत्ता सबसे लोकप्रिय जनादेश को भी कमज़ोर कर सकती है."
उन्होंने लिखा, "बांग्लादेश के लोगों ने कठिन परिस्थितियों में भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा दिखाया है. उन्होंने देश को एक संवेदनशील संक्रमण काल से निकालने की ज़िम्मेदारी बीएनपी को सौंपी है. इस भरोसे को टूटने नहीं दिया जाना चाहिए."
उन्होंने आगे लिखा, "वास्तविक चुनौती चुनावी जीत नहीं, बल्कि उसके बाद सत्ता के इस्तेमाल में है. समझदारी, व्यावहारिकता और सिद्धांतों पर आधारित शासन ही तय करेगा कि यह जनादेश लोकतांत्रिक रिवाजों में बदलेगा या फिर वादों और निराशा के एक और दौर में बदल जाएगा. देश उम्मीद और सतर्कता के साथ आगे की दिशा देख रहा है."
मोनवरुल इस्लाम के अनुसार, "बीएनपी के लिए यह चुनाव जीतना, वो भी प्रचंड बहुमत से और दो तिहाई से अधिक सीटों पर जीत दर्ज करना बेशक एक असंभव काम था. हालांकि सबसे बड़ी चुनौती अब शुरू होती है."
ढाका ट्रिब्यून ने लिखा है कि तारिक़ रहमान के रूप में बीएनपी को मिले नए नेतृत्व के सामने चुनौती बहुत स्पष्ट है- 'काम करके दिखाना होगा.'
अख़बार के अनुसार, "बीएनपी को 'विजेता का ही सबकुछ हो जाता है' वाली राजनीति की कड़वी परंपरा छोड़नी होगी. अपना जनादेश बरकरार रखने के लिए, उसे विपक्ष की तर्कसंगत बातों को सुनना होगा और असहमति के लिए आवश्यक स्थान सुनिश्चित करना होगा. साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता के मूल्यों को कायम रखना होगा."

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बीएनपी की शानदार जीत, लेकिन जमात का उभार दिलचस्प
ढाका ट्रिब्यून ने एक लेख में कहा है कि 'बीएनपी को शानदार जीत मिली है लेकिन जमात-ए-इस्लामी को सबसे बड़ा फ़ायदा मिला है और बहुत कठिन लड़ाई में मिले बहुमत के भार को आगे ले जाने में बीएनपी विफल होती है तो जमात अगले मौक़े के लिए तैयार बैठी हुई है.'
अख़बार में पत्रकार रियाज़ अहमद ने लिखा है, "बीएनपी को इतना बहुमत मिल गया है कि पार्टी संविधान में संशोधन लाने के लिए अनुच्छेद 142 का सहारा ले सकती है. जमात-ए-इस्लामी और जुलाई आंदोलन से निकली एनसीपी को 300 में से लगभग एक चौथाई सीटें मिली हैं. और यह जमात को विपक्ष में सबसे बड़ी राजनीतिक ताक़त बनाता है."
जमात के उभार को लेकर उन्होंने लिखा है, "कुछ राजनीतिक हलकों में यह धारणा बनाई जा रही है कि जमात का प्रदर्शन कमज़ोर रहा. इसके उलट, वह इस चुनाव में बड़ा लाभ उठाने वाली पार्टी के रूप में उभरी है. जो पार्टी ऐतिहासिक रूप से कभी 18 से अधिक सीटें नहीं जीत पाई, उसने अब अपनी उपस्थिति चार गुना कर ली है."
"जमात ने समय के साथ खुद को बचाए रखने और हालात के मुताबिक ढलने की क्षमता दिखाई है. बीते दशकों में उसने राजनीतिक लाभ के लिए अपने धुर विरोधियों से भी हाथ मिलाया. 1994-1996 के आंदोलन के दौरान अवामी लीग के साथ गठबंधन, 2001 में बीएनपी के साथ सत्ता साझा करना और अब छात्र-नेतृत्व वाले एनसीपी को अपने साथ जोड़ना इसी रणनीति का हिस्सा रहा है."
रियाज़ अहमद लिखते हैं, "अवामी लीग के जल्द वापसी की संभावना कम दिख रही है. ऐसे में अगले पांच वर्षों तक बीएनपी पर लगातार दबाव बनाए रखने की स्थिति में अब जमात है."

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'चुनाव ने दिखाई जेन ज़ी उभार की सीमा'
प्रथम आलो ने लिखा कि जेन ज़ी उभार के बाद बांग्लादेश के चुनाव ने युवा शक्ति की सीमा को दिखाया है.
साल 2024 में छात्र और युवा आंदोलनों के बाद उभरी एनसीपी को इस चुनाव में छह सीटें मिलीं.
अख़बार ने लिखा, "इस चुनाव ने सड़क के आंदोलन को वोट में बदलने की चुनौती को दिखाया है. एनसीपी के कुछ समर्थकों को लगता है कि जब पार्टी ने बीते दिसंबर में जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया तभी उसने खुद को रेस से बाहर कर लिया."
अख़बार के अनुसार, "एनसीपी ने शुरुआत में लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी, लेकिन अंत में गठबंधन के तहत केवल 30 सीटों पर ही मैदान में उतरी. पार्टी ने कहा कि ढाका में आंदोलन से जुड़े एक प्रमुख सदस्य की हत्या के बाद उसे किसी बड़े दल का समर्थन ज़रूरी लगा, इसलिए उसने गठबंधन में शामिल होने का फ़ैसला किया."
विश्लेषकों का कहना है कि एनसीपी मतदान से पहले पर्याप्त जनाधार तैयार करने में भी नाकाम रही.
अख़बार ने लिखा, "23 वर्षीय यूनिवर्सिटी स्टूडेंट सोहनुर रहमान ने कहा कि 2024 के विद्रोह के बाद लोगों को उनसे जो उम्मीदें थीं, वे उन पर खरे नहीं उतरे. जमात के साथ एनसीपी का गठजोड़ हमें विश्वासघात जैसा लगा और हम जैसे कई युवा मतदाताओं ने उन्हें समर्थन नहीं देने का फैसला किया."

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नई सरकार के सामने फौरी चुनौती
द डेली स्टार के एक अन्य लेख में अल्ताफ़ परवेज़ ने लिखा है कि सबसे प्राथमिक ज़रूरत ये है कि नई सरकार अपने सारे फ़ैसलों को संसद के अंदर ले, चाहे ये राजनीतिक हों, आर्थिक या सामाजिक हों. नीतिगत फ़ैसलों को नौकरशाही के ज़रिए नहीं बल्कि चुने हुए प्रतिनिधि के जरिए लेना होगा और स्थानीय प्रशासन को मजबूत करना होगा.
उन्होंने लिखा कि सबसे बड़ी चुनौती है पुलिस बल को फिर से संगठित करना. इसका ढांचा बिखरा हुआ है और नौतिक रूप से कमज़ोर है. जनता नहीं चाहती कि जुलाई उभार के पहले वाली स्थिति में पुलिस लौटे.
उन्होंने लिखा, "विद्रोह के दौरान पुलिस की कार्रवाई से पैदा हुई नाराज़गी को आने वाली सरकार को निष्पक्ष तरीक़े से देखना होगा. लोग ऐसी पुलिस चाहते हैं जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो और राजनीतिक दबाव से भी आज़ाद रहे. अंतरिम सरकार वर्दी बदलने से आगे इस लक्ष्य को हासिल करने में ज़्यादा कुछ नहीं कर सकी. इसलिए ज़रूरी है कि नई संसद और सरकार पुलिस बल के पुनर्गठन पर ध्यान दें, ताकि उसे सच में पेशेवर बनाया जा सके."
"बांग्लादेश फिर से जबरन गायब किए जाने, ग़ैर न्यायिक हत्याओं या हिरासत में राजनीतिक विरोधियों और वैचारिक विरोधियों पर अत्याचार की संस्कृति की ओर नहीं लौट सकता. ख़ुफ़िया एजेंसियों में भी इसी तरह बदलाव करना होगा."
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