आसमान में उड़ते रॉकेट और ज़मीन पर दमनकारी शासन...ख़ौफ़ में जी रहे ये ईरानी

इमेज स्रोत, Anadolu via Getty Images
- Author, फ़र्गल कीन
- पदनाम, विशेष संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
छत पर खड़ी एक महिला नीचे शहर से आती आवाज़ें सुन रही है.
आज रात ट्रैफ़िक की बस हल्की से आवाज़ सुनाई पड़ रही है. लेकिन वह जानती है कि यह माहौल पल भर में बदल सकता है.
आमतौर पर सबसे पहले कुत्ते आवाज़ पकड़ लेते हैं और ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगते हैं.
फिर हवाई जहाज़ों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है. उसके बाद धमाकों की डरावनी गूंज आती है. फिर किसी जाने-पहचाने मोहल्ले में हवाई हमले से उठती नारंगी आग की लपटें दिखाई देती हैं.
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बीबीसी को तेहरान से लोगों के इंटरव्यू और वीडियो मिले हैं, जो एक ऐसे शहर की तस्वीर दिखाते हैं जहां लोग भारी तनाव में हैं. यहां किसी भी पल कहीं भी धमाका हो सकता है.
वो देश की सुरक्षा एजेंसियों के डर के साए में जी रहे हैं.
बदलाव की उम्मीदें पूरी तरह टूटीं

बरान (बदला हुआ नाम), तीसेक साल की एक व्यवसायी हैं. अब वह इतनी डरी हुई हैं कि काम पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहीं.
वह कहती हैं, "ड्रोन हमलों के शुरू होने के बाद से कोई भी बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करता. अगर मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर क़दम रखती हूं, तो यह अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाने जैसा है."
वह अकेली रहती हैं लेकिन अपने दोस्तों के लगातार संपर्क में बनी रहती हैं.
वो कहती हैं, "हम दोस्त हर वक़्त एक-दूसरे को मैसेज करते रहते हैं कि सब कहां हैं, सुरक्षित हैं या नहीं. और जब कोई आवाज़ नहीं होती, तब ख़ामोशी भी डराने लगती है. मैं ज़िंदा रहने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही हूं, ताकि आगे जो भी होने वाला है, उसे देख सकूं."
ईरान के कई युवाओं की तरह, हाल के महीनों में बरान की भी बदलाव की उम्मीदें पूरी तरह टूट चुकी हैं.
जनवरी में बदलाव की मांग को लेकर हुए व्यापक प्रदर्शनों के बाद सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हज़ारों लोग मारे गए थे.
वह कहती हैं, "मैंने विरोध प्रदर्शनों के दौरान अपने जिस प्रिय को खो दिया उसका ख़्याल आए बिना मैं यह सोच भी नहीं पाती कि मैं पहले कैसे रहती थी. मुझे कल से डर लगता है. मुझे डर लगता कि कल मैं कैसी इंसान बन जाऊंगी. आज तो मैं किसी तरह ज़िंदा रह जाऊंगी लेकिन कल कैसे गुज़रेगा? यही असली सवाल है. क्या मैं कल तक ज़िंदा भी रहूंगी?"
अब दमन पूरी तरह हावी हो चुका है. खुलकर विरोध करना नामुमकिन है, क्योंकि राज्य का निगरानी तंत्र हर जगह मौजूद है.
हमें जो वीडियो मिले हैं, उनमें रात के समय शहर में घूमते हुए शासन समर्थक लोग दिखाई देते हैं, उनकी गाड़ियों पर झंडे लगे होते हैं. यह उन सभी के लिए एक साफ़ संदेश है, जो विरोध करने की सोच भी रहे हों.
सरकारी पक्ष के अलावा किसी और बात को कहे जाने की इजाज़त नहीं है. सरकारी टीवी पर प्रदर्शनों और अंतिम संस्कारों के दृश्य दिखाए जाते हैं.
शासन समर्थक अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों के इंटरव्यू में बार-बार अमेरिका और इसराइल की निंदा सुनाई देती है.
सरकारी प्रचार में ईरानी जनता को ऐसे दिखाया जाता है जैसे वे शहादत देने के लिए तैयार हों.
स्वतंत्र पत्रकार अब भी ऐसे बयान जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, जो एक भरोसेमंद वैकल्पिक नज़रिया पेश कर सकें.
लेकिन ऐसा करते हुए उन्हें गिरफ़्तारी, यातना और उससे भी बदतर अंजाम का ख़तरा रहता है.
उनमें से एक ने मुझसे कहा, "जंग जैसे हालात में आपको सच में नहीं पता होता कि वे क्या-क्या कर सकते हैं."
'मुर्दों का शहर'

तेहरान के कुछ लोगों को अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने की थोड़ी-सी हिम्मत सिर्फ़ अपने घरों के अंदर होती है.
जैसे, चालीस साल के मध्यमवर्गीय और पढ़े-लिखे अली को, जिन्हें उम्मीद थी कि जंग की शुरुआत में आयतुल्ला ख़ामेनेई के मारे जाने से हालात बदलेंगे.
अब वह अपने घर के आस-पास की सड़कों पर सुरक्षा बलों की भरमार देखते हैं. हथियारबंद और नकाबपोश लोग जगह-जगह नाके लगाए खड़े हैं.
वह कहते हैं, "जब मैं सड़कों पर निकलता हूं तो दिल टूट जाता है. यह शहर मुझे मुर्दा लोगों के शहर जैसा लगता है."
वह ख़ुद को 'सामान्य बनाए रखने' के लिए डिप्रेशन कम करने की दवाएं ले रहे हैं.
वो कहते हैं, "मैं सड़कों पर ऐसे लोगों के झुंड देखता हूं, जो हम जैसे बिल्कुल नहीं हैं... वे सरकार का समर्थन करने वाले लोग हैं और सच तो यह है कि उन्होंने हमसे हमारी सड़कें ही छीन ली हैं."
बीबीसी से बात करने वाले कई ईरानियों ने अपनी विरोधाभासी भावनाओं के बारे में बताया.
वे शासन से छुटकारा चाहते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें लगता है कि वे और उनका देश हमले के शिकार हैं.
अली कहते हैं, "हालात बेहद डरावने हैं. आपके देश का आसमान दुश्मन ताक़तों के क़ब्ज़े में है. लेकिन इसके बावजूद लोगों के दिलों में कहीं-न-कहीं उम्मीद ज़िंदा है. ऐसा नहीं है कि हम अमेरिका या इसराइल का समर्थन कर रहे हैं. बस यह उम्मीद है कि किसी एक पल में कुछ ऐसा हो जाए, जिससे मौजूदा ईरानी शासन का अंत हो और लोग बदलाव ला सकें."
अपने फ्लैट में बैठी बरान धमाकों की आवाज़ों पर कान लगाए रहती हैं और दूसरे इलाकों में रहने वाले दोस्तों को लगातार संदेश भेजती रहती हैं.
वह पूछती हैं, "क्या आपको पता है हमारे आसमान और दुनिया के बाकी हिस्सों के आसमान में क्या फर्क है? वहां लोग रात को तारों के नीचे सोते हैं, और हम रॉकेटों के नीचे. दोनों आसमान रोशनी देते हैं, लेकिन अलग-अलग किस्म की रोशनी."
बरान को लगता है कि यह जंग सालों तक चल सकती है और इसका मानसिक असर उससे भी ज़्यादा समय तक बना रहेगा.
वह कहती हैं, "यह जंग जल्दी ख़त्म नहीं होगी, क्योंकि यह जंग अब हमारे घरों के अंदर, परिवारों के अंदर तक पहुंच गई है. यह जंग हमारे ख़ून में आ गई है, हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है."
छह हज़ार साल पुराने इस शहर के लोग अमेरिकी और इसराइली बमों के ख़ौफ़ में जी रहे हैं. शासन और उसके उत्पीड़कों के डर में.
रोज़ का, लगातार बना रहने वाला डर, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता.
(एलिस डोयार्ड की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















