अमेरिका और ईरान के बीच सुलह की संभावना से मुश्किल में नेतन्याहू

    • Author, लूसी विलियमसन
    • पदनाम, मध्य पूर्व संवाददाता, तेल अवीव
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

ईरान के साथ बातचीत को लेकर अमेरिका के मिले-जुले संकेतों के बीच, मध्य पूर्व के दो कट्टर दुश्मनों, ईरान और इसराइल के बीच हमले और जवाबी हमले जारी हैं.

इसराइल की सेना के मुताबिक़, सोमवार को इसराइल ने ईरान के अंदर कई हवाई हमले किए.

तेहरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी), इंटेलिजेंस मंत्रालय के कमांड सेंटर, साथ ही हथियारों के भंडार और एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाया गया.

इसके जवाब में, रात भर ईरान ने उत्तरी और दक्षिणी इसराइल में कई मिसाइलें दाग़ीं.

उत्तरी तेल अवीव में ताज़ा धमाके वाली जगह के आसपास इमारतों की बालकनियाँ उखड़ गईं और दीवारों के टुकड़े पास की रिहायशी इमारतों के बीच बने गड्ढे में गिरे.

स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक़, यह ईरानी मिसाइल का सीधा हमला था.

कई अपार्टमेंट ब्लॉक्स इस हमले में बच गए. इस हमले में छह लोग घायल हुए हैं, हालाँकि किसी की हालत गंभीर नहीं बताई गई है.

हमले वाली जगह के पास रहने वाले एक व्यक्ति ने बीबीसी को बताया कि सायरन बजने पर उसके पास शेल्टर तक पहुँचने का समय नहीं था.

वह जैसे ही अपने घर के दरवाज़े तक पहुँचे, धमाके से दरवाज़ा उड़ गया.

उन्होंने बताया कि वह नंगे पैर ही अपने अपार्टमेंट से भागे, जबकि उनके आस-पास कांच टूटा हुआ था. पीछे मुड़कर देखा तो मलबे में आग लग चुकी थी.

ईरान से ट्रंप की बातचीत की चर्चा क्या संकेत देती है?

ईरान के साथ नई बातचीत शुरू करने को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की मंशा पर अब भी अटकलें जारी हैं.

अमेरिका पहले भी बातचीत का इस्तेमाल सैन्य कार्रवाई बढ़ाने के लिए एक आड़ के तौर पर करता रहा है, और अभी कुछ ख़बरें ऐसी भी हैं कि कि हज़ारों अमेरिकी मरीन सैनिकों को मध्य पूर्व भेजा जा रहा है.

लेकिन इसराइल में कुछ लोगों का मानना है कि बातचीत की चर्चा इस बात का संकेत है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहे हैं.

वहीं इसराइल और उसके ताक़तवर सहयोगी अमेरिका के लक्ष्य अब अलग होने लगे हैं.

क्या चाहते हैं नेतन्याहू?

इसराइल के पूर्व सैन्य ख़ुफ़िया अधिकारी और तेल अवीव यूनिवर्सिटी में फ़लस्तीनी अध्ययन केंद्र के प्रमुख माइकल मिलस्टीन कहते हैं, "प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू कोई समझौता नहीं चाहते."

मिलस्टीन ने बीबीसी से कहा, "ट्रंप और नेतन्याहू के रुख़ में एक तरह का टकराव है."

वह कहते हैं, "नेतन्याहू युद्ध जारी रखना चाहते हैं. उन्होंने वादा किया था कि यह युद्ध इसराइल के सभी बड़े ख़तरों को ख़त्म कर देगा और शायद ईरान में सत्ता परिवर्तन की स्थिति भी पैदा करेगा. लेकिन अभी उनके वादों और ज़मीनी हालात के बीच फ़र्क दिख रहा है."

उनका कहना है कि अगर ट्रंप सच में इस जंग से बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहे हैं, तो इसराइल के प्रधानमंत्री मुश्किल हालत में फँस सकते हैं.

मिलस्टीन कहते हैं, "यह एक तरह की 'कैच-22' स्थिति है. अगर बातचीत होती है, तो वह युद्ध आगे नहीं बढ़ा पाएँगे, और वह डोनाल्ड ट्रंप से यह भी नहीं कह सकते कि 'मैं आपके बिना युद्ध जारी रखूँगा.' उन्हें पता है कि इसे स्वीकार करना पड़ेगा."

लेकिन नेतन्याहू एक बेहद नाज़ुक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इसराइली जनता से वादा किया था कि यह युद्ध ईरान और क्षेत्र में मौजूद सहयोगी समूहों से पैदा हुए तात्कालिक ख़तरे को ख़त्म कर देगा.

युद्ध के इस दौर में, किसी भी समझौते को इसराइली वोटर्स और अपने सहयोगियों के सामने स्वीकार्य बनाना उनके लिए आसान नहीं है. इसके लिए मानक अब काफ़ी ऊँचे हो चुके हैं.

लिकुड पार्टी के सांसद डैन इलूज़ ने कहा, "इसराइली लोग चाहते हैं कि जंग ख़त्म हो. लेकिन हमारा मानना है कि इसका सही अंत तभी होगा जब हम इस शासन को हरा दें, न कि इसे ऐसे ही छोड़ दें कि यह बार-बार हमें परेशान करता रहे."

उन्होंने कहा, "हम पहले भी रोकथाम की नीति अपना चुके हैं, हमने हमास के साथ ऐसा किया था, और 7 अक्तूबर को उसका नतीजा हमने देखा. इसलिए हम नहीं चाहते कि ईरान के साथ भी वही दोहराया जाए."

सोमवार को राष्ट्रपति ट्रंप से बात करने के बाद नेतन्याहू ने कहा कि इसराइल, ईरान और लेबनान दोनों पर हमले जारी रखेगा और "सभी हालात में अपने अहम हितों की रक्षा करेगा."

इसराइल के रक्षा मंत्री ने क्या कहा?

इसराइल के रक्षा मंत्री इसराइल कात्ज़ ने मंगलवार को कहा कि इसराइली सेना लेबनान में लितानी नदी के दक्षिण के बड़े इलाक़े में एक सुरक्षा ज़ोन बनाएगी.

उन्होंने कहा कि वहाँ के लोगों को तब तक वापस नहीं आने दिया जाएगा, जब तक हिज़्बुल्लाह के हमलों से इसराइली समुदाय सुरक्षित नहीं हो जाते. हिज़्बुल्लाह को ईरान का समर्थन प्राप्त है.

ऐसा माना जा रहा है कि इसराइल, ईरान के साथ युद्ध ख़त्म करने का समझौता होने के बाद भी हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है.

तेल अवीव के इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़ के ईरान विश्लेषक डैनी सिट्रिनोविच का कहना है कि ईरान पर किसी समझौते की संभावना कम है, क्योंकि दोनों पक्षों के रुख़ और उम्मीदों में बहुत बड़ा अंतर है.

वह कहते हैं, "ईरान के नज़रिए से वह हार नहीं रहे, बल्कि जीत रहे हैं, इसलिए वह मुआवज़ा और गारंटी की मांग करेंगे. वहीं दूसरी तरफ ट्रंप को लगता है कि ईरान शुरुआत से ही अमेरिका की सभी शर्तें मान लेगा."

उनका कहना है कि समझौते तक पहुँचने के लिए ट्रंप और नेतन्याहू को या तो ईरान में सत्ता परिवर्तन करना होगा या अपनी शर्तों में ढील देनी होगी.

सिट्रिनोविच कहते हैं, "यह (ईरानी) शासन आसानी से झुकने वाला नहीं है, वह अमेरिका को ऐसी कोई चीज़ नहीं देंगे जो उन्होंने युद्ध से पहले नहीं दी थी. अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की एक अहम कड़ी, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ उनके नियंत्रण में है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है. फ़िलहाल ईरान ने इसे बाधित कर रखा है. इसलिए उन्हें बातचीत में बढ़त महसूस हो रही है."

ट्रंप के किस फ़ैसले से बढ़ा ईरान का आत्मविश्वास

राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ नहीं खोलने पर वो ईरान के ऊर्जा ढाँचे पर बड़े पैमाने पर हमला करेंगे, लेकिन पिछले हफ़्ते ट्रंप ने ये अल्टीमेटम वापस ले लिया. इससे ईरान का आत्मविश्वास और बढ़ा है.

दरअसल ईरान के मध्य-पूर्व में अमेरिका से जुड़े ऊर्जा ठिकानों पर जवाबी हमले की चेतावनी देने के बाद ट्रंप ने यह धमकी वापस ली है.

विश्लेषकों का कहना है कि नई बातचीत के लिए अमेरिका की तैयारियों का संकेत देकर ट्रंप को ज़्यादा नुक़सान नहीं है.

हो सकता है ट्रंप का मक़सद ऊर्जा बाज़ार को शांत करना हो, ईरान के नेतृत्व में मतभेद पैदा करना हो या नई सैन्य कार्रवाई के लिए समय हासिल करना हो.

एक जानकार ने कहा कि अगर शुक्रवार को अचानक ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका की नई सैन्य कार्रवाई शुरू हो जाए, तो यह चौंकाने वाला नहीं होगा.

यह युद्ध अब झुकने और ज़्यादा बढ़ने के बीच खड़ा नज़र आ रहा है, जहाँ अभी कोई भी पक्ष इतना कमज़ोर नहीं है कि वह अपने दुश्मन की शर्तों पर समझौता कर ले.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.