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ईरान और इसराइल का मीडिया ट्रंप के 'बातचीत' वाले बयान पर क्या कह रहा है?
- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
ईरानी अधिकारियों ने इस बात से साफ़ इनकार किया है कि सीज़फ़ायर को लेकर उनकी अमेरिका से कोई बातचीत चल रही है.वहां के मीडिया ने भी यही रुख़ अपनाया हुआ है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 23 मार्च को कहा कि उन्होंने ईरान के साथ 'बहुत अच्छी बातचीत' के बाद ईरानी ठिकानों पर किसी भी तरह के हमलों को पांच दिनों के लिए टालने का फ़ैसला किया है.
ट्रंप ने 21 मार्च को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि यदि ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट नहीं खोला, तो ईरान के पावर प्लांट्स को निशाना बनाया जाएगा.
23 मार्च की देर रात, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने अपने ताज़ा मिसाइल हमलों को सही ठहराते हुए कहा कि 'बच्चों के हत्यारे हमलावरों' से बातचीत का यही सही तरीक़ा है.
ईरान के मुख्य सैन्य कमान ख़त्म-उल-अंबिया सेंट्रल हेडक़्वार्टर्स के प्रवक्ता ने होर्मुज़ स्ट्रेट पर साझा नियंत्रण के ट्रंप के सुझाव को ख़ारिज करते हुए कहा कि फ़ारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में पूरी तरह ईरान का नियंत्रण है.
कर्नल इब्राहिम ज़ोलफ़क़ारी ने कहा कि "क्षेत्र के बाहर के देशों को फ़ारस की खाड़ी की सुरक्षा व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है," और यह भी ज़ोर दिया कि ईरान की सशस्त्र सेनाएं क्षेत्रीय देशों के साथ मिलकर बिना बाहरी दखल के वहां की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं.
क्या कह रहा है ईरानी मीडिया
कट्टरपंथी सांसद इस्माइल कोवसारी ने कहा कि "अमेरिका के साथ बातचीत को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया है और न ही उठाया जाएगा," उन्होंने ट्रंप को "लापरवाह जुआरी" बताया.
संसद के उपाध्यक्ष अली निकज़ाद ने कहा, "हम ऐसे झूठे व्यक्ति से बातचीत नहीं करेंगे जिसमें सम्मान, मानवता या विवेक का कोई निशान नहीं है."
कई कट्टरपंथी नेताओं और सरकार समर्थक ऑनलाइन यूज़र्स ने ट्रंप के रुख़ में बदलाव को उनके "पीछे हटने" के तौर पर पेश किया.
24 मार्च को, कुछ अखबारों ने लिखा कि ट्रंप ईरान के साथ बातचीत के बारे में "साफ़ तौर पर झूठ बोल रहे हैं" और उनके रुख़ को 'कायरता' कहा.
कट्टरपंथी माने जाने वाले अख़बार फ़रहीक्तगॉन ने चेतावनी दी कि बातचीत के संकेत को अलग-थलग नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे अमेरिका की बहु-स्तरीय रणनीति के हिस्से के रूप में समझना चाहिए, जिसमें राजनीतिक, आर्थिक और खुफ़िया लक्ष्य शामिल हैं.
अल्ट्रा कंजर्वेटिव माने जाने वाले नेता सईद जलीली ने होर्मुज़ स्ट्रेट पर ट्रंप के बदलते रुख़ का मज़ाक उड़ाते हुए इसे 'पीछे हटना' क़रार दिया.
आईआरजीसी से जुड़ी फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि "चार दशकों में ईरान को अमेरिका के साथ बातचीत से कभी कोई फ़ायदा नहीं हुआ" और अमेरिका की धमकियों के जवाब में ईरान को हमले करने पड़े.
पत्रकार पयम फ़ज़्लीनेजाद ने कहा कि अमेरिका अब मनोवैज्ञानिक युद्ध पर उतर सकता है और "धोखे के ज़रिए हमारी जीत को हार में बदल सकता है."
'अमेरिका कर रहा है फूट डालने की कोशिश'
कट्टरपंथी मीडिया और कुछ यूज़र्स ने उन रिपोर्ट्स का भी खंडन किया जिनमें कहा गया था कि अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ से संपर्क किया है.
एक इसराइली अधिकारी के हवाले से एक्सियोस ने रिपोर्ट की थी कि ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ़ और जेराड कुशनर ने ग़ालिबाफ़ से संपर्क किया था, जबकि कुछ अन्य सूत्रों ने दावा किया था कि अमेरिका ने उनके और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच बातचीत का प्रस्ताव रखा था.
आईआरजीसी की क़रीबी तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने 24 मार्च को कहा कि ऐसी रिपोर्ट्स का मकसद ईरान में आंतरिक मतभेद पैदा करना है.
इसी तरह फ़ार्स ने भी कहा कि यह 'गढ़ी हुई' बातचीत की कहानी ग़ालिबाफ़ की छवि खराब करने, मतभेद पैदा करने और 'हत्या की ज़मीन तैयार करने' के लिए बनाई गई है.
क्या कह रहा है इसराइली मीडिया
वहीं 24 मार्च को इसराइली मीडिया ने अमेरिका के इस एलान पर चिंता जताई कि वह ईरान के साथ बातचीत कर रहा है, हालांकि उसने ईरान की एनर्जी फ़ैसिलिटीज़ पर हमले टालने के डोनाल्ड ट्रंप के फ़ैसले की सीधे आलोचना करने से परहेज़ किया.
इससे एक दिन पहले, इसराइली मीडिया ने रिपोर्ट की थी कि होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए ट्रंप का ईरान को दिया गया 48 घंटों का अल्टीमेटम लड़ाई की दिशा तय करने वाला एक अहम मोड़ साबित हो सकता था.
तब दक्षिणपंथी मीडिया ने अमेरिका के संभावित हमलों का स्वागत किया और इसे अमेरिका के तुरंत फ़ैसले लेने की ताक़त बताया.
हालांकि इसके बाद ट्रंप ने घोषणा की कि उन्होंने हमला करने के इस फ़ैसले को टाल दिया है और कूटनीतिक समाधान तक पहुंचने के लिए वो ईरान के साथ बातचीत कर रहे हैं.
लेकिन ईरान ने ऐसी किसी भी बातचीत से इनकार किया है.
प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने 23 मार्च को एक वीडियो संदेश में कहा कि इसराइल के पास इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्सेस और अमेरिकी सेना की 'बड़ी उपलब्धियों' का फ़ायदा उठाकर समझौते के ज़रिए युद्ध के लक्ष्यों को हासिल करने का मौक़ा है.
नेतन्याहू ने यह भी कहा कि ईरान के साथ कोई समझौता इसराइल के 'अहम हितों' की रक्षा करेगा.
इसराइली मीडिया में डील पर बहस
इसराइली मीडिया ने चिंता जताई है कि अगर बातचीत होती है, तो ईरान इसराइल की अहम मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं होगा.
इस डील को लेकर 24 मार्च को येदिओट अहरनॉट अख़बार की हेडलाइन थी- 'चिंताजनक समर्पण'
अख़बार में कॉलम लिखने वाले मशहूर लेखक बेन-ड्रोर येमिनी ने लिखा, "डर है कि फिर से वही होगा. ईरान कभी युद्ध नहीं जीतता, लेकिन बातचीत में कभी हारता भी नहीं."
उन्होंने कहा, "भले ही ट्रंप का झुकने का इरादा न हो, लेकिन जैसे ही उन्होंने बातचीत का रास्ता चुना, ईरान ठीक उसी जगह पहुंच गया जहाँ वह चाहता था."
23 मार्च को चैनल 12 न्यूज़ पर विशेषज्ञों ने चर्चा की कि क्या कोई समझौता सच में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोक पाएगा. कुछ ने निराशा जताई और कहा कि इसराइल को तब तक ईरान पर हमले जारी रखने चाहिए, जब तक कोई और निर्देश न मिले.
चैनल 12 की संवाददाता डाना वेस ने कहा कि इसराइल की सुरक्षा कैबिनेट के भीतर समझौते की संभावना को लेकर मतभेद हैं.
उनके अनुसार, एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि उन्हें समझौते की "कोई संभावना नहीं" दिखती.
रिपोर्ट के मुताबिक, उस अधिकारी ने कहा कि ईरान के अपनी प्रमुख मांगों-जैसे एनरिच्ड यूरेनियम सौंपना, परमाणु कार्यक्रम खत्म करना और मिसाइल भंडार कम करना, को मानने की संभावना बहुत कम है.
दक्षिणपंथी अख़बार इसराइल हायोम के कूटनीतिक संवाददाता ऐरियल काह्ना ने भी कहा कि बातचीत से कोई ख़ास नतीजा निकलने की उम्मीद कम है.
उन्होंने कहा, "ईरान और ज़्यादा अड़ सकता है और इनकार कर सकता है. वह ऐसी शर्तें रखेगा जिन्हें अमेरिका और इसराइल मान नहीं सकते, और इससे बमबारी जारी रहेगी."
दक्षिणपंथी, नेतन्याहू समर्थक चैनल 14 ने कहा कि ट्रंप 'पहले झुके', और ये 'बेहद गंभीर' है.
लेकिन उसी चैनल पर कुछ पैनलिस्ट्स ने ट्रंप की तारीफ़ भी की और कहा कि वो बेहद चतुराई से क़दम उठा रहे हैं और बिन्यामिन नेतन्याहू के साथ मिलकर फ़ैसले ले रहे हैं.
टिप्पणीकार मोशे कोहेन एलिया ने कहा कि ट्रंप "सबको भ्रमित कर रहे हैं" और "दुश्मन को कन्फ्यूज कर रहे हैं." उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें "पूरा यक़ीन है कि ट्रंप आख़िर तक जाएंगे."
वहीं, उदारवादी अख़बार हारेत्ज़ के संपादकीय ने समझौते के लिए कूटनीतिक कोशिशों का समर्थन किया.
अख़बार ने लिखा, "इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि ऐसा समझौता ज़रूरी है जो यह सुनिश्चित करे कि ईरान परमाणु शक्ति न बने."
साथ ही कहा गया, "अमेरिका और ईरान को बिना किसी रुकावट के बातचीत करने दी जानी चाहिए. तीन हफ़्तों से ज़्यादा समय से जारी हिंसा के बाद अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को मौका देने का समय आ गया है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित