बीबीसी स्टडी: 2020 से भारत में क्रिकेट खेलने वाली महिलाओं की तादाद दोगुनी

हरमनप्रीत कौर (बाएं) और स्मृति मंधाना भारतीय महिला टीम के विश्व कप जीतने का जश्न मनाते हुए (तस्वीर: 2 नवंबर, 2025)

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भारत के 14 राज्यों में किए गए एक अध्ययन से ऐसा लगता है कि क्रिकेट में भारतीय महिलाओं की भागीदारी वर्ष 2020 से दोगुनी हो गई है.

स्टडी के मुताबिक़ अब हर 10 में से एक महिला क्रिकेट खेल रही है.

बीबीसी और कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से कराए गए इस अध्ययन से ऐसा लगता है कि पिछले छह महीनों के दौरान हर दो में से एक शख़्स (51 फ़ीसदी) ने महिला खेलों की कवरेज देखी है.

यह आँकड़ा उन लोगों की तादाद (63 फ़ीसदी) से बहुत कम नहीं है, जो पुरुषों की खेल कवरेज को देखते हैं.

खेलों में महिलाओं के हिस्सा लेने और महिला खेल देखने के मामले में इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह 15 से 24 साल की युवा महिलाओं की भागीदारी है.

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हर चार में से एक (क़रीब 26 फ़ीसदी) युवा महिलाओं का कहना है कि उन्होंने खेल को करियर के विकल्प के रूप में चुना है जबकि 2020 में यह संख्या 16 फ़ीसदी थी.

महिलाओं के खेल को चुनने के प्रतिशत का चार्ट

क्रिकेट खेलने में महिला-पुरुष का अंतर घटा

26 नवंबर, 2025 की इस तस्वीर में आईसीसी महिला वर्ल्ड कप 2025 जीतने वाली भारतीय टीम की खिलाड़ी राष्ट्रपति भवन में बैठी नज़र आ रही हैं जहां राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने टीम का सम्मान किया था

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इमेज कैप्शन, 26 नवंबर, 2025 की इस तस्वीर में आईसीसी महिला वर्ल्ड कप 2025 जीतने वाली भारतीय टीम की खिलाड़ी राष्ट्रपति भवन में बैठी नज़र आ रही हैं जहां राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने टीम का सम्मान किया था

बीबीसी और कलेक्टिव न्यूज़रूम के लिए बीबीसी की 'इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर' पहल के तहत ग्लोबल रिसर्च कंपनी 'कैंटार' ने भारत के 14 राज्यों में 10,304 लोगों का इंटरव्यू किया.

इससे मिले आँकड़ों की तुलना 2020 में किए गए इसी तरह के एक अध्ययन से की गई, ताकि खेलों में भारतीय महिलाओं की भागीदारी और उनके बारे में समाज के नज़रिए को समझा जा सके.

इस साल के नतीजे ऐसे समय में आए हैं, जब भारतीय महिला खिलाड़ियों ने बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं.

मनु भाकर को बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर 2024 चुना गया था
इमेज कैप्शन, मनु भाकर को बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर 2024 चुना गया था

पिछले दो सालों में निशानेबाज़ मनु भाकर का 2024 पेरिस ओलंपिक में ऐतिहासिक दो मेडल जीतना, पैरा ओलंपिक्स में भारतीय महिला खिलाड़ियों का 10 मेडल जीतना और 2025 में घरेलू मैदान पर महिला क्रिकेट टीम का वनडे वर्ल्ड कप जीतना सुर्ख़ियों में रहा है.

कामयाबी की ऐसी कहानियाँ लोगों का ध्यान खींच रही हैं.

इस सर्वे में शामिल 43 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने महिला खेलों को लाइव देखा, जबकि पुरुषों के खेलों के लिए यह आँकड़ा 54 फ़ीसदी था.

मैदान पर जाकर मैच देखने के मामले में यह फ़र्क और भी कम है. सर्वे के अनुसार 29 फ़ीसदी लोगों ने महिला खेल और 37 फ़ीसदी ने पुरुषों के खेल स्टेडियम में देखे.

इन सफलताओं से प्रेरित होकर क्रिकेट और बैडमिंटन खेलने वाली महिलाएँ बढ़ीं

इस अध्ययन के अनुसार खेल में भागीदारी के मामले में क्रिकेट अब पुरुषों और महिलाओं दोनों की पहली पसंद है.

पिछले अध्ययन के बाद से क्रिकेट खेलने में महिला-पुरुष का अंतर कम हुआ है.

2020 में महिलाओं की तुलना में पाँच गुना ज़्यादा पुरुष क्रिकेट खेलते थे लेकिन 2026 में यह फ़र्क कम होकर अब केवल तीन गुना रह गया है.

चार्ट: 2026 में क्रिकेट में जेंडर अंतर (60/40)

बैडमिंटन की लोकप्रियता भी बढ़ी

क्रिकेट के अलावा महिलाओं में बैडमिंटन की लोकप्रियता भी बढ़ी है. सर्वे में शामिल छह फ़ीसदी महिलाएँ अब इसमें हिस्सा ले रही हैं.

2020 में यह संख्या चार फ़ीसदी थी.

दक्षिण में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना और उत्तर में पंजाब जैसे राज्यों की महिलाओं में बैडमिंटन के लिए ख़ास उत्साह देखा गया.

पीवी सिंधु, साइना नेहवाल और तन्वी शर्मा जैसी दिग्गज बैडमिंटन खिलाड़ी इन्हीं क्षेत्रों से आती हैं.

खेलों में बढ़ती भागीदारी और दर्शकों की संख्या की बड़ी वजह महिला खिलाड़ियों से जुड़ाव महसूस करना है.

सर्वे में शामिल एक तिहाई (33 फ़ीसदी) लोगों ने महिला खेल देखने की वजह 'महिला खिलाड़ी का समर्थन करना' बताया.

2020 में यह आँकड़ा 21 फ़ीसदी था. पुरुषों के खेलों में केवल 17 फ़ीसदी लोगों ने किसी खिलाड़ी के व्यक्तिगत समर्थन को वजह बताया.

इसके अलावा इस साल हर दो में से एक महिला (51 फ़ीसदी) ने इस सवाल का जवाब दिया कि उनके आसपास के लोग किस भारतीय महिला खिलाड़ी को सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं.

साल 2020 की तुलना में इसमें सात प्रतिशत प्वाइंट का इज़ाफ़ा हुआ है.

चार्ट: महिला खिलाड़ियों के आकर्षक दिखने की सोच पर चार्ट

न खेलने की बड़ी वजह सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ

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जो महिलाएँ फ़िलहाल कोई खेल नहीं खेलतीं, उनमें से 13 फ़ीसदी ने इसका कारण सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को बताया.

अध्ययन के अनुसार सर्वे वाले राज्यों में यह संख्या लगभग तीन करोड़ 27 लाख महिलाओं के बराबर है.

यह समस्या उन राज्यों में ज़्यादा देखी गई, जहाँ पिछले दशक में लैंगिक हिंसा की ख़बरें अधिक रही हैं.

सफलताओं के बावजूद सामाजिक बंदिशें और बढ़ीं

अध्ययन में यह भी पता चला कि खेलने और खेल देखने में बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद महिला खेलों को लेकर कुछ 'नकारात्मक सोच' और 'बंदिशें' 2020 के मुक़ाबले और गहरी हुई हैं.

स्टडी के मुताबिक़ दस में से चार से ज़्यादा (43 फ़ीसदी) लोगों का मानना है कि महिलाओं के खेल पुरुषों के मुक़ाबले कम मनोरंजक होते हैं (जो पहले 38 फ़ीसदी था).

इसी तरह महिला खिलाड़ियों के 'महिला की तरह' न दिखने की बात कहने वालों की संख्या भी 37 फ़ीसदी से बढ़कर 43 फ़ीसदी हो गई है.

ध्यान देने की बात यह है कि ऐसी राय केवल पुरुषों की नहीं थी.

स्टडी के मुताबिक़ 46 फ़ीसदी का मानना था कि महिला खिलाड़ियों को आकर्षक दिखना चाहिए, और इस बात से सहमत होने की संभावना पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक थी.

चार्ट: 2026 में महिला खेल प्रतियोगिता देखने के कारण. सुरक्षा अब भी कई महिलाओं के लिए बड़ी बाधा

समय की कमी: खेल छोड़ने की बड़ी वजह

इस सर्वे से पता चला कि भले ही क्रिकेट खेलने वालों की संख्या बढ़ी है लेकिन कुल मिलाकर खेल में हिस्सा लेने वाले भारतीयों की संख्या में बहुत मामूली सुधार हुआ है. ऐसा सभी खेलों में है.

अध्ययन करने वालों ने इस बात पर चिंता जताई है कि समय की कमी के कारण भारतीय खेल खेलने की आदत छोड़ रहे हैं.

इस सर्वे में शामिल 74 फ़ीसदी (2020 में 69 फ़ीसदी) भारतीयों ने कहा कि वह बचपन में खेलते थे लेकिन उनमें से केवल आधे ही बड़े होने पर इसे जारी रख पाए.

सर्वे में शामिल खेल न खेलने वाले दो तिहाई (65 फ़ीसदी) लोगों ने कहा कि उनके पास इसके लिए समय ही नहीं है.

अध्ययन के अनुसार यह वर्क-लाइफ़ बैलेंस (काम और निजी जीवन में संतुलन) की कमी के चिंताजनक रुझान को दर्शाता है.

इसमें कहा गया कि बेहतर संतुलन का सबसे ज़्यादा फ़ायदा महिलाओं को होगा, क्योंकि वह आज भी काम के साथ-साथ घर और बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी ज़्यादा निभाती हैं.

मेथडोलॉजी

यह सर्वे 'कैंटार इंडिया' ने किया है. साल 2020 का अध्ययन भी इसी ने किया था.

इस प्रोजेक्ट के लिए 14 भारतीय राज्यों में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 10,304 लोगों का निजी स्थानों पर टैबलेट के माध्यम से आमने-सामने इंटरव्यू किया गया.

सर्वे में उम्र, लिंग, सामाजिक-आर्थिक वर्ग और ग्रामीण-शहरी आबादी के सैंपल का पूरा ध्यान रखा गया.

दोनों सर्वे में तुलना की जा सके, इसके लिए 2020 वाला ही तरीक़ा अपनाया गया और पुराने सर्वे के सवालों की तुलना में इस बार कुछ ही नए सवाल जोड़े गए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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