बांग्लादेश में न संसद है और न स्पीकर, फिर नई सरकार को शपथ कौन दिलाएगा?

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- Author, तफ़सीर बाबू
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
चुनाव के बाद कौन सी राजनीतिक पार्टी सरकार बनाती है? इसका जवाब तो सबको मालूम है कि जो पार्टी या गठबंधन चुनाव जीतेगा या जिसे सबसे ज़्यादा सीटें मिलेंगी, वही सरकार बनाएगा.
चुनाव आयोग की ओर से घोषित अनौपचारिक चुनावी नतीजों से साफ़ हो गया है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत यानी डेढ़ सौ से ज़्यादा सीटें मिल गई हैं.
लेकिन नई सरकार के गठन या सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं.
संविधान के मुताबिक़, सत्ता के हस्तांतरण या नई सरकार के गठन की प्रक्रिया नए चुने सदस्यों के शपथ ग्रहण के ज़रिए शुरू होगी.
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लेकिन इस शपथ ग्रहण की प्रक्रिया पर अनिश्चितता पैदा हो गई है.
कितने दिनों के भीतर शपथ लेना ज़रूरी?

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इस सवाल का जवाब यह है कि आमतौर पर चुनावी नतीजों के एलान के तीन दिनों के भीतर शपथ दिलाई जाती है.
लेकिन इसमें भी एक पेंच है. आमतौर पर चुनाव आयोग की ओर से एक या दो दिनों के भीतर जिन अनौपचारिक नतीजों का एलान किया जाता है उसे आधिकारिक नतीजा नहीं माना जाता.
यानी चुनाव आयोग की ओर से नतीजों के एलान के तीन दिनों के भीतर शपथ लेना ज़रूरी नहीं है.
संविधान के अनुच्छेद 148 में कहा गया है कि चुनावी नतीजों को सरकारी गजट के ज़रिए अधिसूचित करना होगा और उसके तीन दिनों के भीतर निर्वाचित सदस्यों के लिए शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करना होगा.
ऐसे में आयोग की ओर से नतीजों के एलान के बाद गजट अधिसूचना जारी होने में और कुछ दिन का समय लग सकता है.
इस बीच, अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के प्रेस सचिव ने पत्रकारों को बताया है कि उनकी राय में शपथ ग्रहण समारोह में 18 फ़रवरी से ज़्यादा देरी नहीं होगी.
प्रेस सचिव ने बीती पांच फ़रवरी को पत्रकारों से बातचीत में कहा था, "सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया बहुत कम समय में पूरी हो जाएगी. यह आधिकारिक नतीजों के तीन दिनों के भीतर हो जाएगा. 15 या 16 फ़रवरी तक ऐसा हो सकता है. मुझे नहीं लगता कि इस काम में 17 या 18 फ़रवरी से ज़्यादा देरी होगी."
यानी इससे साफ़ है कि सब कुछ ठीक रहने की स्थिति में चुनाव के बाद छह दिनों के भीतर ही नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है.
निर्वाचित सदस्यों को शपथ कौन दिलाएगा?

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अब यह सवाल उठ रहा है कि निर्वाचित सदस्यों को पद और गोपनीयता की शपथ कौन दिलाएगा?
इसकी वजह यह है कि नियमों के तहत इससे पहले राष्ट्रीय संसद के स्पीकर ही निर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाते रहे हैं.
लेकिन साल 2024 में छात्रों और आम लोगों के आंदोलन के बाद बदली हुई परिस्थिति में देश में न तो संसद है और न ही स्पीकर. डिप्टी स्पीकर भी जेल में हैं.
तो ऐसे में आख़िर क्या उपाय है?

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ऐसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 148 का सहारा लेना होगा.
उसमें कहा गया है, संसदीय चुनाव के नतीजों की गजट अधिसूचना जारी होने की तारीख़ से तीन दिनों के भीतर संविधान में इसके लिए तय व्यक्ति या उसकी ओर से चुना गया कोई व्यक्ति अगर निर्वाचित सदस्यों को शपथ नहीं दिलाता या इसमें नाकाम रहता है तो उसके तीन दिनों के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त सदस्यों को शपथ दिलाएंगे.
ऐसी स्थिति में संविधान के तहत उनको ही इसका अधिकार दिया गया है.
इस अनुच्छेद में ऐसी परिस्थिति से निपटने के दो तरीके़ बताए गए हैं. इनमें पहला है कि राष्ट्रपति शपथ दिलाने के लिए किसी व्यक्ति को मनोनीत कर सकते हैं.
दूसरा यह है कि अगर राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत व्यक्ति तीन दिनों के भीतर शपथ नहीं दिला पाता तो अगले तीन दिनों के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त इस काम को पूरा करेंगे.
अंतरिम सरकार के क़ानून मंत्रालय के सलाहकार आसिफ़ नज़रुल ने इस मुद्दे पर बीती पांच फ़रवरी को पत्रकारों से बातचीत की थी. उस समय उनका कहना था कि सरकार चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद शीघ्र सत्ता का हस्तांतरण करना चाहती है.
आसिफ़ ने कहा था, "यह सरकार का नीतिगत फैसला है. हमारे सामने दो विकल्प हैं. एक यह है कि राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत कोई व्यक्ति शपथ दिला दे. मिसाल के तौर पर वो व्यक्ति हमारे मुख्य न्यायाधीश हो सकते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो देश के मुख्य चुनाव आयुक्त यह ज़िम्मेदारी निभाएंगे."
आसिफ़ के मुताबिक़, दूसरे मामले में दिक्कत यह है कि तीन दिनों तक इंतज़ार करना होगा.
उन्होंने कहा, "दरअसल, हम इंतज़ार नहीं करना चाहते. चुनाव के बाद जितनी जल्दी हो सके, शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करना चाहते हैं."
शपथ ग्रहण के बाद क्या होगा?

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शपथ ग्रहण का मामला तय होने के बाद भी कुछ सवाल रह जाते हैं. यानी सत्ता किसे और कैसे मिलेगी यानी सरकार का गठन कौन करेगा?
शपथ ग्रहण के बाद यह प्रक्रिया राष्ट्रपति के ज़रिए आगे बढ़ेगी. वो (राष्ट्रपति) बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता देंगे.
पार्टी को न्योता देने का मतलब उसके नेता को न्योता देना है. संसदीय सीटों की संख्या के मुताबिक़ देश में सरकार के गठन के लिए कम से कम 151 सीटों की ज़रूरत है.
बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन के नेता पहले संसद के नेता बनेंगे और उसके बाद न्योता मिलने पर सरकार का गठन करेंगे.
राष्ट्रपति उसे प्रधानमंत्री के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ दिलाने के बाद इस पद पर नियुक्त करेंगे.
संविधान के अनुच्छेद 56 में कहा गया है कि राष्ट्रपति संसद के उस सदस्य को प्रधानमंत्री नियुक्त करेंगे जिसे उनकी नज़र में संसद के अधिकांश सदस्यों का समर्थन हासिल होगा.
प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्यों को शपथ लेने के साथ ही स्वतः उन पदों से जुड़े अधिकार मिल जाएंगे.
इस प्रक्रिया के ज़रिए ही सत्ता हस्तांतरण होने के बाद नई सरकार का गठन हो जाएगा.
संविधान के मुताबिक़, शपथ ग्रहण करने के बाद मान लिया जाएगा कि उन्होंने अपना कार्यभार संभाल लिया है.
संविधान के अनुच्छेद 148 में कहा गया है, "इस संविधान के मुताबिक़ किसी भी व्यक्ति के लिए कार्यभार संभालने से पहले शपथ लेना अनिवार्य है. ऐसे में शपथ ग्रहण पूरा हो जाने के बाद मान लिया जाएगा कि उन्होंने अपना कार्यभार संभाल लिया है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.













