ईरान जंग ने फिर जगाया 'इस्लामी नेटो' का सपना, लेकिन क्या ये पूरा हो पाएगा?

पाकिस्तान और सऊदी अरब ने 2025 में 'रणनीतिक पारस्परिक रक्षा' समझौते पर हस्ताक्षर किए थे

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    • Author, मुन्ज़ा अनवर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू,इस्लामाबाद
  • पढ़ने का समय: 14 मिनट

ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले के बाद मध्य पूर्व जंग की चपेट में है.

इससे बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री हमद बिन जासिम बिन जबर अल थानी का एक सुझाव चर्चा में है

अब एक बार फिर अरब-इस्लामी राजनीतिक और सैन्य गठबंधन की बहस ज़ोर पकड़ रही है.

हमद बिन जासिम बिन जबर अल थानी ने खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों को तुरंत अपने मतभेद ख़त्म कर 'नेटो' की तर्ज़ पर एक प्रभावी सैन्य और सुरक्षा गठबंधन' बनाने का सुझाव दिया है.

उनका कहना है कि इस गठबंधन में "सऊदी अरब केंद्रीय भूमिका निभाए और पाकिस्तान और तुर्की के साथ गहरा सहयोग हो."

यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका ने ईरान पर हमले के लिए अतिरिक्त अमेरिकी सैनिक (कम से कम पांच हज़ार) और युद्धपोत मध्य पूर्व भेजने का एलान किया है.

याद रहे कि इससे पहले मुस्लिम गठबंधन बनाने का विचार सितंबर 2024 में तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैय्यप अर्दोआन ने पेश किया था.

उस वक़्त उन्होंने इसराइल के कथित विस्तारवादी ख़तरे का मुक़ाबला करने के लिए मुस्लिम देशों को एकजुट होने का सुझाव दिया था.

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वहीं, सितंबर 2025 में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने भी 'इस्लामी नेटो' के गठन की मांग की थी.

साल 2017 में सऊदी अरब के नेतृत्व में बने 34 इस्लामी देशों के सैन्य गठबंधन की कमान पूर्व पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ को सौंपी गई थी.

उस समय सऊदी नेताओं ने कहा था कि यह गठबंधन 'आतंकवाद' और 'चरमपंथ' के ख़िलाफ़ काम करेगा.

तब ईरान ने इस गठबंधन का नेतृत्व जनरल राहील शरीफ़ को सौंपे जाने पर गहरी चिंता और आपत्ति जताई थी.

उस समय भी खाड़ी देशों के बीच ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय हितों के टकराव की वजह से इस गठबंधन पर सवाल उठे थे. ये अब भी मौजूद हैं और किसी भी नए गठबंधन के रास्ते में बड़ी बाधा हैं.

यमन के मुद्दे पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के मतभेद और क़तर और अमीरात के बीच अतीत का तनाव इसके प्रमुख उदाहरण हैं.

यमन युद्ध ने सऊदी अरब और यूएई के अलग-अलग भौगोलिक और राजनीतिक हितों को उजागर किया है. इसी तरह 'ओपेक' में तेल उत्पादन के फ़ैसलों, अफ़्रीका और लाल सागर में प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों पर भी उनका रुख़ एक-दूसरे से अलग रहा है.

इसके अलावा समुद्री सीमा विवाद और 'यासात' क्षेत्र को 'मरीन प्रोटेक्टेड एरिया' घोषित करने जैसे मामलों पर भी दोनों के बीच तनाव सामने आ चुका है. इन मामलों में कुछ विश्लेषक इसे खाड़ी क्षेत्र की इन दो ताक़तों के बीच जारी 'ख़ामोश मुक़ाबला' बताते हैं.

ऐसी रस्साकशी को देखते हुए सवाल यह है कि 'गल्फ़ नेटो' के गठन की सोच किस हद तक सच हो सकती है और इसमें क्या रुकावटें आ सकती हैं?

जीसीसी के नेतृत्व में एक सैन्य और रक्षा औद्योगिक आधार बनाने का लक्ष्य कितना व्यावहारिक है और इस पर अमेरिका की संभावित प्रतिक्रिया क्या हो सकती है?

और अगर खाड़ी देश तुर्की और पाकिस्तान के साथ सैन्य और रक्षा सहयोग बढ़ाना चाहें तो पाकिस्तान वास्तव में किस हद तक यह भूमिका निभा सकता है?

क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री ने क्या कहा?

क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री हमद बिन जासिम बिन जबर

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इमेज कैप्शन, क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री हमद बिन जासिम बिन जबर अल थानी ने अरब-इस्लामी देशों के रणनीतिक और सैन्य गठबंधन का विचार पेश किया है

क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री ने राजनीतिक और सैन्य गठबंधन के विचार को आगे बढ़ाते हुए कहा, "हमारे क्षेत्र का वर्तमान युद्ध कभी न कभी ख़त्म हो जाएगा लेकिन इससे सबक़ और सीख लेना ज़रूरी है."

उन्होंने 'एक्स' पर लिखा, "गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल को एकता और एकजुटता के साथ एक प्रभावी और वास्तविक सैन्य और सुरक्षा गठबंधन बनाना होगा, जैसे कि नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन यानी नेटो है." उन्होंने प्रस्ताव दिया कि इसमें "सऊदी अरब को सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए क्योंकि वह सबसे बड़ा देश है."

हमद बिन जासिम ने ज़ोर दिया कि युद्ध समाप्त होने का इंतज़ार किए बिना तैयारी शुरू की जाए और मतभेद ख़त्म किए जाएं ताकि जनता को सुरक्षित रखा जा सके.

उन्होंने ईरान का उदाहरण देते हुए कहा, "पाबंदियों के बावजूद उसने मिसाइल इंडस्ट्री लगाई और अफ़सोस कि उन्हीं मिसाइलों से खाड़ी देशों को निशाना बनाया गया."

हालांकि उनका यह भी कहना था कि इस जंग की ज़िम्मेदारी इसराइल पर आती है, "जिसने क्षेत्र में सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व हासिल करने के लिए आग भड़काई."

हमद बिन जासिम ने सुझाव दिया कि खाड़ी देश इसराइल और ईरान दोनों के ख़िलाफ़ एकजुट हों.

उन्होंने लिखा, "ईरान पड़ोसी है, इसलिए उसके साथ बातचीत के लिए स्पष्ट रणनीति ज़रूरी है जबकि इसराइल के साथ संबंध अच्छे पड़ोस और फ़लस्तीनी अधिकारों के संरक्षण के आधार पर होने चाहिए."

आख़िर में उन्होंने कहा कि गल्फ़ काउंसिल के देशों पर हमलों के बावजूद कई अरब देशों की चुप्पी ताज्जुब की बात है.

उन्होंने कहा, "यही स्थिति खाड़ी देशों को तुरंत एक सैन्य, सुरक्षा और भौगोलिक गठबंधन बनाने पर मजबूर करती है जो तुर्की और पाकिस्तान के साथ मज़बूत संबंध रखे लेकिन अपने 'धरती पुत्रों' पर भी भरोसा करे."

सोशल मीडिया पर बहस

जनरल राहील शरीफ़

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इमेज कैप्शन, साल 2017 में सऊदी अरब के नेतृत्व में बने 34 इस्लामी देशों के सैन्य गठबंधन की कमान पूर्व पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ को सौंपी गई थी

हमद बिन जासिम के सोशल मीडिया पोस्ट ने एक नई बहस छेड़ दी है.

जेद्दाह में रहने वाले पत्रकार सालेह अल-फ़हीद ने इस पर टिप्पणी करते हुए सवाल किया, "ऐसे में सहमति और गठबंधन कैसे संभव है जब छोटे देश बड़े देश से नेतृत्व छीनने की कोशिश करते हैं? एकजुटता और समझौता कैसे हो जब छोटे देश बड़े के ख़िलाफ़ नफ़रत और हस्तक्षेप की नीति पर अड़े रहते हैं?"

उन्होंने 'एक्स' पर लिखा, "वर्षों तक सऊदी अरब ने बहादुरी और दृढ़ता के साथ ईरानी मंसूबों के ख़िलाफ़ खड़े होकर उसके विस्तार को रोकने के लिए बहुत कुछ सहा जबकि कुछ लोग तेहरान की तरफ़ दौड़ते रहे. उसके साथ गुपचुप समझौते करते रहे और ईरान के साथ संबंधों सहित दूसरे मामलों में सऊदी अरब को उलझाते रहे."

सालेह अल-फ़हीद ने हमद बिन जासिम से पूछा, "आपने बहुत ख़ूबसूरत बात की मगर क्या खाड़ी के छोटे देश सच में इसके लिए तैयार हैं?"

क़तर के एक वरिष्ठ राजनयिक हमद बिन अब्दुलअज़ीज़ अल-कवारी ने हमद बिन जासिम से सहमति जताते हुए लिखा, "इलाक़े की आज़माइश बस एक अस्थायी संकट नहीं, बल्कि हमारे लिए एक वजूद का इम्तिहान था जिसने हमारी पहचान, दिशा और भविष्य को परखा."

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा और रणनीतिक गठबंधन की समीक्षा करनी चाहिए और पाकिस्तान और तुर्की जैसे 'मुस्लिम भाइयों' के साथ साझेदारी मज़बूत करनी चाहिए.

सऊदी अरब से बदर नाम के यूज़र ने कमेंट में लिखा, "सऊदी अरब कोई ऐसा देश नहीं है जो किसी के संरक्षण की तलाश में हो. यह राजनीतिक और सैन्य रूप से अपनी सुरक्षा और अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है और इसे किसी खाड़ी सैन्य गठबंधन की ज़रूरत नहीं है. इसके उलट दूसरे छोटे खाड़ी देश सऊदी अरब के बिना अकेले खड़े नहीं हो सकते."

उन्होंने इसके बाद कहा, "जो कोई सऊदी अरब के साए में शरण लेना चाहे, उसके लिए दरवाज़ा खुला है. लेकिन जो ईरान की शरण लेना पसंद करे तो नतीजे भी भुगतने के लिए तैयार रहे. क़तर ने पहले ऐसा किया था. यूएई इसराइल को अपनी सुरक्षा गारंटी समझकर उसके साथ गया था.'

कुछ लोग हमद बिन जासिम से इस बात पर नाराज़ दिखे कि उन्होंने क्षेत्र के देशों में अमेरिकी अड्डों पर बात नहीं की, क्योंकि "सारी समस्या यहीं से शुरू होती है. अमेरिका के सामने अरबों का घुटने टेकना बंद होना चाहिए."

वहीं पाकिस्तानी यूज़र्स टिप्पणी कर रहे हैं, "अचानक सबको पाकिस्तान के साथ सैन्य गठबंधन चाहिए..."

अरब देशों में ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता और 'गल्फ़ नेटो' का सपना

खाड़ी देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञ ये सवाल उठा रहे हैं कि खाड़ी देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता के देखते हुए क्या नेटो की तर्ज़ पर अरब-इस्लामी देशों का सैन्य और रणनीतिक गठबंधन संभव है?

सऊदी अरब, यूएई और कतर के बीच ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता के मद्देनज़र 'गल्फ़ नेटो' के गठन की सोच कितनी सच हो सकती है और कौन सी बड़ी चुनौतियां इसके रास्ते में बाधा बन सकती हैं?

मेहरान कामराफ़ा जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी, क़तर में प्रोफ़ेसर और अरब सेंटर फ़ॉर रिसर्च एंड पॉलिसी स्टडीज़ में रिसर्च यूनिट के डायरेक्टर हैं.

उनके अनुसार, "इतिहास ने हमें दिखाया है कि जब भी खाड़ी सहयोग परिषद किसी संकट का सामना करती है तो यह एकजुट होकर एक इकाई की तरह काम करती है. बाहरी दुनिया की नज़र में जीसीसी तब बनी जब ईरान-इराक युद्ध हुआ. इसलिए यह माना गया कि जंग जीतने वाला देश जीसीसी या इसके सदस्य देशों के लिए ख़तरा बन सकता है... और हमने देखा कि युद्ध ख़त्म होने के तुरंत बाद इराक ने सच में जीसीसी के एक सदस्य (कुवैत) पर हमला किया."

बीबीसी उर्दू से बात करते हुए मेहरान कामराफ़ा कहते हैं, "शुरुआत से ही जीसीसी संकटों के बीच बनी है और संकट के दौरान यह एक एकीकृत इकाई की तरह काम करती है. लेकिन जब बाहरी संकट कम हो जाता है तो जीसीसी का रवैया बदल जाता है. इस मौजूदा संकट को अस्तित्व के लिए एक महत्वपूर्ण और अस्थिर करने वाला संकट माना जा रहा है."

वह कहते हैं, "मुझे ताज्जुब नहीं होगा अगर जीसीसी अपने सदस्यों की सुरक्षा, आर्थिक अस्तित्व और सैन्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई क़दम उठाए. चाहे अमेरिका के साथ संबंधों को गहरा करना हो, नेटो में शामिल होने पर विचार करना हो या इसी तरह का कोई और गठबंधन बनाना हो."

साइमन वोल्फ़गांग फ़ुक्स, यरूशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी में 'दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में इस्लाम' के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. वह क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री के बयान को असाधारण मानते हैं क्योंकि "इसमें युद्ध के लिए इसराइल और ईरान दोनों को समान रूप से ज़िम्मेदार ठहराया गया है और बताया गया है कि कैसे खाड़ी देश इसमें उलझ गए हैं."

उनके अनुसार, "इसमें कोई शक नहीं कि यह अमेरिका की भी परोक्ष आलोचना है जिसने खाड़ी देशों को अकेला छोड़ दिया, उन्हें पहले इसकी कोई जानकारी या वॉर्निंग नहीं दी और युद्ध के दौरान उन्हें एयर डिफ़ेंस सिस्टम फिर से सप्लाई करने के लिए भी वह तैयार नहीं था."

बीबीसी उर्दू से बात करते हुए साइमन ने कहा, "खाड़ी देशों में यह एहसास भी पाया जाता है कि इसराइल और इलाक़े में अमेरिकी अड्डों की सुरक्षा को उन पर प्राथमिकता दी गई. हालांकि अमेरिका के साथ उनका पुराना गठबंधन है और अरबों डॉलर के हथियार ख़रीदे गए और सुरक्षा के लिए उस पर भरोसा किया गया लेकिन संकट में वह काम नहीं आया."

उनके अनुसार, "अरब देशों में यह एहसास बहुत साफ़ और गहरा है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए."

साइमन का यह भी कहना है कि सऊदी अरब ने क़तर पर जो नाकाबंदी की थी उस पृष्ठभूमि में सऊदी अरब के वर्चस्व को मान लेना भी असाधारण है.

"यह ज़ाहिर करता है कि कुछ बदल गया है और खाड़ी देश वास्तव में चिंतित हैं. वह महसूस करते हैं कि उनके साथ खेल खेला गया है. वह लंबे समय से इस भरोसे थे कि वह 'स्थिरता के द्वीप' हैं और अपने चारों ओर ईरान, इराक, सीरिया, यमन, इसराइल और फ़लस्तीन के संघर्षों से ख़ुद को अलग रख सकते हैं." उनके अनुसार यह एहसास अब सभी देशों में साझा है.

हालांकि वह यह भी कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई गठबंधन व्यावहारिक है."

इसराइल और इस्लामी देश

वह सऊदी अरब और यूएई के बीच तनावपूर्ण संबंधों और सूडान और लीबिया जैसे क्षेत्रों में बड़ी रस्साकशी का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "सऊदी अरब और यूएई के बीच हावी होने की उलझन ख़त्म नहीं हो सकती. सैन्य रूप से सऊदी सेना यूएई से कहीं अधिक शक्तिशाली है. यूएई के पास केवल 65 हज़ार सैनिक हैं, इसलिए उसे भी झुकना पड़ेगा."

"फिर इसराइल के साथ गठबंधन का सवाल है. यूएई और बहरीन अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल हुए जबकि सऊदी अरब लगातार स्थाई फ़लस्तीनी राज्य के गठन पर ज़ोर देता रहा है. अमीरात ने यहां तक सुझाव दिया कि वह ग़ज़ा का प्रशासन संभालने को तैयार है जो सऊदी अरब को मंज़ूर नहीं है. इसलिए यह दोनों बड़े खिलाड़ी एक-साथ नहीं चल सकते. कुवैत, बहरीन, ओमान और कतर जैसे छोटे देश शायद साथ हो जाएं लेकिन कुल मिलाकर 'गल्फ़ नेटो' गंभीर मतभेदों के कारण संभव नहीं."

ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय में मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ और 'किंग फ़ैसल सेंटर फ़ॉर रिसर्च एंड इस्लामिक स्टडीज़' के एसोसिएट फ़ेलो उमर करीम भी साइमन और मेहरान से सहमति जताते हुए 'गल्फ़ नेटो' के विचार को 'पूरी तरह से अवास्तविक' बताते हैं.

बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उमर कहते हैं, "यह मामला सलाहियत और इरादे दोनों का है, जो इस क़दम को अवास्तविक बना देता है."

उमर का मानना है कि खाड़ी देशों में मज़बूत इरादे की कमी, नेतृत्व को लेकर मतभेद और विदेशी ताक़तों व विदेशी हथियारों के भरोसे रहने के कारण यह मुमकिन नहीं लगता.

'अमेरिका पर निर्भरता जल्द ख़त्म होना मुश्किल है'

विशेषज्ञ कहते हैं कि खाड़ी देशों की अमेरिका पर निर्भरता जारी रहेगी क्योंकि विकल्प मौजूद नहीं है. खाड़ी की सेनाएं अमेरिकी हथियारों पर निर्भर रहती हैं

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञ कहते हैं कि खाड़ी देशों की अमेरिका पर निर्भरता जारी रहेगी क्योंकि विकल्प मौजूद नहीं हैं. खाड़ी की सेनाएं अमेरिकी हथियारों पर निर्भर रहती हैं

जीसीसी के नेतृत्व में सैन्य और रक्षा औद्योगिक आधार बनाने का लक्ष्य कितना वास्तविक है और अमेरिका इस पर कैसे प्रतिक्रिया दे सकता है?

इसके बारे में साइमन वोल्फ़गांग फ़ुक्स का मानना है कि औद्योगिक आधार का मामला भी पेचीदा है. "खाड़ी ने टूरिज़्म, ट्रांसपोर्ट और हाई-टेक सेक्टर्स पर ध्यान दिया है लेकिन उसके पास कोई वास्तविक औद्योगिक आधार नहीं है. इसके लिए इंजीनियरिंग स्कूल, यूनिवर्सिटी और लोकल वर्कफ़ोर्स की ज़रूरत है जो फ़िलहाल उनके पास नहीं हैं."

साइमन कहते हैं, "जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और हथियार बनाने का हो तो क्या विदेशी कर्मचारियों के भरोसे रहा जा सकता है? इस पर भी शक है. इसलिए फ़िलहाल और आगे भी अमेरिका पर निर्भरता जारी रहेगी क्योंकि विकल्प मौजूद नहीं है और खाड़ी की सेनाएं अमेरिकी हथियारों पर निर्भर रहती हैं."

उमर करीम दूसरे गठबंधनों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि इसके बुनियादी ढांचे को खड़ा करने में कम से कम दस साल लगेंगे और शायद 20-30 साल और लगेंगे. इसके बाद इसका एक आधार तैयार हो सकेगा और वह भी दूसरी शक्तियों की मदद से, अकेले नहीं. इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह केवल एक ख़्याली पुलाव है और अमेरिका इस पर बहुत ध्यान नहीं देगा.

प्रोफ़ेसर मेहरान कामराफ़ा को भी यक़ीन नहीं है कि ऐसा कोई औद्योगिक आधार बन पाएगा, क्योंकि उनके अनुसार "उन देशों के बीच सैन्य क्षमता से लेकर कमांड और कंट्रोल तक के मामलों में कड़ा मुक़ाबला और मतभेद है."

मेहरान कामराफ़ा का मानना है कि सैद्धांतिक या मौखिक रूप से यह देश एकजुट हो सकते हैं "लेकिन एक औद्योगिक सैन्य आधार के लिए दीर्घकालिक योजना, निवेश, लॉजिस्टिक्स और व्यावहारिक स्थितियों की ज़रूरत होती है और यह सब फ़िलहाल व्यावहारिक नहीं लगता."

'पाकिस्तान अमेरिका की जंग में शामिल होने से हिचकिचाता है'

पाकिस्तान और अमेरिका

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इमेज कैप्शन, सितंबर 2025 में अमेरिका में विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मुलाक़ात करते पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर (बीच में) और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ (बाएं)

अगर खाड़ी देश तुर्की और पाकिस्तान के साथ सैन्य और रक्षा सहयोग को और गहरा करना चाहें तो पाकिस्तान क्या भूमिका निभा सकता है?

उमर करीम का कहना है कि पाकिस्तान को राजनीतिक और क्षमता के लिहाज़ से कुछ सीमाओं का सामना करना पड़ रहा है. "एक तरफ़ पाकिस्तान का अपना रक्षा औद्योगिक आधार बहुत विकसित नहीं है और आधुनिक सैन्य तकनीक व हथियारों के लिए वह चीन पर बहुत अधिक निर्भर है. इसलिए अगर पाकिस्तान खाड़ी देशों को कुछ देता है तो इसका मतलब यह भी होगा कि चीनी तकनीक और हथियार परोक्ष रूप से खाड़ी के बाज़ारों में जाएंगे. इसके अलावा वर्तमान में पाकिस्तान के रक्षा संबंध खाड़ी में मुख्य रूप से केवल सऊदी अरब के साथ हैं. इसका मतलब यह है कि हथियार बेचने के लिए मंडी ज़्यादातर सऊदी अरब में मिलेगी."

उनके अनुसार, "दूसरी ओर तुर्की के पास तुलनात्मक रूप से ज़्यादा एडवांस्ड औद्योगिक आधार है और वह खाड़ी देशों के साथ जॉइंट प्रोडक्शन प्रोजेक्ट्स में शामिल हो सकता है. इसके साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र समझौतों के ज़रिए खाड़ी देशों में स्थानीय स्तर पर हथियारों का उत्पादन भी संभव हो सकता है."

उमर का कहना है कि खाड़ी देश पाकिस्तान और तुर्की दोनों में नए प्रोजेक्ट्स में पूंजी निवेश भी कर सकते हैं जिससे उनके रक्षा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा. इसके अलावा स्थानीय स्तर पर रक्षा से जुड़े साज़ोसामान बड़े पैमाने पर बनाने में भी मदद मिल सकती है.

इसके बारे में साइमन वोल्फ़गांग फ़ुक्स कहते हैं, "पाकिस्तान ने पारंपरिक रूप से खाड़ी राजतंत्रों को मैनपावर दिया है लेकिन अब स्थिति बदल गई है. सऊदी अरब ने अपनी सेना में भारी निवेश किया है और वह अपनी जीडीपी का सात प्रतिशत रक्षा पर ख़र्च करता है. यह पाकिस्तान की सेना के बजट का आधा है. इसलिए अब उसे पाकिस्तानी सैनिकों पर निर्भर रहने की वैसी ज़रूरत नहीं रही."

साइमन मानते हैं कि पाकिस्तान की सेना प्रशिक्षित और प्रभावी है और संकट की स्थिति में भागीदार हो सकती है. "लेकिन पाकिस्तान के ईरान और खाड़ी देशों- दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं और वह यमन जैसे संघर्षों में शामिल होने से बचता है. इसी तरह तुर्की भी ईरान के साथ संबंध रखता है और वह नेटो का सदस्य है."

तुर्की के बारे में साइमन का मानना है कि यह साफ़ नहीं है कि नेटो इस बात को क़बूल करेगा कि तुर्की किसी ऐसे प्रोजेक्ट में शामिल हो जो अमेरिकी प्रभाव में न हो.

मेहरान कामराफ़ा भी साइमन से सहमत होते हुए कहते हैं कि ट्रेनिंग और कमांड व कंट्रोल के मामले में पाकिस्तान अहम भूमिका निभा सकता है. "लेकिन जैसा कि अभी के संघर्ष में देखा गया है, पाकिस्तान अमेरिका के युद्धों में शामिल होने से हिचकिचाता है."

मेहरान कामराफ़ा को नहीं लगता कि वह ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान की व्यावहारिक भागीदारी देखेंगे, क्योंकि "पाकिस्तान ईरान के साथ एक लंबी सीमा साझा करता है और इस मामले में बहुत सतर्क है."

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