तमिलनाडु के इस ज़िले में साइकिल प्रोजेक्ट ने कैसे महिलाओं की ज़िंदगी बदल दी

    • Author, मुरलीधरन काशीविश्वनाथन
    • पदनाम, सीनियर रिपोर्टर, बीबीसी तमिल
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

"भारत 1947 में आज़ाद हुआ था, लेकिन मुझे अपनी आज़ादी 1992 में मिली.''

55 साल की जयाचित्रा दक्षिण भारत के एक सरकारी स्कूल में हेड टीचर के रूप में काम करती हैं.

33 साल पहले उनकी ज़िंदगी तब बदल गई, जब एक ज़िला अधिकारी ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में एक छोटा लेकिन क्रांतिकारी बदलाव किया. इसमें महिलाओं को साइकिल चलाना सीखने के लिए प्रोत्साहित किया गया.

जयाचित्रा उन तकरीबन एक लाख महिलाओं में शामिल थीं, जो ग्रामीण और परंपरागत परिवारों से आती थीं और कभी अपने घरों से बाहर भी नहीं निकलीं थीं.

साइकिल चलाना सीखकर उन्हें चलने-फिरने की आज़ादी, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता मिली.

1990 के दशक की शुरुआत में साइकिल चलाना सीखने वाली कुछ महिलाओं ने आगे चलकर अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियां हासिल कीं, जिससे उनकी ज़िंदगी बदली. और साथ ही उनकी बेटियों और पोतियों का भविष्य भी बदल गया.

नया रास्ता

1988 में भारत में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की शुरुआत की गई थी. इसका मक़सद साक्षरता और गणितीय समझ बढ़ाना और लोगों को उनके बुनियादी अधिकारों के प्रति जागरूक करना था.

भारत के दक्षिणी शहर चेन्नई से लगभग 380 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित पुडुकोट्टई ज़िले में इस योजना को "एनलाइटनिंग मूवमेंट" के नाम से जाना गया.

1991 की जनगणना के मुताबिक़, इस ज़िले में आधे से भी कम महिलाएं पढ़-लिख सकती थीं.

लगभग 2,70,000 महिलाएं निरक्षर थीं.

इसकी एक बैठक में मौजूद 'एनलाइटनमेंट मूवमेंट' की को-ऑर्डिनेटर कन्नम्मल याद करती हैं, '' साक्षरता मिशन पर मंथन के दौरान यह साफ़ हो गया कि इस योजना से सबसे ज़्यादा लाभ महिलाओं को होगा."

साक्षरता अभियान ने अनुमान लगाया कि इन महिलाओं को पढ़ाने के लिए 30,000 स्वयंसेवकों की ज़रूरत होगी, और इसी लॉजिस्टिक चुनौती से साइकिल योजना की शुरुआत हुई.

समस्या यह थी कि निरक्षर महिलाओं के परिवार चाहते थे कि उन्हें पढ़ाने वाली शिक्षक भी महिला ही हो. लेकिन बहुत कम महिलाओं के पास खुद का कोई साधन था जिससे वे आ-जा सकें.

उस समय ज़िले की वरिष्ठ सिविल सेवक शीला रानी चंकथ ने बीबीसी न्यूज़ तमिल से कहा, '' उस समय महिलाओं के पास साइकिल या मोपेड तक की सुविधा नहीं थी. वे स्वतंत्र रूप से यात्रा नहीं कर सकती थीं. मुझे लगा कि यह अवसर पैदा करना ज़रूरी है."

वो कहती हैं, "साइकिल चलाने से महिलाओं में आज़ादी और आत्मविश्वास की भावना आई,"

"कुछ अधिकारी महिला स्वयंसेवकों की भर्ती के ख़िलाफ़ थे. उनका कहना था कि महिलाएं दूर-दराज़ के गांवों तक नहीं जा सकतीं.

कन्नम्मल बताती हैं, ''लेकिन ज़िला कलेक्टर (चंकथ) ने उनके तर्कों को खारिज कर दिया.''

वो कहती हैं, "जब महिलाओं ने स्वतंत्र रूप से यात्रा करना शुरू किया, तो उन्हें एहसास हुआ कि वे सब कुछ कर सकती हैं. इससे पुरुषों द्वारा खड़ी की गई बाकी सभी बाधाओं को तोड़ने का रास्ता खुल गया."

कामयाबी की कहानियां

इस परियोजना ने आगे चलकर अलग-अलग सामाजिक वर्गों की बड़ी संख्या में महिलाओं की मदद की. इनमें महिला टीचर्स और छात्राएं भी शामिल थीं.

अपेक्षाकृत पढ़ी-लिखी जयाचित्रा कहती हैं, ''उस समय मैं एक गुलाम की तरह जीवन जी रही थी. मेरे पिता मुझे खिड़की खोलकर बाहर देखने तक की अनुमति नहीं देते थे."

उस दौर में अविवाहित महिलाओं को अक्सर पुरुषों की नज़र से दूर रखा जाता था.

वह बताती हैं, "दसवीं कक्षा पूरी करने के बाद, मेरे रिश्तेदारों ने मुझसे कहा कि मैं सिलाई या टाइपिंग सीख लूं."

आम तौर पर इन कामों को महिलाओं के लिए सुरक्षित और उपयुक्त माना जाता था.

जयाचित्रा ने गणित में 99 फ़ीसदी अंक हासिल किए थे. इन सुझावों से वह बहुत निराश हो गईं.

उनकी मां ने उनकी पढ़ाई के लिए अपने शादी के गहने गिरवी रख दिए, ताकि जयाचित्रा टीचर ट्रेनिंग का कोर्स कर सकें.

साक्षरता मिशन के तहत उन्हें पड़ोसी गांव की मुस्लिम महिलाओं को पढ़ाने के लिए चुना गया.

जयाचित्रा को एहसास हुआ कि वहां पैदल पहुंचना संभव नहीं होगा. फिर उन्होंने साइकिल चलाना सीखने का मौका हासिल कर लिया.

वह याद करती हैं, "मैं लंबी स्कर्ट और हाफ साड़ी पहनती थी. उस समय महिलाओं के लिए अलग साइकिल नहीं होती थी, इसलिए मैंने पुरुषों वाली साइकिल पर ही इसे चलाना सीख लिया."

इससे अपनी तरह की समस्याएं भी सामने आईं. महिलाओं की साइकिल में हैंडल और सीट के बीच की डंडी नीचे होती है, जिससे साड़ी पहनकर चढ़ना और चलाना आसान होता है.

जयाचित्रा कई बार गिर भी गईं, लेकिन साइकिल चलाने के फ़ायदे उन्हें बेहद रोमांचित करते थे.

वो कहती हैं, "मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई. मैं खुद को एक तितली की तरह महसूस करने लगी. मुझे शाम का इंतज़ार रहता था, जब मैं साइकिल चलाकर कक्षाओं में जाती थी."

वो कहती हैं, "शुरुआत में मेरे पिता इसके ख़िलाफ़ थे, लेकिन बाद में उनका मन बदल गया और उन्होंने मेरे लिए साइकिल खरीद दी. वह मेरे जीवन का सबसे अच्छा दिन था.''

वसंता अब उम्र के पांचवें दशक के आख़िर में हैं. वो पहले निरक्षर थीं और एक ग़रीब दलित परिवार से आती थीं.

एक ऐसा सामाजिक वर्ग जिसने सदियों तक भेदभाव और अलगाव झेला है. उनकी शादी कम उम्र में हो गई थी और उनके पति भी निरक्षर थे.

जब वह एक खदान में औजारों से पत्थर तोड़ने का काम कर रही थीं, तब "एनलाइटनिंग मूवमेंट" के प्रतिनिधि उनसे मिले.

तब तक साइकिल चलाना इस प्रोजेक्ट का एक अहम हिस्सा बन चुका था, और इसमें भाग लेने वाली महिलाएं यह कौशल भी सीख सकती थीं.

वसंता ने बीबीसी को बताया, "साक्षरता आंदोलन के लोगों ने हमें बताया कि अगर हम साइकिल चलाना सीखें, तो हमें साइकिल मिल सकती है.''

वह शुरू में झिझक रही थीं और उन्हें शर्म भी आती थी, लेकिन अपने गांव में फैल रहे उत्साह की लहर को वह नज़रअंदाज नहीं कर सकीं.

वो कहती हैं, "उस समय हमारे गांव में बहुत कम घरों में साइकिल थी, फिर भी मैं एक साइकिल उधार लेकर सीख पाई."

बाद में उन्होंने अपनी खुद की साइकिल खरीद ली, जिसका इस्तेमाल वह नियमित रूप से घर के लिए पानी लाने में करती थीं.

पढ़ना-लिखना और गिनती सीखने के बाद, उन्होंने अपने जैसी तीन अन्य महिलाओं के साथ मिलकर एक पत्थर खदान पट्टे पर ली और अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया.

वसंता कहती हैं कि साइकिल कार्यक्रम ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें आज़ादी और सम्मान दिलाया. अब वह अपनी पोती का सहारा बन रही हैं,जो डॉक्टर बनना चाहती है.

स्थायी विरासत

आज पुडुकोट्टई के लगभग हर गांव में वसंता जैसी दर्जनों महिलाएं मिल जाएंगी.

कुछ ने छोटे व्यवसाय शुरू किए, और कई महिलाएं असंगठित मौसमी कृषि काम से आगे बढ़कर ऑफिस की नौकरियों तक पहुंचीं.

साक्षरता ने महिलाओं को यह समझने में मदद की कि उन्हें बहुत कम मजदूरी दी जा रही थी. कई मामलों में वे सफलतापूर्वक अपनी मजदूरी बढ़वाने में भी कामयाब रहीं.

साइकिल चलाने ने महिलाओं को घर से बाहर के जीवन के लिए पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भर रहने से मुक्त कर दिया.

ख़ासकर उस समय जब अधिकांश गांवों में पक्की सड़कें नहीं थीं और सार्वजनिक परिवहन भी ठीक से विकसित नहीं था.

11 अगस्त 1992 को पुडुकोट्टई को पूरी तरह साक्षर ज़िला घोषित कर दिया गया.

आज पुडुकोट्टई में महिलाओं को साइकिल चलाते देखना आम बात है, लेकिन जयाचित्रा अब उनमें शामिल नहीं हैं.

वह अब स्कूटर का इस्तेमाल करती हैं और उनकी बेटी ने तो कार भी खरीद ली है.

जयाचित्रा कहती हैं, "साइकिल चलाने से मेरे जैसे लोगों में आत्मविश्वास पैदा हुआ. इससे मुझे एहसास हुआ कि मुझे किसी पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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