ट्रंप की ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश क्या उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा जुआ है?

    • Author, डॅनियल बुश
    • पदनाम, वॉशिंगटन संवाददाता, बीबीसी
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

ईरान पर हमला करके और वहां के सर्वोच्च नेता को मारकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बहुत बड़ा दांव खेला है.

यह एक ऐसा दांव है जिसके ज़रिये ट्रंप मध्य पूर्व को नया आकार देने में सफल हो सकते हैं. अतीत में कई अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसा करने में विफल रहे हैं.

अगर अमेरिका केवल हवाई ताकत का इस्तेमाल करके ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह नष्ट करने और तेहरान में सत्ता परिवर्तन लाने में सफल हो जाता है तो यह ट्रंप की बड़ी जीत होगी.

वह दावा कर सकते हैं कि जो पीढ़ियों से कोई हासिल नहीं कर पाया, वह उन्होंने कर दिखाया है. फ़िलहाल ईरान में आगे क्या करना है, इस बारे में अमेरिका के पास कोई स्पष्ट योजना नहीं है.

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पर अगर अमेरिका का ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' विफल हो जाता है या इसकी वजह से कोई बड़ा क्षेत्रीय संघर्ष जन्म लेता है, जिसमें अमेरिका की निरंतर भागीदारी जरूरी बन जाती है, तो इससे अमेरिका की राजनीति भी प्रभावित हो सकती है.

इससे ट्रंप की विरासत को नुकसान हो सकता है. साथ ही अमेरिका में नवंबर में होने वाले अहम मध्यावधि चुनावों में अमेरिकी कांग्रेस पर नियंत्रण बनाए रखने की रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदों को भी नुकसान पहुंच सकता है.

ट्रंप ने दिए थे संकेत

राष्ट्रपति ट्रंप ने शनिवार तड़के ईरान में सैन्य अभियान शुरू करने की घोषणा करते हुए यह संकेत दे दिया था कि दांव पर कितना कुछ लगा है.

ट्रंप ने कहा, "हम अमेरिकी नायकों को खोना पड़ सकता है." उनका संकेत अमेरिकी सुरक्षाबलों में तैनात लोगों की तरफ़ था.

उन्होंने यह तर्क भी दिया कि जिस शासन ने 1979 में सत्ता हथियाने के बाद पूरे मध्य पूर्व में अराजकता फैलाई है, उसे नुकसान पहुंचाने के बदले में आवश्यक कीमत चुकानी पड़ सकती है.

ट्रंप ने कहा, "ईरानी शासन 47 वर्षों से 'डेथ टु अमेरिका' जैसे नारे लगा रहा है. हम इसे अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे."

युद्ध ख़त्म करने के वादे के साथ सत्ता में लौटे थे ट्रम्प

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप एक लंबे सैन्य अभियान से बचने में कामयाब होंगे.

दूसरा सवाल यह है कि क्या ट्रंप अमेरिकी जनता को, और विशेष रूप से अपने समर्थकों को, मध्य पूर्व में एक और बड़ी सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने के लिए मना सकते हैं या नहीं. आम तौर पर ट्रंप समर्थक और अमेरिकी जनता का एक बड़ा समूह विदेशों में अमेरिकी हस्तक्षेप का बड़े पैमाने पर विरोध करता है.

ट्रंप एक साल पहले 'लंबे समय से चलते आ रहे युद्धों' को समाप्त करने के वादे के साथ सत्ता में लौटे थे. ऐसे युद्ध जिन्हें अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में लड़ा था. लेकिन अब उन्होंने ही ईरान, वेनेजुएला और सीरिया सहित अन्य देशों में सैन्य अभियान शुरू कर दिए हैं.

अमेरिका और इसराइल की बमबारी व्हाइट हाउस की उस चेतावनी के बाद हुई है, जिसमें कहा गया था कि अगर ईरान परमाणु हथियार कार्यक्रम को छोड़ने, बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन बंद करने और प्रॉक्सी समूहों को अपना समर्थन बंद करने पर राज़ी नहीं होता है, तो हमला किया जाएगा.

ट्रंप ने शुक्रवार 27 फरवरी की रात फ्लोरिडा स्थित अपने मार-ए-लागो एस्टेट में शीर्ष सलाहकारों के साथ हमले की निगरानी की.

इससे परिचित एक सूत्र के अनुसार वॉशिंगटन में उपराष्ट्रपति जेडी वैंस, नेशनल इंटेलिजेंस की डायरेक्टर तुलसी गबार्ड और प्रशासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारी व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में जमा हुए थे.

ट्रंप के नियंत्रण से बाहर हो सकती है स्थिति

ख़ामेनेई के मारे जाने से तनाव बढ़ने का संकेत है. विश्लेषकों का मानना है कि हालात ट्रंप के नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं.

नेवल पोस्टग्रेजुएट स्कूल के प्रोफेसर मोहम्मद हाफ़िज़ का कहना है, "सत्ता परिवर्तन के लिए अमेरिका को हर संभव प्रयास करना होगा. समस्या यह है कि ज़मीनी स्तर पर सैन्य उपस्थिति के बिना ऐसा संभव नहीं है."

उन्होंने आगे कहा कि ईरान ने पश्चिमी एशिया में अमेरिका के कई सहयोगियों पर हमले किए हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि ईरान पिछले साल के हमलों की तुलना में अधिक आक्रामक तरीके से जवाबी कार्रवाई करने की योजना बना रहा है.

पश्चिमी एशिया मामलों के जानकार हाफ़िज़ कहते हैं, "ईरान की रणनीति क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म देना है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और अमेरिकी अर्थव्यवस्था प्रभावित हो. और ऐसा होना ट्रंप के लिए अच्छा नहीं होगा. इससे एक गंभीर संकट पैदा हो सकता है."

पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष इस क्षेत्र में ट्रंप की अन्य प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है. इनमें इसराइल-हमास युद्ध के बाद ग़ज़ा का पुनर्निर्माण और सऊदी अरब के साथ संबंधों को मजबूत करना शामिल है.

इससे अमेरिका में उनके समर्थक भी नाराज हो सकते हैं. इस समय अमेरिका में महंगाई और अन्य स्थानीय मुद्दे अहम हैं.

ट्रंप के पहले कार्यकाल के एक पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का कहना है कि हाल के हफ्तों में कई वरिष्ठ अधिकारियों ने ईरान में बड़े सैन्य अभियान के बारे में चिंता व्यक्त की है.

कहा जाता है कि ये मतभेद निजी तौर पर सामने आए थे, जबकि ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान पर हमला करने की धमकी दी थी. साल 2003 में इराक पर आक्रमण के बाद से पश्चिमी एशिया में अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती का आदेश दिया गया.

हमले को अंजाम देने का फैसला करने और संभावित हमले को लेकर हफ्तों से चल रही अटकलों को खत्म करने के बाद ट्रंप ने शनिवार को मिशन को लेकर आत्मविश्वास जताया.

लेकिन उन्होंने कुछ ऐसे संकेत भी दिए, जिनसे अमेरिकी युद्ध के उद्देश्यों को लेकर नए सवाल खड़े हो गए.

ट्रंप ने समाचार संस्थान एक्सियोस को बताया, "मैं लंबे समय तक खेल सकता हूं और पूरे मामले को अपने हाथ में ले सकता हूं, या फिर मैं इसे दो या तीन दिनों में समाप्त भी कर सकता हूं."

बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "भारी और सटीक बमबारी... पूरे सप्ताह या जब तक आवश्यक हो, बिना किसी रुकावट के जारी रहेगी."

इन टिप्पणियों से ट्रंप का विदेश नीति के प्रति मनमाना दृष्टिकोण सामने आता है. ट्रंप ने हमला करने से पहले न तो अमेरिकी कांग्रेस को कुछ बताया और न ही अमेरिकी जनता को कुछ बताने की ज़रूरत समझी.

लेकिन राष्ट्रपति के सहयोगियों और समर्थकों का कहना है कि ट्रंप के इसी अंदाज़ ने उन्हें कई सफलताएं दिलाई हैं. इनमें ग़ज़ा में युद्धविराम और नेटो के लिए यूरोपीय फाइनेंशियल कमिटमेंट में इज़ाफ़ा शामिल है.

कमला हैरिस ने क्या कहा?

ईरान के साथ युद्ध शुरू करना अमेरिकी जनता के हित में क्यों है, इस बारे में ट्रंप ने पहले से कोई ठोस तर्क पेश नहीं किया.

राष्ट्रपति ट्रंप पिछले सप्ताह अपने 'स्टेट ऑफ द यूनियन' भाषण में अपने तर्क प्रस्तुत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस की मंज़ूरी लिए बिना ही सैन्य अभियान शुरू कर दिया. हालांकि 28 फरवरी को अधिकांश रिपब्लिकन इस कार्रवाई के समर्थन में सामने आए.

हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने एक बयान में कहा, "ईरान अपने नापाक कृत्यों के गंभीर परिणामों का सामना कर रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं, आतंकवाद और अमेरिकियों समेत अपने ही लोगों की हत्या के जवाब में शांतिपूर्ण और राजनयिक समाधान तलाशने के लिए हर संभव प्रयास किया है."

लेकिन कांग्रेस के साथ समन्वय की कमी ने डेमोक्रेट्स और ट्रंप की पार्टी के कुछ ऐसे लोगों को नाराज कर दिया है जो अमेरिकी हमलों का विरोध करते हैं. पूर्व उपराष्ट्रपति और 2024 की डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कमला हैरिस ने एक बयान में कहा, "डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को ऐसे युद्ध में घसीट रहे हैं जिसे अमेरिकी जनता नहीं चाहती."

उन्होंने आगे कहा, "ट्रंप की मनचाही जंग के लिए हमारे सैनिकों को खतरे में डाला जा रहा है."

सीनेट में अल्पसंख्यक नेता चक शूमर ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस और अमेरिकी जनता को 'खतरे के दायरे के बारे में महत्वपूर्ण सूचनाएं' नहीं दीं.

उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति ट्रंप का बार-बार आक्रामक रुख अपनाना और व्यापक संघर्ष को जन्म देना कोई कारगर रणनीति नहीं है."

शनिवार को डेमोक्रेट्स की ओर से दी गई तीखी प्रतिक्रिया से संकेत मिलता है कि ट्रंप को पश्चिमी एशिया में चल रहे नए युद्ध की अगुवाई करते हुए घर पर ही राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ सकती है.

हाउस डेमोक्रेट्स सैन्य अभियान पर अपनी प्रतिक्रिया पर चर्चा करने के लिए रविवार शाम को एक बैठक करने जा रहे हैं, जिसकी जानकारी इसमें शामिल दो सूत्रों से मिली है.

सदन में अल्पसंख्यक नेता हकीम जेफ्रीज़ ने कहा कि डेमोक्रेट अगले हफ्ते ईरान में ट्रंप की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने वाले प्रस्ताव पर मतदान कराने के लिए अपना प्रयास फिर से शुरू करेंगे.

सदन के एक वरिष्ठ डेमोक्रेटिक सहयोगी ने कहा, "वेनेजुएला जैसे किसी दूसरे देश के नेता को गिरफ्तार करना आसान है, लेकिन उसके बाद के दिनों में आप क्या करेंगे. प्रशासन ने कोई रणनीति या लक्ष्य स्पष्ट नहीं किया है."

वहीं, ट्रंप ने शनिवार को एनबीसी से ईरान के बारे में कहा, "एक दिन वे मुझे फोन करके पूछेंगे कि मैं किसे नेता के रूप में देखना चाहता हूं. मैं यह बात सिर्फ व्यंग्य के तौर पर कह रहा हूं."

अमेरिका में नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव अहम होंगे. ये चुनाव बताएंगे कि ट्रंप अपने बचे हुए कार्यकाल में क्या कुछ कर सकते हैं. पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों की तरह पश्चिमी एशिया में सैन्य कार्रवाई ट्रंप की विरासत भी तय कर सकती है.

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