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मुसलमान और आप्रवासी मुद्दे के सहारे असम से आगे की राजनीति साध रहे हैं हिमंता?
- Author, प्रेरणा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
''हमारी मुसलमानों से क्या दिक्कत हो सकती है. भारत एक सेक्युलर राष्ट्र है. सभी को एक जैसे अधिकार हैं. असम का जंग मुसलमान के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि बांग्लादेशी मुसलमान के ख़िलाफ़ है.''
हाल ही में एक निजी टीवी चैनल के कार्यक्रम में ये बातें असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहीं. हिमंता से पूछा गया था कि उन्हें मुसलमानों से क्या दिक्कत है? जवाब में वह कहते हैं कि उनकी परेशानी मियां मुसलमानों से है, असम के स्वदेशी मुसलमानों से नहीं.
उन्होंने कहा, ''मेरी गाड़ी का ड्राइवर बीते 30 सालों से एक मुसलमान बेटा ही है. मेरे कार्यालय में 30 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं. हमें दिक्कत है जब बांग्लादेशियों की बात आती है. इसलिए जब सवाल करें तो मियां मुसलमान और मुसलमान दोनों को एक ही खांचे में रखकर न पूछें.''
पर यही हिमंता बिस्वा सरमा ने साल 2023 में छत्तीसगढ़ में आयोजित एक रैली में कहा था, ''यह हिंदुओं का देश है और हिंदुओं का ही रहेगा. सेक्युलरिज़्म की भाषा हमें मत सिखाओ''
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तो एक ओर हिमंता खुद को संवैधानिक और सेक्युलर ढांचे के भीतर रखते हुए 'स्वदेशी' और 'बांग्लादेशी' मुसलमानों के बीच के अंतर को रेखांकित करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके कई बयान हिंदुत्व की आक्रामक राजनीति की ओर इशारा करते हैं.
अपने पांच साल के कार्यकाल में हिमंता ने कई ऐसे बयान दिए या फ़ैसले लिए, जिन्हें विपक्ष, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक अल्पसंख्यक विरोधी मानते हैं.
हिमंता बार-बार 'मियां मुसलमानों' यानी बंगाली मूल के मुसलमानों के खिलाफ विवादित टिप्पणियां देते रहे हैं.
वह कह चुके हैं कि 'मियां मुसलमानों को इतना परेशान करो कि वे खुद ही असम छोड़ दें'. उन्होंने 2023 में आरोप लगाया था कि सब्जियों के बढ़ते दाम के पीछे इसी समुदाय की भूमिका है.
जनवरी 2026 में उन्होंने कहा था कि अगर कोई मियां मुस्लिम रिक्शा चालक किराए में पांच रुपये मांगे तो उसे चार रुपये ही दिए जाएं.
उनके दिए ऐसे कई बयान लगातार विवादों में रहे हैं.
इसके अलावा, हाल के समय में असम बीजेपी के एक्स हैंडल से पोस्ट हुआ एक एआई जनरेटेड वीडियो भी विवाद का कारण बना. इस वीडियो में हिमंत बिस्वा सरमा को एक राइफ़ल संभालते हुए दिखाया गया था.
वीडियो में एआई से तैयार किया गया पार्ट जोड़ा गया था, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों की तस्वीरों पर गोलियाँ लगती हुई दिखाई गईं.
बयानों के साथ-साथ उनकी सरकार के फैसले भी चर्चा में रहे हैं.
कथित अवैध कब्ज़ों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर चलाए गए बेदखली अभियान और मदरसों को बंद कर उन्हें सामान्य स्कूलों में बदलने की नीति से लेकर बाल विवाह के खिलाफ अभियान के तहत की गई व्यापक गिरफ्तारियां तक विवादों रही है.
सरकार का कहना है कि ये सभी फै़सले क़ानून-व्यवस्था, शिक्षा सुधार और सामाजिक बदलाव के उद्देश्य से लिए गए हैं, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि इनका असर एक खास समुदाय पर केंद्रित रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि मुसलमान और आप्रवासियों का मुद्दा हिमंता को कहां ले जाएगा और इन मुद्दों के सहारे क्या वह केवल असम की राजनीति साधना चाहते हैं या योजना आगे की है?
इसे समझने के लिए हमने असम की राजनीति को समझने और इस पर पैनी नज़र रखने वाले दो वरिष्ठ पत्रकारों से बात की.
वरिष्ठ पत्रकार अनिर्बान रॉय नहीं मानते कि हिमंता मुस्लिम विरोधी हैं.
उनके अनुसार, हिमंता लंबे समय से राजनीति में हैं और अपने राजनीतिक करियर का एक बहुत लंबा वक़्त उन्होंने कांग्रेस में गुज़ारा है.
साल 2015 में जब वह बीजेपी में शामिल हुए तो ज़ाहिर है उनके तेवर और स्वर में बदलाव आए.
उन्होंने मुसलमान, ख़ासकर मियां मुसलमानों को निशाने पर लिया, आप्रवासियों के ख़िलाफ़ बयान दिए, बेदख़ली अभियान चलाए लेकिन यह सारी ही चीज़ें वह पार्टी के भीतर अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए करते हैं.
इसके अलावा वह कहते हैं, ''बीजेपी लगातार दो बार से सत्ता में है और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब एक ही पार्टी दस सालों से सत्ता में रहती है तो उनके ख़िलाफ़ एंटी-इन्कमबेंसी स्वाभाविक हो जाता है. ऐसे में ध्रुवीकरण की राजनीति के ज़रिए वोटरों को एक अलग लाइन पर लामबंद किया जा सकता है और हिमंता वही करने की कोशिश कर रहे हैं.''
'सरकार की कमियां छुपाना'
वरिष्ठ पत्रकार समीर पुरकायस्थ मानते हैं कि हिमंता बिस्वा सरमा ध्रुवीकरण की जो राजनीति करते हैं.
पुरकायस्थ के मुताबिक, साल 2016 में जब बीजेपी पहली बार असम में सत्ता में आई थी, तब उसने डबल इंजन की सरकार के ज़रिए बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे का स्थायी समाधान करने का वादा किया था.
लेकिन लगभग एक दशक बाद भी यही मुद्दा चुनावी भाषणों में दोहराया जा रहा है.
वह कहते हैं, ''अगर वाकई में उन्हें इसका कोई हल निकालना होता तो साल 2019 में एनआरसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे लागू किया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इससे यह संकेत मिलता है कि इस मुद्दे को जानबूझकर जिंदा रखा जा रहा है, ताकि उससे राजनीतिक फ़ायदा लिया जा सके.''
असम के छह समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं. साल 2016 में बीजेपी ने इनकी मांग को पूरा करने का वादा किया था कि लेकिन वह वादा भी पूरा नहीं हुआ.
ये छह समुदाय हैं - ताई अहोम, मोरान, मटक, चुटिया, कोच-राजबोंगशी और चाय.
इन समुदायों की असम की राजनीति में बड़ी हिस्सेदारी है, ख़ासकर ऊपरी असम और चाय बागान की बेल्ट में इनका अच्छा प्रभाव है.
पुरकायस्थ कहते हैं कि 'इन मुद्दों से ध्यान भटकाने और सरकार की कमियों को छुपाने के लिए हिमंता ध्रुवीकरण की राजनीति का सहारा ले रहे हैं ताकि हिंदू वोटबैंक एकजुट हो जाए.'
पार्टी के अंदर एकजुटता बनाए रखना
हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने के पीछे का दूसरा सबसे बड़ा कारण है असम बीजेपी को एकजुट रखना.
पुरकायस्थ का मानना है कि असम बीजेपी बाहर से भले ही एकजुट दिखती हो, लेकिन अंदर खींचतान है.
खासतौर पर, कांग्रेस से आए नेताओं को लेकर पुराने बीजेपी नेताओं में नाराज़गी रहती है.
जानकार यह भी इशारा करते हैं कि राज्य कैबिनेट में प्रभावशाली पदों पर कई ऐसे नेता हैं, जो पहले कांग्रेस में थे. इससे पार्टी के भीतर असंतोष की भावना बनी रहती है.
ऐसे में पुरकायस्था के अनुसार, हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा वह साझा बिंदु बन जाता है, जिस पर अलग-अलग गुट में बटी पार्टी एकजुट हो जाती है. और यह मुद्दा अंदरूनी मतभेद को दबाने में भी काम आता है.
राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं
पुरकायस्था के मुताबिक तीसरा और सबसे अहम पहलू हिमंता की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से जुड़ा है.
वे मानते हैं कि हिमंता की नज़र सिर्फ़ असम तक सीमित नहीं है, बल्कि वे खुद को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं.
इस संदर्भ में उनकी तुलना योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं से की जाती है, जहां एक तरह की प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है कि कौन अधिक प्रभावशाली हिंदुत्व चेहरा बन सकता है.
पुरकायस्था का कहना है कि इसी वजह से हिमंता अपनी छवि एक कट्टर हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते हैं, ताकि उन्हें आरएसएस का समर्थन भी मिल सके.
हिमंता एक समुदाय के ख़िलाफ़ ऐसी भाषा का इस्तेमाल इसलिए भी कर पाते हैं, क्योंकि उनकी मुस्लिम वोटों पर निर्भरता काफ़ी कम हो गई है.
2011 की जनगणना के मुताबिक, असम देश के उन बड़े राज्यों में शामिल है जहां मुस्लिम आबादी का प्रतिशत अधिक है.
साल 2023 में हिमंता के कार्यकाल के दौरान ही असम में डिलिमिटेशन की प्रक्रिया पूरी की गई, जिसके तहत विधानसभा क्षेत्रों की नई सीमाएं तय हुईं. आबादी के आधार पर इलाकों का फिर से बंटवारा हुआ और इसका असर यह पड़ा कि मुस्लिम या अल्पसंख्यक बहुल सीटों की संख्या घट गई.
समीर बताते हैं कि पहले जहां अल्पसंख्यक बहुल सीटें लगभग 30 थीं, वह घटकर 22 रह गई हैं. साथ ही कई ऐसी सीटें भी बदल गईं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक था.
उनके मुताबिक, ''इसका सीधा फायदा उन पार्टियों को होगा जो बहुसंख्यक वोटों पर ज़्यादा निर्भर हैं, जैसे बीजेपी. यही कारण है कि हिमंता अब अपनी राजनीति को और खुलकर बहुसंख्यक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द रख सकते हैं क्योंकि बदले हुए चुनावी गणित में उन्हें अल्पसंख्यक वोटों की उतनी ज़रूरत नहीं रह गई है.''
असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए आगामी नौ अप्रैल को मतदान होने हैं और नतीजे 4 मई को जारी किए जाएंगे. बीजेपी ने साल 2021 में कुल 93 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 60 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
पार्टी का गठबंधन असम की क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद और राज्य के बोडोलैंड क्षेत्र में प्रभावी यूनाइटेड पीपुल पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) के साथ था. एनडीए ने कुल 126 सीटों में से 75 सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाली महाजोट गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित