ईरान युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट के बाद चीन दूसरे देशों से आगे क्यों है?

    • Author, ओसमंड चिया
    • पदनाम, बिज़नेस संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

चीन लंबे समय से ख़ुद को तेल संकट से निपटने के लिए तैयार रहा था, लेकिन ईरान युद्ध के कारण एक अहम ग्लोबल शिपिंग रूट में आई रुकावट अब उसकी मज़बूती की परीक्षा ले रही है.

मध्य पूर्व से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति ठप पड़ी है, क्योंकि ईरान ने उन जहाज़ों पर हमला करने की धमकी दी है जो होर्मुज़ स्ट्रेट से गुजरते हैं. यह धमकी अमेरिका-इसराइल हमलों के जवाब में दी गई है.

इस नाकेबंदी के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति का संकट खड़ा हो गया है, जिसने खाड़ी पर निर्भर एशियाई देशों को बुरी तरह प्रभावित किया है.

फिलीपींस ने ईंधन बचाने के लिए चार दिन का वर्क वीक लागू किया है और इंडोनेशिया अपने सीमित भंडार को जल्दी खत्म होने से बचाने के उपाय खोज रहा है.

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इस दबाव को दुनिया का सबसे बड़ा तेल ख़रीदार चीन भी महसूस कर रहा है.

लेकिन अपने पड़ोसियों के मुकाबले चीन की स्थिति बेहतर है, क्योंकि उसने सालों की नीति के जरिए खुद को किसी भी संभावित ऊर्जा संकट के लिए तैयार किया है.

चीन की परीक्षा की घड़ी

फ़रवरी के आख़िर में अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमले शुरू करने के बाद से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता देखी जा रही है.

इसके बाद से तेल की क़ीमतें कई बार बढ़कर करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. इसका कारण शिपिंग और ऊर्जा ढांचे पर हमले और होर्मुज़ स्ट्रेट का प्रभावी रूप से बंद होना है, जो दुनिया का सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्ग है.

यूएस एनर्जी इनफ़ॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) के मुताबिक़, दुनिया का क़रीब 20 प्रतिशत तेल यहां से गुजरता है, यानी हर दिन लगभग 2 करोड़ बैरल.

इस कमी के कारण कई देश खाड़ी के बाहर से कच्चे तेल के वैकल्पिक सप्लायर तलाश रहे हैं, जबकि कुछ देश अपने रिज़र्व भंडार का इस्तेमाल कर रहे हैं.

कई बाज़ार विश्लेषकों ने बीबीसी को बताया कि अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता चीन रोज़ाना करीब 1.5 से 1.6 करोड़ बैरल तेल इस्तेमाल करता है.

यह तेल मुख्य रूप से चीन के बड़े परिवहन नेटवर्क-कार, ट्रक और हवाई जहाज़ के लिए इस्तेमाल होता है. और इसका बड़ा हिस्सा विदेश से आता है.

ईआईए के अनुसार, खाड़ी देश चीन के लिए तेल का बड़ा स्रोत हैं. सऊदी अरब और ईरान से आने वाला तेल उसके कुल आयात का 10 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा है.

ईरान और मध्य पूर्व से दक्षिण चीन सागर के रास्ते आने वाले देश का ज़्यादातर आयातित कच्चा तेल, फ़ैक्ट्रियों और परिवहन के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल होता है, ख़ासकर चीन के दक्षिणी हिस्से में.

हालांकि, देश का उत्तरी हिस्सा मुख्य रूप से घरेलू उत्पादन और रूस से पाइपलाइन के ज़रिए आने वाले तेल आयात से चलता है. मध्य पूर्व के युद्ध का इन पर असर नहीं पड़ा है.

जहां कई एशियाई देश खाड़ी के तेल पर निर्भर रहे हैं, वहीं रूस से आने वाला तेल चीन के कुल ऊर्जा आयात का लगभग पांचवां हिस्सा है. इससे अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों के बावजूद, रूस चीन का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है.

कोयला भी चीन के बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत है और यह देश में बड़ी मात्रा में उपलब्ध है.

चीन दुनिया का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक है और वैश्विक उत्पादन का आधे से ज़्यादा हिस्सा उसके पास है.

सरकारी मीडिया के अनुमानों के अनुसार, चीन के कुल ऊर्जा मिश्रण में तेल और गैस की हिस्सेदारी सिर्फ़ एक चौथाई से थोड़ी ज्यादा है. इससे वह यूरोप और अमेरिका की तुलना में इन संसाधनों पर कम निर्भर है.

मुश्किल समय के लिए तैयारी

सैक्सो बैंक के कमोडिटी स्ट्रेटेजी प्रमुख ओले हैनसन का कहना है कि चीन ने सालों में कच्चे तेल की कम क़ीमतों और खाड़ी देशों से भरपूर आपूर्ति का फ़ायदा उठाकर दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक तैयार किया है.

चीन के कस्टम प्रशासन के आंकड़े बताते हैं कि इस साल जनवरी और फ़रवरी में ही बीजिंग ने पिछले साल की उसी अवधि की तुलना में 16 प्रतिशत ज़्यादा कच्चा तेल ख़रीदा.

ईरान चीन के लिए सस्ते कच्चे तेल का अहम सप्लायर रहा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन ईरान के 80 प्रतिशत से ज़्यादा तेल निर्यात को खरीदता है.

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद के जहाज़ ट्रैकिंग डेटा से संकेत मिलता है कि इस तेल का कुछ हिस्सा अभी भी चीन पहुंच रहा है, हालांकि चीन के कुल भंडार के आकार को लेकर विश्लेषकों में मतभेद है.

ट्रेड एनालिटिक्स समूह केप्लर के अनुसार, 4.6 करोड़ बैरल से ज़्यादा ईरानी कच्चा तेल दक्षिण चीन सागर में टैंकरों में मौजूद है, जो कई दिनों की ऊर्जा ज़रूरत के बराबर है.

हैनसन के मुताबिक, अनुमान बताते हैं कि चीन ने करीब 90 करोड़ बैरल का भंडार जमा कर लिया है, जो लगभग तीन महीने के आयात के बराबर है. चीनी सरकारी मीडिया ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के हवाले से कहा है कि उसके पास करीब 1.4 अरब बैरल पेट्रोल भंडार है.

हैनसन कहते हैं कि यह स्पष्ट नहीं है कि चीन रोज़ाना आयात की जाने वाली ऊर्जा का कितना हिस्सा तुरंत इस्तेमाल कर रहा है और कितना अपने भंडार में डाल रहा है. लेकिन इतनी बड़ी मात्रा किसी भी रुकावट के समय एक "मजबूत सुरक्षा कवच" का काम करती है.

अपने भंडार के बावजूद, बीजिंग ने निकट भविष्य में आपूर्ति प्रबंधन को लेकर सतर्कता के संकेत दिए हैं.

रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन के अधिकारियों ने तेल रिफ़ाइनरियों को फ़िलहाल ईंधन निर्यात रोकने का निर्देश दिया है, ताकि घरेलू क़ीमतों को नियंत्रण में रखा जा सके. इस मुद्दे पर चीन सरकार ने बीबीसी के सवालों का जवाब नहीं दिया.

आत्मनिर्भरता की दिशा में चीन की कोशिश

चीन क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर बन चुका है और देश भर में तेज़ी से पवन और सौर ऊर्जा परियोजनाएं विकसित कर रहा है.

2024 में पवन, सौर और जलविद्युत से चीन की एक तिहाई से ज़्यादा बिजली पैदा हुई. इसके बाद से देश ने अपने नवीकरणीय ऊर्जा नेटवर्क का और विस्तार किया है और अनुमान है कि अब कुल स्थापित क्षमता का आधे से ज़्यादा हिस्सा क्लीन एनर्जी स्रोतों से आता है.

इस बदलाव के कारण 2024 में चीन की कुल ऊर्जा खपत में कच्चे तेल की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत रह गई.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, भविष्य में तेल की मांग में दोबारा बड़ी बढ़ोतरी की संभावना नहीं है.

ऊर्जा अर्थशास्त्र शोधकर्ता रोजर फूके के मुताबिक, नवीकरणीय ऊर्जा की ओर चीन का "महत्वाकांक्षी" बदलाव सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं है, बल्कि इसने ईरान संघर्ष जैसे वैश्विक जोखिमों से उसकी अर्थव्यवस्था को बचाने में भी मदद की है.

उन्होंने कहा, "कुछ हद तक चीन भाग्यशाली है कि 25 साल पहले उसने नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश शुरू किया और अब उसका फ़ायदा उठा रहा है."

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी के रोक शी ने कहा, "इलेक्ट्रिक वाहन, जो चीन में बिकने वाली नई कारों का कम से कम एक तिहाई हिस्सा हैं, ने भी देश को तेल पर कम निर्भर बनाने में मदद की है."

उन्होंने कहा, "इसका मतलब है कि चीन में इलेक्ट्रिक वाहन चलाने वाला व्यक्ति मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने पर पेट्रोल की क़ीमतों से ज्यादा प्रभावित नहीं होता. उसकी परिवहन लागत अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार से अलग हो चुकी है."

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि चीनी अर्थव्यवस्था तेल आपूर्ति के झटकों से पूरी तरह सुरक्षित है.

ऊर्जा संकट के दौरान ईंधन की क़़ीमतें बढ़ने पर इलेक्ट्रिक कारों की चार्जिंग लागत भी बढ़ सकती है.

पिछले हफ्ते, सरकारी समाचार पत्र चाइना डेली के अनुसार, पेट्रोल और डीजल की क़ीमतों में क्रमशः 695 युआन (100 डॉलर) और 670 युआन प्रति टन की बढ़ोतरी हुई.

चीन की फ़ैक्ट्रियों के लिए, तेल की बढ़ती क़ीमतें उसके बड़े पेट्रोकेमिकल उद्योग की लागत भी बढ़ा सकती हैं, जो प्लास्टिक, उर्वरक और अन्य रसायन बनाता है.

रोक शी ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक होने के कारण, अब हर बैरल तेल की क़ीमत युद्ध के कारण ज़्यादा होगी. लेकिन चीन के पास यह अतिरिक्त क़ीमत चुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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