ईरान ने अपनी रणनीति से क्या अमेरिका और इसराइल को हैरान किया है?

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- Author, प्रभात पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
28 फ़रवरी को जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर साझा हमले शुरू किए थे तो सवाल ये था कि युद्ध कितने दिन चलेगा?
अब बात दिनों से निकलकर हफ़्तों से गुज़रकर महीने पर आ गई है और युद्ध ख़त्म होने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.
31 मार्च (मंगलवार) को यानी लड़ाई शुरू होने के एक महीने और तीन दिनों बाद डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका 'दो या तीन हफ़्तों' के भीतर ईरान से बाहर निकल जाएगा.
मतलब लड़ाई फ़िलहाल फ़ौरन तो ख़त्म होती नहीं दिख रही है.
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जंग शुरू होने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप ने जिन-जिन बातों की उम्मीद रखी थी वो सब नहीं हुआ.
- शुरुआती ज़बरदस्त नुक़सान के बावजूद ईरान जंग में बना हुआ है.
- अमेरिका और उसके नेटो के सहयोगी देशों में लड़ाई को लेकर मतभेद साफ़ दिख रहे हैं.
- खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करके ईरान ने उन्हें ना सिर्फ़ ज़बरदस्त नुक़सान पहुंचाया है बल्कि इन देशों की सुरक्षित देश होने की छवि पर भी विपरीत असर पड़ा है.
- विशेषज्ञों के मुताबिक़ कहीं ना कहीं गल्फ़ देशों का अमेरिका पर सुरक्षा गारंटी को लेकर भरोसा कम हुआ है.
- होर्मुज़ स्ट्रेट को ईरान ने बंद कर दिया है जिसकी वजह से दुनिया के एक बड़े हिस्से में गंभीर तेल संकट पैदा हो गया है. इसी वजह से अब कई देश अमेरिका और इसराइल पर युद्ध जल्द ख़त्म करने के लिए दबाव बना रहे हैं.
- वहीं अमेरिका ने ब्रिटेन, फ़्रांस, इटली, स्पेन और कनाडा जैसे सहयोगी देशों पर ईरान युद्ध में मदद ना देने का आरोप लगाया.
क्या दबाव में आ गए हैं अमेरिका और इसराइल

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इसके अलावा ईरान के मिनाब के प्राइमरी स्कूल पर हुए हमले में बड़ी संख्या में लड़कियों की मौत हुई. फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली और चीन समेत कई देशों ने इस हमले की निंदा की.
कई और देशों ने भी अमेरिका और इसराइल की इस हमले के लिए कड़ी निंदा की. हालांकि अमेरिका और इसराइल दोनों ने ही अब तक नहीं माना है कि हमले के पीछे उनका हाथ था.
कुल मिलाकर लड़ाई का चार हफ़्तों से भी ज़्यादा समय बीत चुका है, लड़ाई ख़त्म नहीं हुई, होर्मुज़ स्ट्रेट बंद है, दुनिया तेल संकट से जूझ रही है, टॉप लीडरशिप के मारे जाने के बाद भी ईरान लड़ाई में डटा हुआ है और लड़ाई ख़त्म करने के लिए अपनी शर्तें रख रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई देशों के निशाने पर अमेरिका और इसराइल आ गए हैं. लड़ाई के ख़िलाफ़ ख़ुद अमेरिका में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और कई देशों में ईरान को लेकर सहानुभूति पनप रही है.
यानी ईरान अपने वॉर टैक्टिस (युद्ध रणनीति) और डिप्लोमेसी (कूटनीति) से अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ कुछ हद तक माहौल बनाने में कामयाब रहा.

अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के जानकार हैप्पीमोन जैकब के मुताबिक़ युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और इसराइल ने जिन बातों को लेकर रणनीति बनाई होगी उनमें से कई चीज़ों को ठीक से नहीं आंका गया.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से हैप्पीमोन जैकब ने कहा, "पहली बात तो ये कि ट्रंप के तौर तरीक़े और उनका व्यक्तित्व मुख्य समस्या रही है. उनका डिप्लोमेसी को धोखे के औज़ार के तौर पर इस्तेमाल करना, किसी नए राष्ट्र प्रमुख को सार्वजनिक तौर पर अपमानित करना और ख़ुद के शुरू किए गए युद्ध में सहयोगी देशों के शामिल होने की उम्मीद करना, साथ ही ईरान पर हमले के लिए जिनेवा टॉक को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करना ज़्यादा विशेषज्ञों के गले नहीं उतरा."
हैप्पीमोन जैकब के मुताबिक़, इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू को लगता है कि युद्ध से घरेलू राजनीति में उनको फ़ायदा होगा, और जब किसी नेता को ऐसा लगने लगता है तो वो युद्ध में किसी दूसरे पारंपरिक नेता के जैसे फ़ैसले नहीं लेता.
ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया है जिससे दुनिया के कई देशों में तेल सप्लाई पर गंभीर असर पड़ा है.
ईरान ने भारत, चीन, पाकिस्तान समेत बस कुछ चुनिंदा देशों के जहाज़ों को ही अब तक सीमित तौर पर होर्मुज़ से निकलने की अनुमति दी है. इस वजह से इन देशों ने ईरान के प्रति सहानुभूति वाला रवैया अपनाया हुआ है. इसने भी अमेरिका और इसराइल को असहज किया है.
हैप्पीमोन जैकब कहते हैं, "पहले समझा गया कि ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट बंद करने की धमकी को अमल में नहीं लाएगा क्योंकि इससे उसके भी व्यापारिक हितों पर असर पड़ेगा. लेकिन ईरान ने असल में ही होर्मुज़ को बंद कर दिया. ईरान जैसा देश जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, जो एक ख़ास विचारधारा पर मज़बूती से टिका रहता है उसके केस में ऐसे क़दम उठाने पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए."
जैकब के मुताबिक़, अपने आला नेताओं और अधिकारियों को खोने के बावजूद ईरान लड़ाई जारी रखे हुए है और उसकी इस रणनीति ने कई देशों को चौंका दिया है, असहज कर दिया है और चिंतित कर दिया है.
ट्रंप का यू-टर्न?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 23 मार्च को ट्रुथ सोशल पर ऐलान किया था कि युद्ध ख़त्म करने को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच काफ़ी अच्छी बातचीत चल रही है.
रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर लिखा, "ट्रंप ने यह युद्ध ईरानी शासन को गिराने के मक़सद से शुरू किया था लेकिन इसमें नाकाम रहने के बाद अब वही ट्रंप उसी शासन से बातचीत कर रहे हैं, जिसे हटाने निकले थे. और इस बीच उनका युद्ध अब भी ग्लोबल इकॉनमी को बंधक बनाए हुए है. ईरान की मौत और अमेरिका की पूर्ण जीत जैसे दावों से अचानक ईरान के साथ बहुत अच्छी और सकारात्मक बातचीत तक पहुंचना दरअसल ज़मीनी हकीकत से मजबूर होकर किया गया यू-टर्न है."

वहीं ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका और इसराइल के सैन्य अभियान शुरू होने के एक महीने बाद शनिवार, 28 मार्च को एक नया मोर्चा खुल गया है.
शनिवार को यमन से इसराइली इलाके़ की ओर मिसाइलें दागी गईं.
लेबनान में मौजूद हिज़्बुल्लाह की ओर से भी इसराइल पर हमले किए जा रहे हैं जिससे निपटने के लिए इसराइल को जवाबी हमले करने पड़े. इसराइल ने अपनी सैन्य ताक़त से लेबनान में हमले कर काफ़ी नुक़सान तो ज़रूर पहुंचाया लेकिन उसे इसके लिए अपने काफ़ी सैन्य संसाधन ख़र्च करने पड़े.
हमीद्रेज़ा अज़ीज़ी जर्मन इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल एंड सेक्योरिटी अफ़ेयर्स, बर्लिन में विज़िटिंग फ़ेलो हैं. उन्होंने हालिया ईरान युद्ध पर एक विश्लेषण लिखा है जिसका शीर्षक है 'हाऊ ईरान रीरोट इट्स वॉर स्ट्रैटजी'.
इसके बारे में कार्नेगी एन्डॉवमेंट से बात करते हुए उन्होंने ईरान की रणनीति पर चर्चा की.

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उन्होंने कहा, "ईरान ने मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल करके अहम बुनियादी ढांचों को निशाना बनाकर अमेरिका और इसराइल के लिए युद्ध की लागत बढ़ा दी."
वो कहते हैं, "ईरान ने जानबूझकर इस युद्ध को क्षेत्रीय संघर्ष के तौर पर पेश किया है. ईरान इस टकराव को द्विपक्षीय संघर्ष की तरह नहीं देख रहा है बल्कि इसे एक मल्टी-थिएटर कनफ़्लिक्ट के तौर पर पेश कर रहा है."
"इससे उसे ये फ़ायदा मिला है कि अमेरिका और इसराइल पर लेबनान, इराक़, फ़ारस की खाड़ी जैसे अलग-अलग मोर्चों से भी हमला हो रहा है और उन्हें अपने सैन्य संसाधन कई दिशाओं में ख़र्च करने पड़ रहे हैं. इससे ईरान ने अमेरिका और इसराइल के लिए भी अनिश्चितता की स्थिति बना दी है और उन्हें पता नहीं चल रहा है कि अगला हमला उन पर किस दिशा से होगा."
उनके मुताबिक़, ईरान की रणनीति शुरू से ही युद्ध जीतने की नहीं बल्कि थकाने वाली रणनीति पर आधारित है.
वो कहते हैं, "ईरान युद्ध का फ़ौरन अंत नहीं चाहता बल्कि समय के साथ सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाए रखना चाहता है, ताकि विरोधी पक्ष की लड़ाई को ना सिर्फ़ उनके लिए बल्कि उनके सहयोगी देशों के लिए भी महंगा कर दिया जाए."
सुरक्षा और रणनीति मामलों के विशेषज्ञ सी उदय भास्कर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के संपादक नितिन श्रीवास्तव से बात करते हुए कहा था, "अमेरिका और इसराइल ने ख़ुद अंदाज़ा नहीं लगाया होगा कि ईरान इस युद्ध में इतना लंबा सस्टेन करेगा. ट्रंप को लग रहा था कि वेनेज़ुएला में जो उन्होंने किया वो ईरान में भी कर लेंगे. लेकिन अली ख़ामेनेई की मौत ने पूरे ईरान को एकजुट कर दिया."
विशेषज्ञों के मुताबिक़ ट्रंप को लग रहा था कि ईरानी जनता वहां के शासन के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आएगी लेकिन ख़ामेनेई की मौत ने उल्टा असर किया.
उदय भास्कर ये भी कहते हैं कि पिछले साल जब इसराइल ने ईरान पर हमला किया तो उससे ईरान ने एक सबक सीखा.
उनके मुताबिक़, "ईरान ने अपने हथियारों और लीडरशिप को पूरे देश में डिस्ट्रीब्यूट कर दिया. अधिकारियों को ऑटोनमी दे दी. पूरी योजना बना ली गई कि टॉप लीडरशिप नहीं भी रही तो भी उन्हें क्या करना है. फ़ैसले लेने में कोई असमंसज की स्थिति नहीं रही और ईरान ने चारों तरफ़ से अपने हमलों को अंजाम दिया."
अमेरिका और सहयोगी देशों में मतभेद

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इस बीच 31 मार्च (मंगलवार) को ईरानी हवाई हमले में कुवैत का एक तेल टैंकर जल गया.
वो भी डोनाल्ड ट्रंप की इस चेतावनी के बाद कि 'अगर ईरान समझौते पर नहीं आता और होर्मुज़ स्ट्रेट बंद रहता है, तो ईरान की बिजली, तेल और ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाया जाएगा.'
मंगलवार को ही ट्रंप ने ब्रिटेन, फ़्रांस और स्पेन जैसे देशों और नेटो पर ईरान युद्ध में मदद ना करने का आरोप लगाकर चेतावनी के लहजे में कहा कि 'अमेरिका ये सब याद रखेगा.'
उन्होंने ये भी कहा था कि ब्रिटेन को तेल चाहिए तो होर्मुज़ जाकर उसे ख़ुद अपने तेल का इंतज़ाम कर लेना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































