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राजकोट: इस मामले में हिंदू और मुसलमान साथ आए, मिलकर जीती क़ानूनी लड़ाई
- Author, गोपाल कटेशिया
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, राजकोट से
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
कुछ दिन पहले गुजरात सरकार ने राजकोट शहर के जंगलेश्वर और आस-पास के इलाक़ों में 1358 घरों में रहने वाले लोगों को घर खाली करने के नोटिस जारी किए थे.
गुजरात हाई कोर्ट ने इस नोटिस को रद्द कर दिया है, जिससे इलाक़े के लोगों ने राहत की सांस ली है.
आजी और खोखरदडी नदियों के पश्चिमी तट पर स्थित इन घरों में सात हजार से अधिक लोग रहते हैं. प्रशासन ने उन्हें सात दिनों के भीतर घर खाली करने के लिए कहा था.
उन्हें ये कहा गया था कि 'ये घर सरकारी ज़मीन पर बनाए गए हैं और इसलिए यह सरकारी ज़मीन का अतिक्रमण है.'
जंगलेश्वर के अलावा, इसके दक्षिण में स्थित बुद्ध नगर, राधाकृष्ण नगर, नालोदा नगर और सिद्धार्थ नगर जैसे इलाक़ों में भी नोटिस जारी किए गए थे. यह पूरा क्षेत्र लोगों के बीच जंगलेश्वर के नाम से ही जाना जाता है.
इस इलाक़े में मिली-जुली आबादी रहती है. जंगलेश्वर क्षेत्र में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, जबकि अन्य बस्तियों में हिंदुओं की संख्या ज़्यादा है.
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हाल ही आई इस मुश्किल को देखते हुए इलाक़े में रहने वाले दोनों धर्मों के लोग 'हिंदू-मुस्लिम एकता मंच' नामक एक समूह के अधीन एक बार फिर एकजुट हुए और भूमि से बेदखल करने की प्रक्रिया के ख़िलाफ़ कानूनी लड़ाई शुरू की.
इस मंच के लोगों ने कानूनी लड़ाई के हर चरण में यह सुनिश्चित किया कि 'हिंदू-मुस्लिम एकता की परिकल्पना' बनी रहे और दोनों धर्मों के लोग अपने अधिकारों के लिए एक साथ लड़ते हुए दिखाई दें.
सोमवार को जब गुजरात हाई कोर्ट ने गुजरात लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 202 के तहत स्थानीय मामलतदार की तरफ से जारी ज़मीन खाली करने के नोटिस को रद्द कर दिया, तो पूरे इलाक़े के लोग जश्न मनाने के लिए सड़कों पर उतर आए.
वहां के स्थानीय लोगों ने बीबीसी गुजराती को बताया कि मुसलमान अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ प्रार्थना करने के लिए मंदिरों में भी गए और इसी तरह हिंदू भी अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ हसनशाह पीर के मकबरे पर सिर झुकाने गए.
शहर के एक सामाजिक कार्यकर्ता पुरुषोत्तम पिपरिया ने आपदा के दौरान जंगलेश्वर के लोगों की एकजुटता को 'विशाल खारे समुद्र में मीठे पानी की बूंदें' बताई और कहा कि यह एक अच्छा संदेश है.
जंगलेश्वर के लोगों को किन कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ा?
राजकोट शहर (पूर्व) के मामलतदार (एक तरह के राजस्व अधिकारी) ने पिछले साल 17 दिसंबर को लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 61 के तहत पहला नोटिस जारी किया था, जिसमें मकान मालिकों को बताया गया था कि जिस ज़मीन पर उनके घर बने हैं वह सरकारी ज़मीन है.
रविशंकर गोगिया जंगलेश्वर के आमदभाई नाई और गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले अन्य याचिकाकर्ताओं के वकील हैं.
उन्होंने बीबीसी गुजराती को बताया कि धारा 61 के तहत नोटिस मिलने पर, जंगलेश्वर के लोगों ने राजकोट की सिविल अदालत में एक याचिका दायर कर यह मांग की थी की उन्हें ज़मीन का मालिक माना जाए, क्योंकि वे उस पर तीस साल से अधिक समय से रह रहे हैं.
इसके साथ ही, जंगलेश्वर के लोगों ने हाई कोर्ट में भी एक याचिका दायर की और मांग की थी कि आगे की कार्रवाई करने से पहले जंगलेश्वर के लोगों की सुनवाई मामलतदार को करनी चाहिए.
गुजरात हाईकोर्ट ने जंगलेश्वर के लोगों की याचिका स्वीकार कर ली थी और मामलतदार ने जंगलेश्वर के लोगों की सुनवाई की.
लोगों ने ज़मीन/मकान की ख़रीद के दस्तावेज, बिजली के बिल और राजकोट नगर निगम को भुगतान की गई कर रसीदें प्रस्तुत करके उस ज़मीन पर अपना क़ब्ज़ा साबित करने की कोशिश की.
रविशंकर गोगिया ने कहा, "इन दस्तावेजों के आधार पर मामलतदार ने आदेश दिया कि ये लोग ज़मीन के मालिक नहीं हैं. 27 जनवरी, 2026 को इस आदेश की प्रतियां आवेदकों को भेजी गईं."
"उसी दिन, उस आदेश को लागू करने के लिए, मामलतदार ने लैंड रेवेन्यू की धारा 202 के तहत आवेदकों को अंतिम नोटिस जारी कर उन्हें सात दिनों के भीतर ज़मीन खाली करने का निर्देश दिया."
उन्होंने कहा, "याचिकाकर्ताओं ने गुजरात रेवेन्यू ट्रिब्यूनल (जीआरटी) में मामलतदार के आदेश को चुनौती दी. उन्होंने सरकार को एक आवेदन भी दिया जिसमें उनके मकानों को गिराए जाने की स्थिति में वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था, लेकिन सरकार ने इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की है. इस क्षेत्र के लोगों के भूमि स्वामित्व संबंधी दावे भी राजकोट के सिविल कोर्ट में लंबित हैं."
ऐसे में याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर कर धारा 202 के नोटिस को रद्द करने और सरकार को याचिकाकर्ताओं के लिए वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की.
जंगलेश्वर के लोगों की ओर से बिना किसी शुल्क के केस लड़ रहे रविशंकर गोगिया ने कहा कि विभिन्न अदालतों में याचिकाकर्ताओं की मांग यह है कि उन्हें उस ज़मीन का मालिकाना हक़ दिया जाए जिस पर उनके घर बने हैं या उन्हें वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराए जाएं.
2001 के भूकंप के दौरान गठित हुआ था 'हिंदू-मुस्लिम एकता मंच'
जंगलेश्वर में पान की दुकान चलाने वाले आमदभाई नाई बताते हैं कि पूरे जंगलेश्वर क्षेत्र में 35 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है और 65 प्रतिशत हिंदू है.
वे आगे कहते हैं कि साल 2001 के कच्छ में आए भूकंप के बाद, दोनों धर्मों के लोग 'हिंदू-मुस्लिम एकता मंच' नामक एक समूह के तहत एकजुट हुए और कई तरह के सामाजिक कार्य करते थे.
यही एकता घर गिराए जाने का नोटिस मिलने पर बहुत काम आई.
आमदभाई ने कहा, "हम साठ वर्षों से साथ रहते हैं, लेकिन 'हिंदू-मुस्लिम एकता मंच' का पहला विचार हमारे मन में तब आया जब 26 जनवरी, 2001 को गुजरात में भूकंप आया और कई ग़रीब लोगों को भारी नुक़सान हुआ."
"तब हमने तय किया कि हमें एक 'हिंदू-मुस्लिम एकता मंच' बनाना चाहिए और जहां भी पीड़ित लोग हों, वहां राहत पहुंचाना हमारा दायित्व है. हमें मानवता दिखानी है... उस समय केवल एक ही संदेश था, किसी का नाम नहीं, किसी को कोई पद नहीं, बस हिंदू-मुस्लिम एकता मंच..."
आमदभाई आगे कहते हैं कि दिसंबर में पहला नोटिस मिलने के बाद इस समूह के सदस्य एक बार फिर सक्रिय हो गए.
उन्होंने कहा, "सबसे पहले हम एक संगठन के रूप में हाई कोर्ट में और ज़मीनी स्तर पर लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट हुए. हमारी लड़ाई क़ानूनी है और हमें देश के संविधान पर भरोसा है, हमें अदालत पर भरोसा है."
"हमने सभी सरकारी दस्तावेज इकट्ठा किए, जब याचिका दायर करने की बात आई, तो हम कभी अलग से नहीं कर सकते. हमें यह कहने की जरूरत नहीं पड़ी कि हिंदू याचिका अलग होगी और मुस्लिम याचिका अलग हो. हम भाईचारे को मानते हैं, इसलिए हमने अदालत में एक साथ याचिका दायर की."
एक याचिकाकर्ता हिंदू है और एक याचिकाकर्ता मुस्लिम
राजकोट की सिविल कोर्ट में लालाभाई मादाकिया के नेतृत्व में भूमि के स्वामित्व का दावा किया गया था और अन्य मुस्लिम धर्म के लोग एक तरह से सह-आवेदक बन गए हैं.
धरमशी भोजाविया सहित हिंदू लोगों और आमदभाई के नेतृत्व में अन्य मुसलमानों ने धारा 202 के नोटिस के ख़िलाफ़ आवेदन दायर किया.
इसी तरह, राधाकृष्णनगर में पान की दुकान चलाने वाले लक्ष्मणभाई जमोड के नेतृत्व में कुछ मुसलमानों ने एक और याचिका दायर की थी. उच्च न्यायालय ने इन दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की.
राधाकृष्णनगर में किराने की दुकान चलाने वाले बावभाई आहीर के नेतृत्व में दोनों धर्मों के लोगों ने मामलतदार के आदेश के ख़िलाफ़ जीआरटी में अपील दायर की है.
आमदभाई के वकील रवि गोगिया और आनंद गोगिया हैं, जबकि लक्ष्मणभाई के वकील एमआर सैयद हैं.
लक्ष्मणभाई का कहना है कि विभिन्न अदालतों में मुख्य याचिकाकर्ता कौन होगा, यह तय करने के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता मंच की बैठक आयोजित की गई थी.
उन्होंने कहा, "सभी समुदायों के लोग, हिंदू और मुसलमान, एक साथ आए और फैसला किया कि भाई, एक याचिकाकर्ता हिंदू समुदाय से होना चाहिए और एक याचिकाकर्ता मुस्लिम समुदाय से होना चाहिए."
इस समूह को शिक्षक इरफानभाई कुरैशी और कांग्रेस नेता हारून सोरा भी सलाह दे रहे थे. हारून सोरा साल 2000 में जंगलेश्वर से राजकोट नगर निगम में पार्षद चुने गए थे.
हिंदू-मुस्लिम एकता मंच ने क्या काम किया?
आमदभाई कहते हैं कि आम दिनों में भी एकता मंच के लोग काम करते रहते हैं. उनका कहना है कि कुछ साल पहले तक इस समूह के सदस्य मामूली कीमत पर लोगों को दवाइयां देते थे.
उन्होंने आगे कहा कि इस क्षेत्र में दोनों धर्मों के लोग सामूहिक विवाह में एक-दूसरे की मदद करते हैं, और साल 2017 में, इस समूह के सदस्यों ने आज़ी और खोखरदडी नदियों में आई बाढ़ के दौरान लोगों तक राहत पहुंचाने के लिए काम किया था.
आमदभाई आगे कहते हैं, "जब कोविड-19 का दौर आया तब भी हिंदू-मुस्लिम एकता मंच ने काम किया. अब एक बार फिर सरकार की तरफ से हम पर संकट ढाया गया है."
उन्होंने आगे कहा कि एकता मंच जंगलेश्वर के लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करता रहा है.
आमदभाई आरोप लगाते हैं, "इन लोगों ने इस इलाक़े में जंगलेश्वर के नाम पर बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की योजना बनाई. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक बड़ा अभियान चलाया कि जंगलेश्वर को 202 का नोटिस जारी कर उसे गिरा दिया जाए. लेकिन हमने 1954, 1964 से दिए गए टैक्स की रिसीप्ट दी. सरकार को इसकी जानकारी थी."
"हिंदू-मुस्लिम एकता मंच ने फैसला किया कि हमें पूरी तरह संयम बरतना होगा, किसी को भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना है. आपको किसी भी अधिकारी को कुछ बताने की जरूरत नहीं है, वह अपना काम करेंगे और हमें अपना काम करना है. हम ग़रीब लोगों के घरों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे."
'जंगलेश्वर का हिंदू-मुस्लिम एकता मंच एकता का प्रतीक है'
इसी इलाक़े में रहने वाले मयूर लावड़िया नाम के एक कारोबारी का कहना है कि 37 साल में उन्होंने जंगलेश्वर में कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं देखे.
उन्होंने कहा, "सालों पहले, जब मुहर्रम के लिए ताजिया बनाया जाता था, तो हर कोई उसमें श्रीफल (नारियल) की शुभ आहुति देने जाता था और नवरात्रि के समय मुस्लिम लोग भी हमारी पूजा में शामिल होते थे. कल का दिन (सोमवार) इसका एक बड़ा उदाहरण है."
"मुस्लिम भाई जंगलेश्वर क्षेत्र के सभी मंदिरों में गए और यहाँ के सभी हिंदू हसनशाह पीर की दरगाह पर गए. हमारी ऐसी मानसिकता है कि हिंदू और मुसलमानों के बीच झगड़े होते हैं, लेकिन हमारे इलाक़े में ऐसा नहीं हुआ है और मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि ऐसा कहीं न हो."
मकसूद चावड़ा नामक एक नेता ने कहा कि जंगलेश्वर का 'हिंदू-मुस्लिम एकता मंच' एकता का प्रतीक है.
उनका मानना है, "यह लड़ाई इसलिए सफल हुई क्योंकि हिंदू और मुसलमान, सभी समुदाय एक मंच पर आए और 'गंगा-यमुनी तहज़ीब' को आज हमारे क्षेत्र ने सार्थक करके दिखा दिया है. मुझे गर्व है कि मेरे क्षेत्र ने देश को वही एकता दिखाई है जो अंग्रेजों ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान देखी थी."
सामाजिक कार्यकर्ता पुरुषोत्तम पिपरिया ने जंगलेश्वर के लोगों को उनकी कानूनी लड़ाई में सलाह दी है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मेरी राय में, जंगलेश्वर में न तो हिंदू रहते हैं और न ही मुसलमान. वहां इंसान रहते हैं. इंसान मुश्किल समय में एक-दूसरे की मदद करते हैं. जब देश में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का माहौल है, तब जंगलेश्वर के लोग एक विशाल खारे समुद्र में मीठे पानी की बूंदों की तरह हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.