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दही से लेकर ब्रेड तक, रोज़ खाई जाने वाली वे चीज़ें जिनमें छिपा होता है बहुत ज़्यादा शुगर
- Author, ग्लोबल जर्नलिज़म टीम, बीबीसी न्यूज़
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
हमें इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि हम कितनी शुगर यानी चीनी खाते हैं. हो सकता है कि हम अनजाने में ही ज़्यादा शुगर ले रहे हों और ज़्यादा शुगर खाने से टाइप 2 डायबिटीज़, दिल की बीमारियों और कैंसर का रिस्क बढ़ सकता है.
पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर में खानपान में काफ़ी बदलाव आया है और इसी के साथ मोटापे और डायबिटीज़ के मामले भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं. द लांसेट मेडिकल जर्नल में पब्लिश आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2050 तक दुनिया भर के आधे से ज़्यादा वयस्कों और एक तिहाई बच्चों, किशोरों और युवाओं के ओवरवेट होने या मोटापे से जूझने की आशंका है.
कई देश इससे निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इंटरनेशनल डायबिटीज़ फ़ेडरेशन (आईडीएफ़) के मुताबिक़ दुनिया भर में 58.9 करोड़ लोगों को डायबिटीज़ है, इनमें से 10.7 करोड़ डायबिटिक लोग दक्षिण पूर्व एशिया में हैं. आईडीएफ़ का अनुमान है कि दक्षिण पूर्व एशिया में डायबिटिक लोगों की संख्या साल 2050 में बढ़कर 18.5 करोड़ हो जाएगी.
वज़न पर काबू पाने में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक चुनौती ये है कि हम में से ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि दही से लेकर ब्रेड और केचप से लेकर स्मूदी तक जैसी रोज़ खाई जाने वाली चीज़ों में असल में कितना ज़्यादा शुगर होता है, और यहां हम छिपी हुई चीनी की मात्रा की बात कर रहे हैं.
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14 नवंबर को वर्ल्ड डायबिटीज़ डे है. इससे पहले हम आपको बता रहे हैं कि रोज़ाना ज़्यादा शुगर खाने से कैसे बचें.
फ़्री शुगर क्या होता है?
ओट्स, मेवे, बीज, शहद या दूसरी मीठी चीज़ों से तैयार ग्रेनोला, दही या फलों का रस एक हेल्दी नाश्ता लग सकता है. लेकिन आप नाश्ते के लिए कौन सी चीज़ें चुन रहे हैं, उसका ये भी मतलब हो सकता है कि दिन की शुरुआत में ही आप विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से पूरे दिन के लिए सुझाई गई मात्रा से ज़्यादा शुगर खा चुके हों.
यूके की नेशनल हेल्थ सर्विस के अनुसार, वयस्कों को रोज़ाना 30 ग्राम से ज़्यादा "फ़्री शुगर" नहीं खाना चाहिए.
"फ़्री शुगर" उस एक्स्ट्रा शुगर को कहते हैं, जो खाने या पीने की चीज़ों को मीठा करने के लिए मिलाई गई हो. साथ ही, शहद में पाया जाने वाला शुगर भी फ़्री शुगर होता है. ये फ़्री शुगर जूस में भी होते हैं.
शुगर खाने का आपके शरीर पर क्या असर पड़ेगा, ये इस बात पर निर्भर करता है कि वह शुगर खाने में किस तरह से मौजूद है. उदाहरण के लिए, जब आप कोई फल या सब्ज़ी खाते हैं, तो उसमें मौजूद फ़ाइबर पाचन को धीमा कर देता है, जिससे ब्लड शुगर में हानिकारक वृद्धि नहीं होती.
हालांकि, जब आप ऊपर से मिलाई गए शुगर या फ़्री शुगर का सेवन करते हैं, तो ये आपके ब्लड में तेज़ी से और अक्सर बड़ी मात्रा में आते हैं, जिससे आपका ब्लड शुगर बढ़ जाता है. फल या सब्ज़ी का जूस पीने के बाद भी ऐसा ही हो सकता है, क्योंकि जूस बनाने के दौरान फलों से फ़ाइबर निकल जाता है.
जब समय के साथ ब्लड शुगर में ये बड़े उतार-चढ़ाव बार-बार होते हैं, तो एक और समस्या यह हो सकती है कि इंसुलिन हार्मोन के प्रति आपकी कोशिकाओं की प्रतिक्रिया घट जाए.
पिछली पीढ़ियों की तुलना में हमारे खाने में शुगर का हिस्सा अब बहुत ज़्यादा हो गया है, जिसकी एक वजह प्रोसेस्ड फ़ूड का ज़्यादा इस्तेमाल भी है.
यहां तक कि जिन चीज़ों में आप उम्मीद भी नहीं करते, जैसे कि प्रिज़र्व्ड मीट और मछली, उन्हें भी लंबे समय तक चलने या बेहतर स्वाद देने के लिए बदल दिया गया है. इन प्रोसेस्ड फ़ूड में अक्सर नमक के साथ-साथ शुगर का भी इस्तेमाल होता है.
वहीं अल्ट्रा प्रोसेस्ड फ़ूड और भी आगे हैं. इस तरह के फ़ूड आइटम किसी न किसी तरह के औद्योगिक प्रोसेसिंग से गुज़रे होते हैं और उनमें कई ऐसी चीज़ें मिलाई गई होती हैं, जो आपको अपने किचन में शायद ही मिलेंगी.
अगर किसी फ़ूड आइटम में पांच से ज़्यादा इन्ग्रीडिएंट हैं, तो संभावना है कि वह चीज़ अल्ट्रा-प्रोसेस्ड है. इसलिए इन्ग्रीडिएंट्स पर भी गौर करें- हाई-फ़्रक्टोज़ कॉर्न सिरप, फ़्रूट जूस कॉन्सन्ट्रेट, शहद, एगेव नेक्टर, ये सभी शुगर के ही वैकल्पिक नाम हैं.
दुनिया भर में शुगर की खपत
शुगर हमारी सेहत के लिए अच्छी नहीं है, इस बात की जागरुकता बढ़ने के बावजूद अब हम रोज़ाना पहले से कहीं ज़्यादा शुगर खा रहे हैं.
दुनिया भर के हेल्थ इंस्टीट्यूट्स का कहना है कि प्रति व्यक्ति सबसे ज़्यादा शुगर की खपत वाला देश अमेरिका है. वहीं भारत, चीन, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में भी इसकी खपत तेज़ी से बढ़ रही है.
मार्च में द लांसेट ने 200 देशों को शामिल करते हुए ओवर वेट लोगों और मोटापे से जुड़े कुछ आंकड़े दिए. इसके मुताबिक़ अगर दुनिया में मोटापे का रुझान जारी रहा, तो 2050 तक ओवरवेट यानी अधिक वजन और मोटापे से जूझने वाले वयस्कों की संख्या पुरुषों में लगभग 57.4 प्रतिशत और महिलाओं में 60.3 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी.
ऐसा अनुमान है कि 25 वर्षों में, चीन, भारत और अमेरिका में अधिक वज़न या मोटापे से ग्रस्त लोगों की सबसे बड़ी आबादी होगी. चीन में 62.7 करोड़, भारत में 45 करोड़ और अमेरिका में 21.4 करोड़, जिससे इन देशों हेल्थ के सिस्टम पर बोझ बढ़ेगा.
सब-सहारन अफ़्रीका में अधिक वज़न या मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या भी 250 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़कर 52.2 करोड़ हो जाएगी. नाइजीरिया इस मामले में सबसे आगे है, जहां अधिक वज़न और मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या तीन गुना से भी ज़्यादा होने का अनुमान है.
लेकिन कुछ उपाय हैं जिनसे हम इस संकट से बच सकते हैं और अपनी सेहत का भविष्य तय कर सकते हैं.
उदाहरण के लिए, अमेरिका के सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक़ यहां 63% वयस्क रोज़ाना शुगर वाली ड्रिंक्स पीते हैं. मिठाइयों, प्रोसेस्ड फ़ूड के साथ-साथ इन पेय पदार्थों से परहेज़ करने से देश के स्वास्थ्य में काफ़ी सुधार हो सकता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन किसी भी ऊपर से डाले गए शुगर की मात्रा आपकी डेली कैलोरी के 10 प्रतिशत से कम रखने की सलाह देता है. साथ ही, और भी बेहतर सेहत के लिए इसे 5 प्रतिशत से कम (रोज़ाना लगभग छह चम्मच) रखने की सलाह देता है.
हालांकि, इस छह चम्मच में शुगर की वो मात्रा भी शामिल है, जो खाने की कई चीज़ों में मिली होती है.
शुगर की मात्रा के साथ-साथ आपके बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) पर नज़र रखने का भी सुझाव दिया जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि आप ओवरवेट हैं या नहीं.
लेकिन क्या बीएमआई वाकई मोटापे की सही गणना है?
दुनिया भर के डॉक्टर बीएमआई का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि आपकी लंबाई और वज़न के आधार पर इसकी गणना आसानी से की जा सकती है.
लेकिन यह अपने आप में पूरा नहीं है और इसकी भी सीमाएं हैं.
बीएमआई से ये मापा जाता है कि कोई व्यक्ति अपनी लंबाई के हिसाब से ज़्यादा भारी है या नहीं, लेकिन इससे यह पता नहीं लगता कि अधिक वज़न फ़ैट यानी चर्बी के कारण है या नहीं.
बीएमआई में शरीर के कई तरह के फ़ैट पर भी गौर नहीं किया जाता, जैसे कि जब पेट या दूसरे अंगों के आसपास एक्स्ट्रा फ़ैट जमा हो जाता है.
इसमें व्यक्ति की उम्र, शारीरिक गतिविधियां और उसके जेंडर को भी ध्यान में नहीं रखा जाता.
ब्रिटेन में कुछ एशियाई और दूसरे अल्पसंख्यक नस्ल के लोगों में कम बीएमआई लेवल पर भी दिल की बीमारी या टाइप 2 डायबिटीज़ जैसी हेल्थ कंडिशन का रिस्क अधिक पाया गया है. इसलिए इस साल जनवरी में ब्रिटेन के नेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर हेल्थ एंड केयर एक्सिलेंस (एनआईसीई) ने नई गाइडलाइंस दी हैं.
इस ग्रुप के लिए, किसी व्यक्ति के अधिक वज़न या मोटापे का पता लगाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बीएमआई सीमा को कम कर दिया गया है, जिसका मतलब है कि अधिक वज़न होने के संभावित जोखिमों का पहले ही पता लगाया जा सकता है.
एनआईसीई की नई गाइडलाइन्स में यह भी बताया गया है कि किस तरह शरीर की संरचना, जिसमें फ़ैट और मसल मास भी शामिल हैं, अलग-अलग नस्ल के लोगों में अलग होती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित