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औरतों पर कैसी पड़ी नोटबंदी?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
लखनऊ के दिल कहे जाने वाले हज़रतगंज में यूं तो ज़्यादातर दुकानों पर पुरुष ही बैठे मिलते हैं लेकिन कई ऐसी भी दुकानें हैं जिन्हें महिलाएं ही चला रही हैं. ऐसी ही एक दुकान की मालकिन हैं तनु.
गिफ़्ट आइटम्स की अपनी दुकान में तनु अकेली बैठी थीं. हमें कोई ग्राहक समझकर लगा कि वो ख़ुश हुईं लेकिन जब हमने नोटबंदी के बाद की स्थिति पर उनसे बात करने की इच्छा जताई तो वो हँस पड़ीं.
कहने लगीं, "दुकानदारी तो प्रभावित हुई ही, हम लोगों की पूरी दिनचर्या ही बिगड़ गई है. दुकान चल नहीं रही है, दो कर्मचारी रखे थे, पैसे न देने पाने के कारण फ़िलहाल उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया है."
तनु की पीतल और कुछ अन्य धातुओं के बने गिफ़्ट आइटम्स की दुकान है. वो और उनकी बहन ही इसे चलाते हैं और यही उनके परिवार के भरण-पोषण का आधार है. वो कहती हैं कि दुकान बंद करने की नौबत तो नहीं आई लेकिन दोनों बहनों को कई बार बैंक की लाइन में जाकर लगना पड़ा.
तनु की ही तरह अनुषा चौधरी का भी हाल है. हज़रतगंज में ही उनकी काफी पुरानी दुकान है. पहले घड़ियों की दुकान थी लेकिन अब कुछ आयुर्वेदिक सामान बेचती हैं. इनके यहां दो-तीन लोग काम करते मिले लेकिन ग्राहक कोई नहीं दिखा.
अनुषा चौधरी कहती हैं, "शुरू में दिक़्क़तें थीं लेकिन अब लोग ख़ुद को उस हिसाब से ढाल ले रहे हैं. ख़ुद उन्होंने दुकान के लिए स्वाइप मशीन मँगाई है लेकिन अभी तक वो काम नहीं कर रही है."
इन सबके बीच वो उन हालात को बयां करने से नहीं चूकतीं जो नोटबंदी के बाद अस्पताल में उन्हें झेलना पड़ा था. "मेरी माँ बीमार रहती हैं. अचानक बेटे को भी डेंगू हो गया. अस्पताल में दवाएं मिलतीं नहीं. बाहर दवा लेने गए तो सरकारी आदेश के बावजूद पुराने नोट लेने को वो तैयार नहीं थे. मजबूरन बैंकों की लाइन में लगकर पहले पैसा निकाला, फिर दवा ली."
अनुषा चौधरी बताती हैं कि एक बार उनकी बूढ़ी माँ को भी लाइन में लगना पड़ा था क्योंकि घर में दो-दो मरीजों के चलते ज़्यादा पैसों की ज़रूरत थी.
लेकिन सड़क पर फलों की दुकान लगाने वाली एक बुज़ुर्ग महिला को इससे कोई परेशानी नहीं थी. वो सालों से ये काम करती आ रही हैं इसलिए उन्हें निजी तौर पर भी किसी दिक़्क़त का सामना नहीं करना पड़ा. लेकिन ये बात उन्होंने हमसे नहीं बताई कि अभी तक उन्होंने बैंक में अपना अकाउंट क्यों नहीं खुलवाया है.
वहीं, सड़क पर ही बच्चों के कपड़े और खिलौने बेचने वाली एक अन्य महिला विमला का कहना था कि उनकी पूरी दुकानदारी ख़राब हो गई है. वो कहती हैं कि ये तो नहीं कह सकते कि लोग नोटबंदी के ही कारण नहीं आ रहे हैं, लेकिन दूसरा कोई कारण भी तो नहीं दिखता है.
यही नहीं, इलाहाबाद में अपने घर पर ही ब्यूटी पार्लर चलाने वाली एक महिला कहती हैं कि एक महीने तक फुटकर की समस्या से तंग आकर उन्होंने अपनी दुकान ही बंद कर दी. अब वो किसी दूसरी दुकान पर काम करती हैं और वहां की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है.
ऐसी महिलाएं भी बड़ी संख्या में हैं जिन्हें इस दौरान दो वक़्त की रोटी का भी इंतज़ाम करना था, घर में बच्चों को भी देखना था और कई दिनों तक उन्हें बैंक की लाइनों में खड़े भी होना पड़ा. परेशानियां अपनी जगह हैं लेकिन कामकाजी महिलाओं को नोटबंदी की समस्या के बाद एक से ज़्यादा मोर्चों पर लड़ना पड़ा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
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