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मुर्दाख़ोर गिद्धों के लिए एक रेस्तरां
- Author, प्रदीप श्रीवास्तव
- पदनाम, ललितपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
उत्तर प्रदेश के ललितपुर शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर धौरा ब्लॉक के देवगढ़ के जगंल में प्रवेश करते ही आसमान में उड़ते गिद्ध अपनी मौजूदगी का आभास कराने लगते हैं.
जंगल में जाने के लिए पक्की सड़क नहीं है. यहां कई ऐसी जगहें हैं, जहां दिन में भी पहुंचना मुश्किल है. लेकिन यहां गिद्धों के 'आशियाने' आसानी से देखे जा सकते हैं.
वैश्विक स्तर पर गिद्धों की कम होती आबादी के बीच देवगढ़ के महावीर वन अभयारण्य में इनकी संख्या में इजाफा दर्ज किया जा रहा है.
पहले इनकी संख्या 500 थी जबकि 2016 में 560 हो गई. जंगल में 1200 हेक्टेयर क्षेत्रफल में एक साल पहले 'वल्चर रेस्तरां' या 'वल्चर हब' विकसित किया गया है.
वन विभाग के कर्मचारी चुनिंदा जगहों पर नियमित तौर पर गिद्धों के लिए मृत पशुओं को रखते हैं. जंगल के अंदर रणछोड़ धाम मंदिर के आसपास गिद्धों के दर्जनों घोसलें भी हैं.
प्रकृति के सफाई कर्मचारी
ललितपुर के प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) वीके जैन कहते हैं कि आसपास के गांव वालों को भी जागरूक किया गया, जिससे वे भी मृत पशुओं को जंगल में छोड़ने लगे हैं.
लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एवं बुंदेलखंड में गिद्धों की आबादी पर पिछले डेढ़ दशक से काम कर रही प्रोफेसर अमिता कहती हैं कि गिद्धों की हर प्रजाति सफाई के लिए बनी है.
उन्होंने बताया, "ये समूह में ही रहते हैं. ये एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं. किंग वल्चर लाश को खोलने का काम करता है. इसी तरह इजिप्शियन और सेरेनियस वल्चर अंत में लाशों के मज्जा व हड्डियों को खाते हैं. गिद्धों में कौन सी प्रजाति दिल, यकृत, बिसरा, दिमाग, आंखें खाएगी, यह भी तय रहता है. गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी माना जाता है. इनका मेटाबॉलिक सिस्टम इस प्रकार बना है कि यह आहार के हर हिस्से को पचा जाते हैं. ."
स्थनीय पत्रकार सगीर खान बताते हैं कि देश में नौ प्रकार के गिद्ध पाए जाते हैं. दुलर्भ माने जाने-वाले पांच प्रकार के गिद्ध ललितपुर में हैं.
फिलहाल, देश में गिद्धों की प्रजाति के अस्तित्व पर संकट है. इनकी संख्या कुछ हजार में है जबकि 1980 के दशक में इनकी आबादी 8 करोड़ थी.
1990 में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ने राजस्थान में भरतपुर के केवलादेव नेशनल पार्क में गिद्धों की आबादी में गिरावट दर्ज की गई थी.
साथ ही नेपाल ने 2 अगस्त 2006 और कुछ समय बाद पाकिस्तान ने भी इसे प्रतिबंधित कर दिया.
'डाउन टू अर्थ' पत्रिका के संपादक व पर्यावरणविद् रिचर्ड महापात्रा के अनुसार गिद्ध फूड साइकिल के आखिरी चरण में रहते हैं. ये फूड साइकिल के इंडिकेटर भी हैं. जैसे-जैसे हमारा खानपान खराब हुआ है, वैसे-वैसे इनकी संख्या भी कम होती गई है.
गिद्धों के खतम होने से प्राकृतिक व्यवस्था बिगड़ी है. मरे हुए जानवरों का निस्तारण सही तरीके से नहीं हो पा रहा है.
गांव के बाहर मृत पशुओं के सड़ने व जमीन में घुलने से आसपास का पानी भी प्रदूषित हो जाता है. चूहों व कुत्तों की संख्या में इजाफा हुआ है, जिससे रबिज़ जैसी बीमारियां भी बढ़ीं हैं.
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