नज़रिया: अमित शाह कैसे बन गए इतने ताक़तवर?

    • Author, आरके मिश्र
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने 2014 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को जोरदार जीत दिलाई.

इसके बाद से इन दोनों की पकड़ देश पर लगातार मज़बूत होती दिखी है, हर गुजरते दिन के साथ इसकी धमक महसूस की जा सकती है. अगर आप नरेंद्र मोदी को दिमाग मान लें, तो अमित शाह की भूमिका उन मांसपेशियों की है जो उनके विचारों को धरातल पर उतार देते हैं.

दिमाग और ताक़त की इस जोड़ी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को काफ़ी हद तक पूरा कर दिखाया है और देश को भगवा झंडे से रंग डाला है. 52 साल के अमित शाह इस महीने से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर अपने चौथे साल में प्रवेश कर रहे हैं. इस सफ़र में उनके पास संतुष्ट होने की कई वजहें मौजूद हैं.

भारत के 13 राज्यों में उनकी पार्टी की सरकार है, जबकि पांच अन्य राज्यों में वे सहयोगी दलों के साथ सत्ता में हैं. इस लिहाज से देखें तो वे बीजेपी के सबसे कामयाब अध्यक्ष हैं. इसके अलावा पार्टी ने उत्तर पूर्व के राज्यों में अपनी जड़ों को काफ़ी मज़बूत किया है.

सबसे कामयाब बीजेपी अध्यक्ष

शाह की रणनीति ने पार्टी को असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में जीत दिलाई है, वहीं गोवा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को पछाड़कर बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही. महाराष्ट्र में सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने के बाद बीजेपी ने शिवसेना के साथ गठबंधन करके सरकार बनाया.

इतना ही नहीं पहली बार बीजेपी, पीडीपी के साझेदार के तौर पर जम्मू कश्मीर में सत्ता में आई. इसके बाद अमित शाह ने पार्टी को उत्तर प्रदेश में शानदार जीत दिलाई. हालांकि दिल्ली और बिहार में पार्टी को हार का सामना ज़रूर करना पड़ा लेकिन बाद नीतीश कुमार को अपने खेमे में लाकर अमित शाह ने बिहार की हारी हुई बाजी को जीत में पलट दिया.

उनकी कामयाबी में राज्य सभा पहुंचना भी शामिल है, पांच बार गुजरात में विधायक रहने के बाद अमित शाह पिछले दिनों ही राज्य सभा के सांसद चुने गए हैं.

साफ़ है कि अमित शाह को जितनी ताक़त नरेंद्र मोदी से मिली है, उसी हिसाब से वे मोदी के भरोसे पर भी खरे उतरे हैं. मोदी जो भी अपने दिमाग में सोचते हैं, अमित शाह उसे अमल में ला देते हैं. अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए दोनों, कोई भी तरीका अपनाने से नहीं हिचकते. उनका इरादा केवल लक्ष्य को हासिल करना होता है.

मसलन, अरुणाचल प्रदेश में 43 विधायकों में 33 विधायकों को साथ लाकर उन्होंने सरकार बना ली थी. इससे पहले ऐसी कोशिश में उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार को अस्थिर करने के लिए भी हुई थी. बिहार में जेडीयू-बीजेपी की सरकार को मज़बूत करने के लिए कांग्रेस विधानमंडल दल में तोड़ फोड़ की योजना पर भी काम चल रहा है.

अमित शाह के काम करने का तरीका

पार्टी और सरकार किस तालमेल से काम कर रही है, इसका एक उदाहरण तब भी देखने को मिला जब हाल में गुजरात की राज्य सभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव में शाह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल को हराने की योजना बनाई. ये एक आम चुनाव था, जिसमें अमित शाह, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और अहमद पटेल की जीत निश्चित मानी जा रही थी.

आख़िरी वक्त में अमति शाह ने कांग्रेस विधायक दल में सेंध लगाते हुए उनके एक शख़्स को बीजेपी की ओर से उम्मीदवार बना दिया. छह विधायकों के इस्तीफ़े के बाद कांग्रेस को अपने बाक़ी विधायकों को कर्नाटक में सुरक्षित ले जाकर रखना पड़ा. लेकिन कर्नाटक के जिस नेता के ये विधायक मेहमान बने थे, उसकी संपत्तियों पर केंद्रीय एजेंसियों ने उसी वक्त छापे मारे.

इतना ही नहीं, कांग्रेस की सहयोगी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो विधायकों ने भी कथित दबाव के चलते बीजेपी को अपना वोट दिया. इतना ही नहीं शाह के लोग, कर्नाटक में रहे विधायकों में से भी एक को तोड़ने में कायमाब हुए. लेकिन जनता दल यूनाइटेड के एक इकलौते विधायक ने अहमद पटेल को वोट दे कर उनकी हार को जीत में बदल दिया. लेकिन इस उदाहरण से ज़ाहिर होता है कि अमित शाह किस अंदाज़ में काम करते हैं.

किसी भी सर्वे में अगर सरकार और बीजेपी के अंदर मोदी को सबसे ताक़तवर व्यक्ति के रूप में देखा जाता है तो अमित शाह इस क्रम में दूसरे सबसे ताक़तवर राजनेता की हैसियत रखते हैं. इसका ताज़ा उदाहरण तब देखने को मिलता है जब अमित शाह के एक फोन कॉल पर एक केंद्रीय मंत्री दौड़ते हुए अपना इस्तीफ़ा सौंपने चला आता है.

2014 का चुनाव बना टर्निंग प्वाइंट

इस स्थिति को आंकने के लिए अतीत में झांकना होगा. स्वतंत्र भारत के इतिहास में साल 2014 एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. इन आम चुनावों से कांग्रेस अपने धरातल पर चली गई और बीजेपी मोदी के नेतृत्व में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही.

दशकों पहले आरएसएस का एक आम कार्यकर्ता लालकृष्ण आडवाणी का शिष्य बना और फिर 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बन गया. 13 साल तक बनाई गई इस ब्रैंडिंग का नतीजा मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में मिला. यह वही पद था जिस पर उनके गुरू आडवाणी सालों से नज़रें जमाए बैठे थे.

शाह की मोदी के साथ नज़दीकियों की वजह भी उनका लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ काम करना है. शाह जानते हैं कि मोदी क्या चाहते हैं और बाकी काम उनकी चुनावों में कड़ी मेहनत और जबर्दस्त रणनीतियां कर देती हैं.

शाह एक शानदार रणनीतिकार और कुशल आयोजक हैं. अपनी इन्हीं काबिलियतों के दम पर वे मोदी द्वारा दिए गए हर एक लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल करते हैं.

एक कारोबारी परिवार में जन्मे अमित शाह लड़कपन में ही आरएसएस से जुड़ गए थे. मोदी से उनका जुड़ाव अस्सी के दशक में तब हुआ, जब दोनों बीजेपी में शामिल हुए थे. यह मोदी ही थे जिन्होंने 1995 में पार्टी के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को इस बात के लिए मनाया कि शाह को गुजरात स्टेट फाइनैंशियल कॉर्पोरेशन का चेयरमैन नियुक्त कर दिया जाए.

जिस वक़्त बीजेपी हाई कमान और बाग़ी चल रहे शंकर सिंह वाघेला के बीच समझौते के चलते मोदी को गुजरात से बाहर किया गया था, उस वक़्त इस पद ने शाह को गुजरात पर नज़र रखने में मदद की थी.

अमित शाह का सुनहरा दौर

जब 2001 में मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया, तब शाह का सुनहरा दौर शुरू हुआ. खासकर तब, जब 2002 के गोधरा ट्रेन नरसंहार और पूरे प्रदेश में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी की धमाकेदार जीत हुई.

मोदी सरकार बनने पर शाह के पास करीब 10 पोर्टफ़ोलियो थे, जिनमें गृह, कानून और न्याय, जेल, सीमा सुरक्षा, हाउसिंग और संसदीय कार्य शामिल थे. शाह ने जल्द ही पार्टी की पहुंच राज्य के विशाल कोऑपरेटिव सेक्टर और खेल संस्थाओं तक बना दी. ख़ुद भी वह चुनाव में प्रभावशाली ढंग से जीतते रहे.

उन्होंने गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन का नियंत्रण कांग्रेस नेता नरहरी अमीन से लिया और मोदी को इस बॉडी का प्रेसिडेंट चुनवाया. 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने नरहरी को भी बीजेपी में शामिल करवा दिया.

शाह ने न सिर्फ़ राज्य के ज़्यादातर कोऑपरेटिव बैंकों को बीजेपी के पक्ष में करने जैसा काम किया बल्कि ज़िलों की मिल्क डेयरीज़ को पार्टी के करीब लाने में भी उनकी अहम भूमिका रही. इन सब बातों से बीजेपी (असल में मोदी) को उन इलाकों में पकड़ बनाने में मदद मिली, जहां से गुजरात के एक तिहाई मतदाताओं का वोट बेस आता है.

शाह को करीब से देखते रहे पार्टी के एक नेता, जो अपना नाम नहीं बताना चाहते, बताते हैं, "शाह बड़ी गहराई से काम करते हैं. जहां पर उन्हें सेंध लगानी होती है, वहां पूरी स्टडी करते हैं, कोई दरार तलाशते हैं और फिर हथौड़े की तरह वार करके उसे और चौड़ी कर देते हैं. इस तरह से वे विरोधियों को या तो ढहा देते हैं या फिर अपने पक्ष में कर लेते हैं.'

अगर उनकी सियासी तरक्की शानदार थी तो उनका गिरना और फिर गिरकर उठना भी वैसा ही था. सोहराबुद्दीन शेख़ फर्जी मुठभेड़ मामले में उनका नाम आया था और केंद्रीय जाँच ब्यूरो यानी सीबीआई ने उन्हें 2010 में गिरफ़्तार भी किया था. उन्हें तीन महीने जेल में भी बिताने पड़े.

हालाँकि उन्हें अक्टूबर 2010 में ज़मानत मिल गई थी, लेकिन कोर्ट ने उनके गुजरात में प्रवेश पर रोक लगा दी थी. केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद वह इस मामले से बरी हो गए. अदालत में उनके ख़िलाफ़ कई मामले सियासत में उनके चढ़ते ग्राफ़ में कभी भी आड़े नहीं आए.

2014 से पहले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद मोदी ने तत्कालीन पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह को अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी महामंत्री नियुक्त करने के लिए राजी किया. शाह ने अपनी नियुक्ति को सही साबित किया और उत्तर प्रदेश में भाजपा को 80 में से 71 लोकसभा सीटों पर जीत दिलाई.

मोदी के प्रधानमंत्री बनने और राजनाथ सिंह के कैबिनेट में शामिल होने के बाद शाह ने पार्टी प्रमुख का पद संभाला और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

मोदी के कट्टर वफ़ादार शाह और उनके संरक्षक मोदी की शख़्सियतें एकदम जुदा हैं. मोदी की वाकपटुता और उनकी राजनीतिक तड़क-भड़क जहाँ बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करती है, वहीं शाह चारदीवारी के भीतर सियासी चक्रव्यूह रचने में माहिर हैं.

वो सियासी भीड़ से दूर रहना पसंद करते हैं, अपने बॉस को समझते हैं और प्रधानमंत्री का सबसे विश्वसनीय और मज़बूत हाथ बनने के लिए अथक प्रयास करते हैं. उनकी ज़मीनी योजना और किसी भी चीज़ को विस्तार से जानने की जिज्ञासा के बेहतरीन परिणाम सामने आये हैं. चाहे वो पार्टी अध्यक्ष रहे या नहीं, शाह आने वाले लंबे समय तक नरेंद्र मोदी की योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा रहेंगे.

( ये लेखक के निजी विचार में हैं .)

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