आजकल कहां है महारानी पद्मिनी के वंशज?

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- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
उस दुनिया की अजेय क़िले महल और अभेद्य दीवारें अब भी मौजूद है जहाँ कभी मेवाड़ में गुहिल (सिसोदिया) राजवंश के राजा रत्न सिंह और महारानी पद्मिनी की सल्तनत थी.
अब उनकी विरासत और वंशज उस गुज़रे दौर की याद दिलाते रहते हैं. उनमें कोई उद्योग व्यापार में है, कोई नौकरी पेशा है और कोई कृषि व्यवसाय में है. मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के मुखिया महेंद्र सिंह मेवाड़ कहते हैं, "हाँ, मैं पद्मिनी का वंशज हूँ."
श्री मेवाड़ ने बीबीसी से कहा वे सिसोदिया राजवंश की 76 वीं पीढ़ी है. उदयपुर के महाराणा भगवत सिंह के 1984 में निधन के बाद बड़े बेटे के रूप में महेंद्र सिंह की ताजपोशी हुई है.
इतिहासकार कहते हैं चित्तौड़ पर लगातार हमलों के बाद मेवाड़ की राजधानी महाराणा उदय सिंह के वक्त चित्तौड़ से उदयपुर में स्थापित कर दी गई. इतिहासकारों के मुताबिक पद्मिनी के वंशज मेवाड़ और दूसरे स्थानों में फैले हुए हैं. इनमें उदयपुर का पूर्व राजघराना पद्मिनी का प्रत्यक्ष वंशज है.
चित्तौड़ में सरकारी कॉलेज के प्रिंसिपल रहे इतिहासकार प्रोफ़ेसर एस एन समदानी कहते हैं, "पद्मिनी के वंशजों में कोई अपना व्यापार करता है, कोई नौकरी पेशा है तो कोई खेती-बाड़ी करते हैं."
मुख्य परिवार तो मेवाड़ का राजघराना है. उनमें महेंद्र सिंह मेवाड़ को महाराणा की पदवी मिली ही हुई है. वे उदयपुर में समोर निवास में रहते हैं. उनके छोटे भाई अरविन्द सिंह मेवाड़ होटल व्यवसाय में है.

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प्रोफ़ेसर समदानी बताते हैं मेवाड़ में पद्मिनी के परिवार के काफ़ी लोग हैं. मेवाड़ में सिसोदिया राजपूत उनके परिवार के ही हैं. वे कहते हैं मेवाड़ में 16 बड़े ठिकाने, कोई बत्तीस छोटे ठिकाने और फिर दूसरे ठिकाने, इन सबके लोग पूरे मेवाड़ में फैले हुए हैं.
ये सब पद्मिनी के वंशज हैं. रियासत काल से ये लोग राजकाज में थे और उनके पास जागीरें थी. अब अपना अपना काम करते हैं.
उदयपुर में इंस्टिट्यूट ऑफ़ राजस्थान स्टडीज के पूर्व निदेशक प्रोफ देव कोठारी कहते है, "पद्मिनी सिसोदिया राजवंश की थी. यह भारत का सबसे पुराना राजवंश है. इनके लोग मेवाड़ के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी है."
प्रोफ़ेसर कोठारी कहते हैं यह 1300 साल से भी ज़्यादा पुराना राजवंश है. मेवाड़ से गए सिसोदिया वंश के लोगों ने कुछ राज्यों में अपने राज्य भी स्थापित किए थे.

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उदयपुर में मेवाड़ राजघराने में तत्कालीन महाराणा भगवत सिंह के निधन पर उत्तराधिकार को लेकर दोनों भाइयो में विवाद भी हुआ. प्रोफ़ेसर समदानी कहते हैं, "परंपरा और इतिहास के हिसाब से महेंद्र सिंह मेवाड़ ही महाराणा हैं क्योंकि वे स्व. भगवत सिंह के बड़े पुत्र हैं. यह पद्मिनी की ही विरासत है."
इतिहास विरासत, इमारत और स्मारकों के ज़रिए बोलता है. वंश भी एक जीवंत इतिहास है. मेवाड़ ऐसे ही इतिहास की एक बानगी है.












