गुजरात: 'पड़ोसी पूछते हैं, तुम मुस्लिम हो क्यों गरबा खेलती हो'

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इमेज कैप्शन, ज़ेबा (बीच में) अपनी सहेलियों के साथ
    • Author, समीना शेख
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गुजराती सेवा

नवरात्रि का त्योहार शुरू हो चुका है और गुजरात में हर तरफ़ गरबा की धूम है.

ये आम धारणा है कि ये त्योहार हिंदुओं का है और सिर्फ़ वो ही गरबा खेलते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. दूसरे धर्मों के लोग भी गरबा की मस्ती से अछूते नहीं है. और वो भी, ख़ासकर गुजरात में.

यहां कई ऐसे मुसलमान परिवार हैं जो हर साल गरबा में भाग लेते हैं. बीबीसी गुजराती सेवा ने कुछ ऐसी ही लड़कियों से नवरात्रि में उनके गरबा खेलने के अनुभव जानने की कोशिश की.

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अहमदाबाद के चांदखेड़ा में रहने वाली ज़ेबा हर साल गरबा खेलती हैं. वो बताती हैं कि उन्हें शुरू से ही गरबा के प्रति आकर्षण रहा है.

ज़ेबा कहती हैं, "मेरे पिता की नौकरी कालोल में होने के कारण हमें चांदखेड़ा में रहना पड़ता था, जहां पर मुस्लिमों की आबादी बहुत कम थी."

"उन्हें हिंदू बहुल इलाक़े में रहना थोड़ा अजीब लगता था, जिसकी वजह से वो लखनऊ चले गए. लेकिन मुझे अहमदाबाद भा गया था और मैंने यहीं रहने की ज़िद की और फिर यहीं रह गई."

"मुझे हिंदू रीति-रिवाज़ों की जानकारी है. मेरे दोस्तों में मैं अकेली मुसलमान लड़की हूं. इसके बावज़ूद मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मैं उनसे अलग हूं. मैं शुरू से गरबा के प्रति आकर्षण महसूस करती थी. इस बारे में मैंने अपने दोस्तों को बताया."

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जब ज़ेबा ने अपने मन की बात अपनी सहेलियों को बताई तो उन्हें थोड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन बाद में वो ज़ेबा की मदद करने को तैयार हो गईं.

वो कहती हैं, "बाद में उन्होंने मुझे गरबा खेलना सिखाया. सोशल मीडिया पर हिंदू-मुस्लिम विरोधी पोस्ट्स की भरमार है. यह कहीं न कहीं नई पीढ़ी को प्रभावित करती है."

"यही कारण है कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव कम हुआ है और दूरियां बढ़ी हैं. नई पीढ़ी को इस दूरी को मिटाना चाहिए."

ज़ेबा मानती हैं कि हम एक-दूसरे के त्योहारों में हिस्सा लें तो बीच की दूरियां कम की जा सकती हैं."

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इमेज कैप्शन, हेमा अपने परिवार के साथ

घर में मिनी इंडिया

हेमा तारफ मंधरा एक हिंदू लड़की हैं और उन्होंने एक मुसलमान युवक से शादी की है. शादी के बाद अब वो मुसलमान परिवार का हिस्सा हैं.

उनके घर में दोनों धर्मों के त्योहार मनाए जाते हैं. बीबीसी गुजराती के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि उनके घर में मिनी इंडिया बसता है.

वो कहती हैं, "हम सभी त्योहार मनाते हैं. चाहे वो ईद हो या दिवाली, नवरात्रि या मुहर्रम. कोई भी ऐसा साल नहीं रहा होगा जब मैंने गरबा न खेला हो. बस जब मैं गर्भवती थी, तब गरबा नहीं खेल पाई थी."

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हेमा के साथ-साथ अब उनकी देवरानी और जेठानी भी गरबा खेलने लगी हैं. वो बताती हैं कि शुरुआत में उनका परिवार इसका विरोध करता था पर समय के साथ सब कुछ बदल गया.

वो कहती हैं, "पांच सालों तक हम अपने परिवारों से अलग रहे. लेकिन अब मेरी देवरानी और जेठानी साथ में गरबा खेलती हैं. मैं भी उनकी तरह बिरयानी और शीर खुरमा बनाना सीख गई हूं."

हेमा कहती हैं कि जिन लोगों का आपके साथ भावनात्मक जुड़ाव होता है वो हर मुश्किल वक़्त में आपके साथ खड़े होते हैं.

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'जब बेटे ने पूछा हम हिंदू हैं या मुसलमान'

एक किस्सा याद करती हुई हेमा कहती हैं, "एक दिन मेरे बच्चे ने आकर मुझसे पूछा कि हम हिंदू हैं या मुसलमान. मैंने उसे जवाब दिया कि हम दोनों ही हैं."

"तुम्हें ये कहना चाहिए मैं पापा के साथ मस्जिद जाता हूं और मम्मी के साथ भगवान की पूजा करता हूं."

लेकिन जब समाज यह सवाल उठाता है तब क्या?

इस पर हेमा कहती हैं, "मैं सौराष्ट्र में रहती हूं जो गुजरात के सबसे शांत जगहों में से एक है. आज तक मुझे किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा है."

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'गरबा खेलने पर पड़ोसियों को ऐतराज़'

अहमदाबाद में रहने वाली बुशरा सैयद विज्ञान की छात्रा हैं और फ़िलहाल रिसर्च कर रही हैं. वो नवरात्रि के दौरान गरबा खेलना पसंद करती हैं.

अपना अनुभव साझा करते हुए वे कहती हैं, "गरबा खेलने की अनुमति लेने में पहले डर लगता था लेकिन अब अनुमति मिल जाती है. मैं कॉलेज में दोस्तों के साथ गरबा खेलने जाती थी."

"अब परिवार वाले मना नहीं करते हैं पर पड़ोसी आज भी सवाल करते हैं. वो तरह-तरह के सवाल पूछते हैं... तुम किस लिए गरबा खेलने जाती हो, हमें नहीं खेलना चाहिए गरबा."

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बुशरा को पहले पड़ोसियों के ये सवाल परेशान करते थे पर अब वो सहज होकर इनका जवाब देती हैं.

वो कहती हैं, "अब कोई पड़ोसी इस तरह का सवाल पूछता है तो मैं सहज होकर जवाब देती हूं कि मुझे गरबा खेलना पसंद है और मैं जा रही हूं."

बुशरा बताती हैं, "मैं अब तक सिर्फ़ तीन बार ही गरबा खेलने गई हूं लेकिन इस त्योहार के साथ मैं सालों से जुड़ी हुई हूं. मेरी हिंदू दोस्त त्योहारों के समय मुझसे नए ट्रेंड के कपड़े और गहने लेने आती थीं."

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