अमेरिका और रूस की तनातनी में कैसे संतुलन बनाएगा भारत

व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी

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    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों और प्राथमिकताओं के बीच भारत के लिए नए और पुराने दोस्तों में संतुलन बनाए रखना चुनौती बन गया है.

चीन से मिल रही चुनौती, व्यापार और अन्य मुद्दे भारत को अमेरिका के करीब ला रहे हैं तो रूस को भारत की पश्चिमी देशों से ये करीबी रास नहीं आ रही है.

भारत के ये नए और पुराने दोस्त यानी अमेरिका और रूस एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं. दोनों देश एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाते रहते हैं.

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में रूस के दखल के आरोपों को लेकर अक्सर रूस और अमेरिका के बीच तनानती की स्थिति रहती है.

अब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच वाक्युद्ध शुरू हो गया है.

जो बाइडन ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि वो पुतिन को “घातक” मानते हैं. साथ ही कहा था कि पुतिन को साल 2020 के अमेरिकी चुनाव में कथित गड़बड़ी के लिए 'कीमत चुकानी होगी.'

इसके जवाब में व्लादिमीर पुतिन ने रूसी टीवी पर अमेरिकी राष्ट्रपति को चुनौती दी कि वो उनसे लाइव प्रोग्राम में बात करें. उन्होंने रूसी स्कूलों में बोली जाने वाली एक तुकबंदी या कविता का इस्तेमाल किया जिसका मतलब है कि ''हम जैसे होते हैं, दूसरा भी हमें वैसा ही नज़र आता है.''

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रूस की आपत्तियां

इसी बीच अमेरिकी विदेश मंत्री लॉयड ऑस्टिन 19 मार्च यानी शुक्रवार से भारत दौरे पर हैं. उन्होंने आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की है.

इस दौरे पर क्वाडिलेट्रल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) पर बातचीत होने की संभावना है. चीन से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत ने क्वाड का गठन किया है.

लेकिन, क्वाड को लेकर रूस अपनी असहजता पहले ही जाहिर कर चुका है. उसने अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा को ख़तरे की आशंका भी ज़ाहिर की है.

रूस और भारत के बीच 20 सालों से होने वाला वार्षिक सम्मेलन पिछले साल नहीं हुआ. जिसके पीछे क्वाड को भी एक वजह माना जा रहा था. हालांकि, भारत और रूस ने इस सम्मेलन के ना होने के पीछे कोरोना महामारी को वजह बताया है.

8 दिसंबर को सरकारी थिंक टैंक रशियन इंटरनेशनल अफ़ेयर्स काउंसिल को वीडियो कॉन्फ़्रेसिंग से संबोधित करते हुए रूसी विदेश मंत्री ने कहा था कि पश्चिमी देश भारत के साथ उसके क़रीबी रिश्तों को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे हैं.

वहीं, पाकिस्तान के साथ रूस के सैन्य अभ्यास ने भी भारत को असहज किया है.

व्लादिमीर पुतिन और जो बाइडन

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भारत पर अमेरिकी दबाव

रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की खरीदारी पर अमेरिका की तिरछी नज़रें रही हैं. हाल ही में आई अमेरिकी कांग्रेस की "कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस" की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि "रूस में बने एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम ख़रीदने के भारत के अरबों डॉलर के सौदे के कारण अमेरिका 'काउंटरिंग अमेरिकाज एडवरसरीज़ थ्रू सैंक्शन्स एक्ट' यानी (CAATSA) के तहत भारत पर पाबंदियां भी लगा सकता है."

हालांकि, अमेरिका के निवर्तमान राजदूत जस्टर ने इस बात पर भी ज़ोर देते हुए कहा, "हम CAATSA के तहत दोस्तों पर कार्रवाई नहीं करते."

हथियारों की खरीद के लिए भारत अमेरिका के लिए एक बड़ा बाज़ार है वहीं, भारत की हथियार खरीद का सबसे ज़्यादा 56 प्रतिशत हिस्सा रूस से आता है. यहां भी भारत में रूस अमेरिका के लिए एक चुनौती बना हुआ है.

भारत के लिए अमेरिका और रूस दोनों अहम देश हैं. लेकिन, चीन से मिल रही चुनौती और रूस व अमेरिका की तनातनी के बीच भारत के लिए इस डगर पर संतुलन बनाना कितना मुश्किल है.

व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग

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चीन एक बड़ा फैक्टर

दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में डायरेक्टर और किंग्स कॉलेज, लंदन में इंटरनेशनल रिलेशन के प्रोफ़ेसर रहे डॉक्टर हर्ष वी पंत कहते हैं कि भारत दोनों देशों के बीच हमेशा से संतुलन बनाता आया है लेकिन आगे रिश्तों में और खिंचाव आने की आशंका है.

हर्ष पंत बताते हैं, “बदलते परिदृश्य में रूस, अमेरिका और भारत तीनों की विदेश नीतियां और प्राथमिकताएं बदल गई हैं. रूस अब वो रूस नहीं है जो शीत युद्ध के दौरान हुआ करता था. उसके लिए ज़रूरी है कि कोई ऐसा देश हो जो उसके साथ खड़ा हो. वहीं, पश्चिमी देशों का दबाव महसूस होने पर रूस ने पश्चिम विरोधी नीति अपनाई जिसमें उसे चीन अपना सहोयगी नज़र आता है.

“चीन के साथ भारत के टकराव के चलते यहां पर भारत और रूस के हित बंट जाते हैं. चीन और भारत के बीच लंबे समय से सीमा विवाद चल रहा है. दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं. चीन और पाकिस्तान की नज़दीकी भारत के लिए चुनौती बनी हुई है. ऐसे में अमेरिका भारत के लिए एक सहयोगी देश बनकर सामने आया है. चीन को लेकर दोनों देशों के हित एक जगह मिल जाते हैं. ऐसे में भारत के रूस और अमेरिका से संबंधों में चीन एक बड़ा फैक्टर बना हुआ है.”

भारत की मुश्किल यही है कि उसे रूस और अमेरिका दोनों को एक साथ लेकर चलना है. भारत रूस के ज़रिए अमेरिका की सुपरवार की स्थिति को भी चुनौती देता है. ब्रिक्स इसका एक उदाहरण है जिसमें रूस, चीन और भारत तीनों शामिल हैं. ये देश बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात करते हैं.

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मल्टी अलाइंमेंट की ज़रूरत

भारत और रूस के बीच विश्वास और मजबूत संबंधों का लंबा इतिहास रहा है. वो एक ऐसा बड़ा देश है जिसके साथ भारत के कोई बड़े मतभेद नहीं हैं. रूस भारत को हथियार बेचने वाला एक प्रमुख देश है और ये स्थिति शीत युद्ध के दौर से बनी हुई है.

रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, अंतरिक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक क्षेत्रों में रूस की क्षमता तथा अनुभव भारत के लिये मददगार रहे हैं. ब्रह्मोस मिसाइल, M-46 बंदूक का उन्नयन रक्षा क्षेत्र में भारत-रूस के मज़बूत संबंधों के प्रमुख उदाहरण हैं.

वहीं, अमेरिका के साथ भारत के संबंध कई स्तरों पर हैं. दोनों देशों के बीच आर्थिक, व्यापारिक, प्रोद्यौगिकी, प्रवासी, ऊर्जा, रक्षा और रणीतिक भागीदारी है. देश की सुरक्षा की बात करें तो इस समय अमेरिका चीन और पाकिस्तान के मामले पर भारत के साथ खड़ा है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफेसर संजय के भारद्वाज कहते हैं कि भारत इनमें से किसी एक देश को चुन नहीं सकता है. ये भी ठीक नहीं कि अमेरिका से सहयोग के चलते रूस भारत का विरोधी और चीन का सहयोगी हो जाए. ना ही ये ठीक है कि भारत चीन का सामना करने में अमेरिकी सहयोग को नकार दे. ऐसे में भारत मल्टी अलाइंमेंट का तरीक़ा अपना रहा है.

वह बताते हैं, “भारत अब मल्टी अलाइंमेंट की नीति अपना रहा है यानी सभी पक्षों के साथ किसी ना किसी तरह का संबंध. किसी के साथ आर्थिक, किसी के साथ रणीनितक तो किसी के साथ राजनीतिक साझेदारी. अमेरिका और रूस के साथ भी उसे यही रणनीति अपनानी होगी. भारत को अपने हितों को लेकर बहुत सावधान रहना होगा.”

वीडियो कैप्शन, इन चार देशों की बैठक से चीन को टेंशन क्यों?

दोतरफा ज़रूरतें

लेकिन, जानकार ये भी मानते हैं कि रूस और अमेरिका से भारत के संबंध सिर्फ़ एकतरफ़ा नहीं हो सकते. सभी पक्षों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं.

हर्ष पंत कहते हैं, “अंतरराष्ट्रीय संबंध अपने हितों के आधार पर होते हैं और ये बदलते रहते हैं. ये शीत युद्ध वाला दौर नहीं है. उस समय रूस और चीन भी अलग-अलग खेमें में हुआ करते थे लेकिन अब दोनों साथ नज़र आ रहे हैं. इसी तरह भारत के साझेदार भी बदल रहे हैं. केवल भारत को ही अमेरिका की ज़रूरत नहीं बल्कि रूस और अमेरिका को भी भारत की ज़रूरत है.”

संजय भारद्वाज कहते हैं कि रूस भारत को एक रक्षा बाज़ार के तौर पर देखता है. वो अमेरिका के ख़िलाफ़ स्थितियां बनाने में भी भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी मानता है क्योंकि भारत भी एक उभरती हुई ताकत है. वह अपने यहां भारत का निवेश भी चाहता है. कोरोना वैक्सीन स्पुतनिक के उत्पादन में भी भारत और रूस के बीच सहयोग देखने को मिला है.

अमेरिका की बात करें तो उसने साल 2000 के बाद से भारत के लिए अपनी विदेश नीति में बदलाव किया है. उसे भारत में एक बड़ा बाज़ार और एक रणनीतिक सहयोगी नज़र आता है. ये हम पाकिस्तान को लेकर अमेरिका के बदलते रुख से भी समझ सकते हैं. 2005 में भारत से परमाणु समझौता भी हुआ जिसके लिए अमेरिका ने संविधान संशोधन तक किया. वह भारत को प्राथमिकता देने लगा.

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अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, आतंकवाद और व्यापार के मसले पर भारत के सहयोग की ज़रूरत है. यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन हो या बाइडन प्रशासन, भारत के प्रति अमेरिका के रुख में बदलाव नहीं आया है. डेमोक्रेटिक पार्टी एक धड़ा भले ही भारत के अंदरूनी मसलों को उठाता रहा है लेकिन राष्ट्रपति बाइडन ने अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है.

ऐसे में भारत के लिए रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बनाए रखना जिस तरह एक चुनौती है उसी तरह रूस और अमेरिका भी भारत को एक सहयोगी के तौर पर खोना नहीं चाहेंगे. इसलिए देखना है कि बदलती प्राथमिकताओं में ये देश कैसे सामंजस्य बैठा पाते हैं.

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