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योगी आदित्यनाथ ने नितिन अग्रवाल के बहाने दिखाई ताक़त ?
- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
उत्तर प्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले हर राजनीतिक दल अपने-अपने वोट बैंक को बढ़ाने की कोशिशों में जुटा है.
इसी सिलसिले में राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को वैश्य समुदाय को अपने साथ लाने की कोशिश करते हुए ऐसा राजनीतिक दांव खेला है, जिससे वो यह साबित कर सकें कि प्रदेश की राजनीति में अब भी उनका दबदबा क़ायम है.
दरअसल, राज्य सरकार ने एक दिन का सत्र बुला कर 14 साल बाद विधान सभा के उपाध्यक्ष का चुनाव करवाया.
योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सपा के बाग़ी नेता नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल को विधानसभा उपाध्यक्ष के लिए अपना उम्मीदवार बनाकर सबको चौंका दिया.
योगी आदित्यनाथ ने इसे परंपरा से भी जोड़ते हुए कहा कि वे विपक्ष के विधानसभा सदस्य को विधानसभा का उपाध्यक्ष पद दे रहे हैं हालांकि, इस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपना उम्मीदवार खड़ा किया था.
भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता नवीन श्रीवास्तव कहते हैं, "समाजवादी पार्टी लोकतांत्रिक परंपरा की दुहाई दे रही है, 2012 से 2017 तक उनकी सरकार रही लेकिन उन्होंने उपाध्यक्ष किसी को नहीं बनाया. इस बार भी उन्होंने इसको लेकर कोई प्रस्ताव नहीं दिया. हमारी पार्टी चाहती थी कि विपक्ष का ही उपाध्यक्ष हो और साढ़े चार साल बाद जब पार्टी ने देखा कि मुख्य विपक्षी दल किसी के नाम का प्रस्ताव नहीं कर रहा है तो भाजपा ने उपाध्यक्ष का चुनाव करवाने का फ़ैसला लिया. नितिन अग्रवाल आज भी आधिकारिक रूप से सपा के सदस्य हैं. हमारी सरकार ने नितिन अग्रवाल को उपाध्यक्ष बनवा कर लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान किया है."
नितिन अग्रवाल प्रदेश के बड़े वैश्य नेता नरेश अग्रवाल के बेटे हैं. नरेश अग्रवाल हरदोई से सात बार विधायक रह चुके हैं और अब तक वो सपा, बसपा और कांग्रेस, तीनों को आज़मा चुके हैं. मार्च 2018 में उन्होंने सपा से राज्यसभा न भेजे जाने से नाराज़ होकर भाजपा का दामन थामा था. अब नितिन अग्रवाल भी अपने पिता नरेश अग्रवाल के दिखाए हुए रास्ते पर निकल पड़े हैं.
दिलचस्प यह है कि 40 साल के नितिन अग्रवाल समाजवादी पार्टी से 2018 में अलग हो चुके हैं लेकिन तकनीकी तौर पर वो अब भी सपा के विधायक हैं. अखिलेश यादव ने भी अब तक उनकी सदस्यता रद्द करने की कोई औपचारिक माँग नहीं की है.
कैसे हुआ उपाध्यक्ष का चुनाव
सोमवार को विधानसभा में हुए इस चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार की जीत पहले से ही सुनिश्चित थी. समाजवादी पार्टी ने सीतापुर के विधायक नरेंद्र सिंह वर्मा को चुनाव में ज़रूर उतारा लेकिन वे मुक़ाबले में कहीं नहीं थे. उम्मीद के मुताबिक़ ही विधानसभा के स्पीकर हृदय नारायण दीक्षित ने 304 मतों के साथ नितिन अग्रवाल की जीत की घोषणा कर दी.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष पर तंज़ कसते हुए कहा, "मुझे लगता है कि 2022 की विधानसभा की तस्वीर भी सामने आ चुकी है."
403 विधायकों वाली विधानसभा में मौजूदा विधायकों की संख्या 396 है. लेकिन चुनाव में कुल 368 मत पड़े जिनमें चार मत ख़ारिज किए गए. 364 मतों में नितिन अग्रवाल को 304 मत मिले जबकि सपा उम्मीदवार को 60.
इस सीधे दिखने वाले चुनावी परिणाम से भी कई सवाल उठ रहे हैं. पहला तो यही है कि 396 विधायकों में से 368 वोट ही क्यों पड़े, 28 विधायकों ने वोट नहीं डाला. इस चुनाव का कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी ने बहिष्कार किया था. कांग्रेस के सात और बसपा के 19 विधायक हैं.
दूसरा अहम सवाल यह है कि सदन में सपा के 46 विधायक ही हैं, ऐसे में नरेंद्र वर्मा को 60 विधायकों का समर्थन कैसे मिला.
बसपा के विधायक हाकिम लाल बिंद कहते हैं, "बसपा के आठ बाग़ी विधायकों ने सपा उम्मीदवार नरेंद्र सिंह वर्मा को वोट दिया है."
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर ने भी बीबीसी से कहा कि उनके तीन विधायकों ने सपा उम्मीदवार को वोट दिया है.
क्या यह चुनाव भाजपा का शक्तिप्रदर्शन था?
2022 के चुनाव से पहले भाजपा हर तरह के जातीय समीकरण बैठाने की कोशिश में जुटी हुई है.
सितंबर में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में जातिगत आधार पर मंत्री बनाए गए और सोमवार को नितिन अग्रवाल को उपाध्यक्ष बनाया गया है.
वैश्य समुदाय परंपरागत तौर पर बीजेपी का मतदाता रहा है. ऐसे में इस समुदाय को क्या संदेश दिया गया है, इस सवाल पर वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं, "एक अग्रवाल नेता को इस तरह से सम्मानित करके भाजपा ने संदेश देने की कोशिश की है कि वो वैश्य समाज के हितों का भी ध्यान रख रहे हैं."
वहीं दूसरी ओर, वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी इस चुनाव को महज़ एक पॉलिटिकल गीमिक यानी नौटंकी बताते हुए कहते हैं, "उपाध्यक्ष का कोई मतलब नहीं है क्योंकि हाउस तो चलना नहीं है. यह नितिन अग्रवाल को सिर्फ़ एक पद देने के समान है, एक लालबत्ती देने के सामान है, ताकि उनके ख़िलाफ़ दल बदल क़ानून के तहत कार्रवाई न हो सके. इससे ज़्यादा इसका कोई बहुत मतलब नहीं है."
क्या कह रहे हैं हार-जीत के आंकड़े?
सपा के सिर्फ़ 46 विधायक हैं लेकिन उसके उमीदवार नरेंद्र सिंह वर्मा को 60 वोट मिले. मतलब उन्हें उम्मीद से 14 वोट ज़्यादा मिले. वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं, "304 वोट मिलने के बावजूद भाजपा जहाँ थी, वहीं खड़ी है. समाजवादी पार्टी जहाँ खड़ी थी उससे थोड़ा आगे बढ़ी है. इसका मतलब है कि समाजवादी पार्टी कुछ दूसरी पार्टियों के विधायकों का समर्थन हासिल करने में कामयाब हुई है."
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफ़ीज़ गांधी इन आंकड़ों को सपा के उठते ग्राफ़ का एक उदाहरण मानते हैं. वह कहते हैं, "पार्टी ने एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के तहत अपना प्रत्याशी खड़ा किया. हमको हमारी संख्या से अधिक मत प्राप्त हुए. यह दिखाता है कि हमारी पार्टी के अलावा भी कुछ विधायक ऐसे हैं जिन्होंने हमारे प्रत्याशी का समर्थन किया. इससे आने वाले 2022 के चुनाव का रुझान भी पता चलता है. लोग समाजवादी पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता में आते हुए देख रहे हैं. ज़िला पंचायत के चुनावों में भी समाजवादी पार्टी पहले नंबर पर रही."
वैसे इस चुनाव से यह भी ज़ाहिर हुआ है कि बीजेपी के विधायकों में एकजुटता है. बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता नवीन श्रीवास्तव के मुताबिक़ पार्टी को अपेक्षित वोट मिले हैं. उनका कहना है, "वोटिंग में 28 विधायक अनुपस्थित रहे तो कुछ कारण होंगे, वे कौन-से विधायक हैं और किसने कहां क्रॉस वोटिंग की है, ये तो बाद में पता चल जाएगा लेकिन हमारे विधायकों ने हमारे उम्मीदवार को वोट दिया है, यह स्पष्ट है."
क्या यह चुनाव आने वाले राजनीतिक भविष्य के बारे में कुछ कह रहा है? राजनीतिक पत्रकार रतन मणि लाल कहते हैं, "इसका वोटिंग पैटर्न पर शायद बहुत असर न हो लेकिन उम्मीदवारों के चयन पर शायद इसका असर पड़े. वैसे भी भाजपा को सतर्क होने की ज़रुरत है कि उनके पक्ष में जितने विधायक हैं उनकी वफ़ादारी उनके प्रति चुनाव तक कितनी रहेगी."
इस चुनाव नतीजों ने यह भी ज़ाहिर किया है कि चुनाव नज़दीक आते ही भाजपा प्रदेश के स्थानीय नेताओं को अहमियत देने की पूरी कोशिश कर रही है ताकि सभी वर्गों और बिरादरियों का वोट पार्टी को मिल सके.
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी का कहना है, "एक नया ट्रेंड यह है कि स्थानीय नेता का भी अपना एक क्षेत्र है. हर सीट पर पार्टी और स्थानीय नेता के साथ एक कॉम्बिनेशन बनता है. इसलिए स्थानीय नेता काफ़ी प्रभावशाली हो गए हैं. आप इसे ऐसे समझिए कि बनारस में पीएम नरेंद्र मोदी के सांसद होने के बावजूद अनुप्रिया पटेल की अपना दल को भाजपा साथ में रख रही है."
नितिन अग्रवाल के विधानसभा उपाध्यक्ष बनने का बहुत महत्व नहीं दिखता है, लेकिन सांकेतिक राजनीतिक के नज़रिए से बीजेपी यह दावा ज़रूर कर रही है कि उसने विपक्ष के एक युवा विधायक को उत्तर प्रदेश विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाने का इतिहास रचा है.
वहीं, समाजवादी पार्टी अपने विधायकों से ज़्यादा समर्थन हासिल कर यह यह दिखा रही है कि सपा ही बीजेपी को चुनौती देने में सक्षम है.
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