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शांति देवी ने सोचा भी न था कि 38 साल पहले लापता हुए पति का इंतज़ार ऐसे ख़त्म होगा
- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, हल्द्वानी से बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
"मम्मी, पापा कब आएंगे?"
जब उत्तराखंड के रहने वाले लांस नायक चंद्रशेखर की बेटियां बचपन में अपनी मां से ये सवाल करती थीं तो उनकी मां शांति देवी बड़े भरोसे और आत्मविश्वास के साथ कहती थीं कि 'पापा 15 अगस्त को आएंगे और उनके लिए बहुत सारी चीज़ें लाएंगे.'
लेकिन हर बीतते साल के साथ शांति देवी भी जानती थीं कि वो अपनी बेटियों को तसल्ली दे रही हैं. मन में बेचैनी थी, अशांति थी क्योंकि सेना की वर्दी पहन कर सीमा पर भारत की रक्षा का प्रण लेने वाले उनके पति चंद्रशेखर हरबोला अप्रैल, 1984 में सीमा पर गश्त लगाने के दौरान लापता हो गए थे.
खोज ख़बर के नाम पर परिवार को केवल चंद्रशेखर हरबोला के मिसिंग होने की जानकारी दी गई थी.
हालांकि शांति देवी को हमेशा एक उम्मीद रही कि उनके पति जिंदा हैं, शायद वे पाकिस्तान सेना के क़ब्जे़ में हों. दो छोटी-छोटी बेटियों को साथ लेकर अपने सैनिक पति के लौटने का इंतज़ार करते हुए उन्होंने अकेले ही संघर्ष भरा सफ़र शुरू करने का फ़ैसला किया.
उत्तराखंड के हल्द्वानी में रहने वाली शांति देवी ने अपनी बेटियों को बेहतर परवरिश देने की हर संभव कोशिश की. उन्होंने राज्य के स्वास्थ्य विभाग में पहले नर्सिंग की ट्रेनिंग ली और बाद में बागेश्वर ज़िले में नर्स की नौकरी की.
ज़िंदगी धीरे-धीरे पटरी पर ज़रूर लौटने लगी, लेकिन शांति देवी की नज़र हर उगते सूरज और ढलती शाम के साथ पति के लौटने की उस डगर पर टिकी रहती थी जहां से वे छुट्टियों पर घर लौटते थे.
अपने संघर्ष की दास्तान सुनाते हुए भरे गले और नम आंखों से पति की तस्वीर निहारती शांति देवी कहती हैं, "मैं अपने बच्चों को ये तसल्ली ज़रूर देती थी कि उनके पिता एक दिन ज़रूर लौट कर आएंगे."
बातों बातों में वो पुराने दिनों की ओर लौट जाती हैं और बताती हैं कि कैसे वे अपने बच्चों के साथ उनके पिता की खोजबीन और उनके लापता होने की ख़बर को साझा करती थीं.
मैं अपने बच्चों से कहती थी, "शायद उन्हें कै़दी बना लिया गया होगा. हो सकता है उन्हें पाकिस्तानियों ने पकड़ लिया हो. ऐसे कई ख़्याल आते रहते थे."
लेकिन शांति देवी को क्या पता था कि जब देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा होगा, उस वक़्त तक पति के लौटने की उम्मीद में 38 बरस का लंबा अरसा गुज़र चुका होगा.
इस दौरान ख़ुद शांति देवी रिटायर हो गईं, आठ साल की बेटी कविता अब 46 साल की उम्र में अपना परिवार संभाल रही है, जबकि चार साल की बबीता भी अब 42 साल की हो चुकी है.
लापता होने के 38 साल बाद परिवार को मिला शव
38 साल बाद पूरे परिवार को अचानक चंद्रशेखर हरबोला के मिलने की ख़बर मिली. इस ख़बर ने सबको सदमे में डाल दिया. शांति देवी को उम्मीद थी कि उनके पति एक दिन घर लौटेंगे जबकि ख़बर उनके शव मिलने की आई.
बीते चार पांच दिनों से पूरा परिवार रह-रह कर सदमे में लौट जाता है. मां और बेटियां रोते-रोते बेहोश हो जा रही हैं.
38 साल बाद 17 अगस्त, 2022 को जब लांस नायक चंद्रशेखर अपने आवास पर लौटे तो वो अपनी पत्नी और परिवार से बात नहीं कर सकते थे. वो तिरंगे में लिपटे हुए थे.
रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों का हुजूम उनके घर पर मौजूद था. वहाँ चारों तरफ़ गूँज रहा था "लांस नायक चंद्रशेखर हरबोला अमर रहें."
आम लोगों के बीच हल्द्वानी के इस सैनिक को श्रद्धांजलि देने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी पहुंचे. उन्होंने 1984 में सियाचिन में ऑपरेशन मेघदूत के दौरान मारे गए लांस नायक चंद्रशेखर हरबोला के पार्थिव शरीर पर पुष्प चक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी.
मुख्यमंत्री धामी ने कहा, "शहीद चंद्रशेखर जी के बलिदान को हमेशा याद रखा जायेगा. देश के लिए बलिदान देने वाले उत्तराखंड के सैनिकों की स्मृति में सैन्य धाम की स्थापना की जा रही है. शहीद चंद्रशेखर की स्मृतियों को भी सैन्य धाम में संजोया जाएगा."
पुष्प चक्र अर्पित करने के बाद लांस नायक चंद्रशेखर का पार्थिव शरीर चित्रशिला घाट रानीबाग के लिए रवाना हुआ, जहां उन्हें पूरे राजकीय सम्मान व आर्मी बैंड की धुन के साथ भावभीनी विदाई दी गई.
इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में लोगों ने नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि दी.
कौन थे लांस नायक चंद्रशेखर
लांस नायक चंद्रशेखर हरबोला मूल रूप से अल्मोड़ा ज़िले के द्वाराहाट के हाथीगुर बिंता के रहने वाले थे. ऑपरेशन मेघदूत के दौरान सियाचिन में बर्फीले तूफान में जब वे लापता हो गए थे तब उनकी उम्र केवल 28 साल थी. उनकी पत्नी शांति देवी तब दो बेटियों की मां बन चुकी थीं और 26 साल की थीं.
13 अप्रैल 1984 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत लाँच किया था. लांस नायक हरबोला ऑपरेशन मेघदूत टीम का हिस्सा थे जो पॉइंट 5965 पर क़ब्ज़ा करने निकले थे, लेकिन बर्फ़ीले तूफ़ान की चपेट में आने से 19 सदस्यों का ये गश्ती दल लापता हो गया था.
सर्च टीम महज़ 14 शवों को ही खोज पाई थी. पांच जवानों का पता नहीं चल पाया था. इन्हीं पाँच जवानों में 19 कुमाऊँ रेजिमेंट के जवान चंद्रशेखर हरबोला भी शामिल थे.
उनके मिसिंग होने की ख़बर चंद्रशेखर के घर पहुँचा दी गई थी. सेना की खोज जारी रही. साल दर साल बीतते गए, परिवार का इंतज़ार भी बना रहा और अब 38 साल बाद उनका शव बरामद हुआ.
कैसे हुई शव की पहचान
लांस नायक चंद्रशेखर हरबोला के शव की शिनाख़्त उनके डिस्क नंबर से हुई. चंद्रशेखर के शव के साथ सेना के कुछ अधिकारी भी थे. इनमें से एक ने पहचान ज़ाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, "हम लोग खोए हुए जवानों की तलाश करते रहते हैं और इन गर्मियों में सियाचिन ग्लेशियर की बर्फ़ पिघलनी शुरू हुई तो खोए हुए जवानों की तलाश शुरू की गई.
इसी दौरान 13 अगस्त, 2022 को एक सैनिक का शव ग्लेशियर पर बने पुराने बंकर में मिला. शव की पहचान सैनिकों को सेना की तरफ़ से मिले आइडेंटिटी डिस्क नंबर 4164584 से की गई."
इस डिस्क नंबर का मिलान करने के बाद ही पता चला कि यह शव उत्तराखंड के रहने वाले लांस नायक चंद्रशेखर हरबोला का है.
चंद्रशेखर हरबोला के भतीजे हरीश चंद्र हरबोला ने बताया, "13 अगस्त की रात को हमें ख़बर मिली. भर्ती के वक़्त उन्हें जो आइडेंटिटी डिस्क मिलती है उसके आधार पर परिवार से सम्पर्क किया गया. उसी से पता चला कि वो हमारे ताऊ ही हैं."
चंद्रशेखर हरबोला के नहीं रहने पर उनका परिवार सदमे में तो है मगर उन्हें गर्व इस बात का है कि उन्होंने अपनी जान देश के लिए क़ुर्बान कर दी.
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