मोरबी ब्रिज हादसा: ओरेवा ग्रुप के मालिक जयसुख पटेल की कहानी

    • Author, जय शुक्ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गुजरात के मोरबी में रविवार को मच्छु नदी पर बने सस्पेंशन ब्रिज के गिरने से 135 लोगों की मौत हो गई.

पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज कर पुल हादसे में अब तक कुल नौ लोगों को गिरफ़्तार किया है. अभियुक्तों में ओरवा कंपनी के दो मैनेजर भी शामिल हैं.

एफ़आईआर में पुल के रखरखाव और प्रबंधन में शामिल व्यक्तियों या एजेंसियों पर अपना काम लापरवाही से करने का आरोप है.

इसके साथ यह भी आरोप है कि पुल के रखरखाव में लापरवाही के चलते पर्यटकों की मौत हुई और सस्पेंशन ब्रिज पर आने वाले पर्यटकों को नुक़सान पहुंच सकता है, इसकी जानकारी होने का भी आरोप लगा है.

पुल की देखरेख का लाइसेंस ओरेवा कंपनी को मिला हुआ था जिसके दो मैनेजरों को गिरफ़्तार किया गया है. वहीं मरम्मत के बाद पुल को फिर से अपने परिवार के साथ शुरू करने वाले ओरेवा कंपनी के मालिक जयसुख ओधावजी पटेल का नाम भी चर्चा में है.

मोरबी नगर पालिका के चीफ़ ऑफिसर संदीप सिंह झाला ने आरोप लगाया है कि, "इस ब्रिज का उद्घाटन नगर पालिका को जानकारी दिए बिना किया गया था, इस वजह से इसका सेफ़्टी ऑडिट नहीं कर पाए."

कौन हैं जयसुख पटेल?

जयसुख पटेल के पिता ओधावजी पटेल भारत में दीवार घड़ियों के जनक माने जाते हैं. उन्होंने साल 1971 में तीन हिस्सेदारों के साथ एक लाख रुपये से ओरेवा ग्रुप की शुरुआत की थी.

उस समय इस कंपनी का नाम 'अजंता ट्रांज़िस्टर क्लॉक मैन्युफै़क्चरर' था और कंपनी में जयसुख पटेल के पिता की हिस्सेदारी महज़ 15 हज़ार रुपये की थी.

हालाकि, बाद में अजंता की दीवार घड़ियाँ भारत में लोकप्रिय हो गईं और साल 1981 में तीनों हिस्सेदारों ने कंपनी का बंटवारा कर लिया. इसके बाद ओधावजी के नाम पर 'अजंता कंपनी' का नाम रखा गया.

इस दशक में ओधावजी ने 'क्वार्ट्ज़ क्लॉक' बनानी शुरू की, जिसकी वजह से अजंता दुनिया की सबसे बड़ी घड़ी निर्माता बन गई. इतना ही नहीं भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने अजंता ग्रुप को लगातार 12 सालों तक उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स श्रेणी के सर्वोच्च निर्यातक पुरस्कार से सम्मानित किया.

कंपनी का कारोबार 45 देशों में फैला है. अक्टूबर 2012 में ओधावजी पटेल की मौत के बाद, अजंता कंपनी ओधावजी के बेटों के बीच बंट गई. जयसुख पटेल को जो कंपनी इस बंटवारे में मिली उन्होंने उसका नाम ओरेवा में बदल दिया.

ओरेवा नाम कैसे पड़ा?

साल 1983 में कॉमर्स से ग्रैजुएशन करने के बाद जयसुख पटेल अपने पिता के साथ उनकी कंपनी में काम करने लगे.

राजकोट के एक वरिष्ठ पत्रकार सुरेश पारेख कहते हैं, "जयसुख पटेल ने अपनी कंपनी का नाम रखने के लिए पिता ओधावजी के नाम से 'ओ' और मां के नाम से 'रेवा' लिया और इसे मिलाकर कंपनी का नाम ओरेवा रखा.

अहमदाबाद स्थित ओरेवा ग्रुप अपनी मूल कंपनी अजंता मैन्युफै़क्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड के नाम से लाइटिंग प्रोडक्ट, बैटरी से चलने वाली बाइक, घरेलू उपकरण, बिजली का सामान, टेलीफ़ोन, कैलकुलेटर, एलईडी टीवी और दूसरे कई प्रोडक्ट बनाने का काम करती है.

ओरेवा देश भर में 55 हज़ार चैनल पार्टनर्स के ज़रिए अपने उत्पाद बेचने का काम करती है. कंपनी ने एक किफ़ायती ई-बाइक भी लॉन्च की है. इसके अलावा कंपनी सस्ती टाइल्स, कलाई घड़ी और मोबाइल बनाने का काम भी करती है.

कंपनी, देश के सबसे बड़े प्लांट्स में से एक को चलाने का काम करती है. ये प्लांट गुजरात में कच्छ के सामखीयाली में है जो 200 एकड़ में फैला हुआ है.

लाइटिंग सेगमेंट में क़दम रखते हुए कंपनी ने एलईडी लाइटिंग में तेज़ी से प्रोडक्ट बनाए और कभी दीवार घड़ी के सेक्टर में एक प्रमुख नाम होने के बाद कंपनी ने डिजिटल क्लॉक सेक्टर में भी शुरुआत की.

साल 1980 में अजंता कंपनी में महिलाएं भी काम करने लगी थीं. उस समय 12 महिलाएं काम करती थीं.

आज चार दशक बाद इसकी संख्या बढ़कर पांच हज़ार से ज़्यादा हो गई है. आज के समय में ओरेवा ग्रुप में सात हज़ार कर्मचारी काम करते हैं, जिसमें पांच हज़ार से ज़्यादा महिलाएं हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सुरेश पारेख के मुताबिक़ कंपनी महिला कर्मचारियों की शादी में होने वाले खर्च को उठाने का काम भी करती है.

जयसुख पटेल का मानना था कि चीन जिस तरह से सस्ते माल बना रहा था उससे लड़ने के लिए भारत की सरकारी नीतियों में बदलाव जरूरी था. वह अक्सर सार्वजनिक रूप से कहते थे कि, "बड़ी कंपनियों के मालिक उन्हें कबड्डी कहते हैं लेकिन मुझे परवाह नहीं है. मैं अपने ग्राहकों को सस्ता और अच्छी क्वालिटी का सामान देने के लिए प्रतिबद्ध हूं."

ओरेवा ग्रुप की 8 कंपनियां काम कर रही हैं

जयसुख पटेल का राजनीतिक जुड़ाव

ओरेवा ग्रुप की वेबसाइट के मुताबिक़ उन्होंने गुजरात में चेक डैम के लिए दो करोड़ रुपये की सहायता की है जिससे सरकार की वाटरशेड योजना के तहत 21 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई की सुविधा मिली है.

बीबीसी के सहयोगी बिपिन टंकरिया कहते हैं, "जयसुख पटेल के पिता ओधावजी भाई भी पटेल समुदाय में काफ़ी दबदबा रखते थे."

जयसुख पटेल की लिखी किताब 'रण सरोवर' में बताया गया है कि कंपनी ने मोरबी और कच्छ में कंपनी परिसर में एक लाख से ज्यादा पेड़ लगाए हैं. ओरेवा ग्रुप को पर्यावरण को बचाने के लिए साल 2007 में इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार भी मिला है.

जयसुख पटेल के राजनीतिक संपर्क गुजरात में बीजेपी और कांग्रेस दोनों से रहे हैं.

मोरबी में बीबीसी संवाददाता राजेश अंबालिया के मुताबिक़, उनके पिता और ख़ुद जयसुखभाई कुछ हद तक बीजेपी के करी़ब थे. इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि गुजरात में बीजेपी लंबे समय से सत्ता में है. बावजूद इसके उनके कार्यक्रमों में बीजेपी और कांग्रेस, दोनों पार्टियों के नेता आते थे.

उनकी कंपनी की वेबसाइट पर कई बीजेपी नेताओं के साथ उनकी तस्वीर है, जो इस तरफ़ इशारा करती है कि वे बीजेपी के क़रीबी हैं.

रण सरोवर परियोजना और विवाद

जयसुख पटेल ने कच्छ के छोटे से रेगिस्तान में पानी की झील बनाने के लिए 'रण सरोवर परियोजना' शुरू की. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने इस परियोजना को लेकर दौरा भी किया था.

4,900 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करते हुए यह परियोजना कच्छ के छोटे से रेगिस्तान में एशिया की सबसे बड़ी ताज़े पानी की झील बनेगी.

ग्रुप का दावा है कि पानी के भंडारण से गुजरात के आसपास के ज़िलों में कृषि को फ़ायदा मिलेगा.

इस प्रोजेक्ट को लागू करने के लिए जयसुख पटेल कई सालों से काम कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उनके हिस्से सिर्फ़ मुलाकातें और आश्वासन ही आए हैं.

हालांकि, इस 'रण सरोवर' परियोजना का अगरिया (नमक बनाने वाले) और उनके लिए काम करने वाली एनजीओ विरोध कर रहे हैं.

अगरिया लोगों के बच्चों की शिक्षा और महिलाओं के उत्थान से जुड़ी संस्था 'अनुबंध' की मैनेजर निरूपा शाह कहती हैं, "इस परियोजना से क्षेत्र में अगर (नमक क्षेत्र) गायब हो जाएंगे और नमक पकाने वालों का रोज़गार भी ख़त्म हो जाएगा. साफ़ पानी आने से खारा पानी नहीं आएगा और यहां नमक नहीं बन पाएगा.''

निरूपा शाह को यह भी डर है कि इस क्षेत्र में अगरिया लोगों से उनका संसार भी छीन लिया जाएगा.

निरुपा शाह कहती हैं कि इससे यहां के पर्यावरण और जंगली गधों के अभयारण्य पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि बहुत सारी वन भूमि झील बनाने में चली जाएगी.

वे कहती हैं कि अगर यहां ताजे पानी की झील बन जाएगी तो मछली पकड़ने वालों को फ़ायदा हो सकता है, लेकिन नमक पकाने वालों को नुक़सान होगा. शायद यही कारण है कि सरकार ने जयसुख पटेल की प्रस्तावित रण सरोवर परियोजना को मंज़ूरी नहीं दी है.

कच्छ के छोटे से रेगिस्तान में लगभग 6 लाख किसान भारत के कुल नमक उत्पादन में क़रीब 30 प्रतिशत का योगदान देते हैं. हालांकि जिस ज़मीन पर वे सदियों से नमक की खेती करते आ रहे हैं उस पर उनका कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है.

कच्छ के छोटे से रेगिस्तान में सिर्फ तीन प्रतिशत भूमि पर ही नमक की खेती होती है, हालांकि 2011 की जनगणना के मुताबिक़, मछुआरों, ट्रक चालकों और मज़दूरी करने वालों सहित आसपास के क्षेत्र के कुल 17.5 लाख लोग इस पर निर्भर हैं.

मोरबी पुल आपदा के बाद की स्थिति

मोरबी में शाही काल के ऐतिहासिक सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत और रखरखाव का ज़िम्मा ओरेवा ग्रुप को सौंपा गया था.

कंपनी के प्रमुख जयसुख पटेल ने जनता के लिए पुल को खोलते हुए कहा था, "यह क़रीब 150 साल पुराना सस्पेंशन ब्रिज है. यह मोरबी के राजा के समय का ब्रिज है. सरकार और मोरबी नगर पालिका के बीच चार पेज का एग्रीमेंट साइन किया गया है."

"समझौते के तहत हम 15 सालों के लिए पुल के रखरखाव, इसे चलाने और इसकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं. यह हमें सौंप दिया गया है. यह सस्पेंशन ब्रिज मोरबी का स्मृति चिन्ह है. पिछले छह महीने से मरम्मत के काम की वजह से ये पुल बंद पड़ा था."

उनके अनुसार, पुल की मरम्मत लगभग दो करोड़ की लागत से पूरी की गई थी. हालांकि, रविवार को पुल ढह गया जिसमें 135 लोगों की मौत हो गई.

इस पूरी घटना को लेकर ओरवा कंपनी के पीआरओ और प्रवक्ता दीपक पारेख ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा, "पुल के बीच में कई लोग जमा हो गए थे और इस वजह से पुल गिर गया."

वहीं जयसुख पटेल दुर्घटना के बाद सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं और इस पुल की मरम्मत और रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार होने के बावजूद उनकी ओर से कोई बयान अभी तक सामने नहीं आया है.

दूसरी तरफ फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की एक जांच से पता चला कि सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत सिर्फ़ उसके फ़र्श स्लैब को बदलकर की गई थी, जबकि पुल को थाम कर रखने वाले केबल्स को बदला नहीं गया था.

पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, ठेकेदार के पास सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत करने की काबिलियत नहीं थी. ये जानकारी अदालत को लोक अभियोजक ने तब दी जब गिरफ्तार नौ लोगों को मंगलवार को एक स्थानीय अदालत में पेश किया गया.

साथ ही सस्पेंशन ब्रिज पर जाने के लिए बच्चों के लिए 12 रुपये और वयस्कों के लिए 17 रुपये का टिकट लिया जा रहा था, जबकि मोरबी नगर पालिका और ओरेवा के बीच हुए समझौते में पर्यटकों के लिए टिकट का दाम 15 रुपये रखा गया था.

इसके मुताबिक़, प्राथमिक विद्यालय के छात्रों के लिए टिकट का दाम 5 रुपये और 12 साल से ज़्यादा के बच्चों के लिए पहले साल 10 रुपये और दूसरे साल के लिए 12 रुपये रखा गया था. 2028 तक टिकटों के दाम 15 रुपये तक बढ़ाए जा सकते थे.

हालांकि, ओरेवा कंपनी आम यात्रियों से 17 रुपये प्रति टिकट और बच्चों के लिए 12 रुपये प्रति टिकट वसूल रही थी.

इस बीच मोरबी के वकीलों ने फ़ैसला किया है अगर इस हादसे में जयसुख पटेल का नाम सामने आता है तो वह केस नहीं लड़ेंगे.

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)