तेल ही नहीं, पानी भी दांव पर, खाड़ी देशों के लिए क्यों अहम हैं डिसैलिनेशन प्लांट?

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अमेरिका–इसराइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में दुनिया का ध्यान क्रूड ऑयल पर टिका हुआ है. दुनिया के कुल क्रूड ऑयल सप्लाई का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी देशों से आता है.

ज़ाहिर है खाड़ी से आने वाले तेल में बाधा पड़ने का असर दुनिया भर पर पड़ता है.

और इसी वजह से किसी भी संघर्ष की स्थिति में तेल कंपनियां और तेल भंडार बड़े और अहम निशाना बन जाते हैं. दूसरी तरफ़ इस संघर्ष का एक और उतना ही अहम निशाना है पानी. क्योंकि खाड़ी के देशों के पास पानी सीमित मात्रा में है.

खाड़ी के देश पानी की इस कमी को पूरा करने के लिए खारे पानी से नमक हटाकर उसे पीने लायक बनाते हैं. पानी से नमक डिसैलिनेशन प्लांट्स के ज़रिए हटाया जाता है.

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ये डिसैलिनेशन प्लांट महत्वपूर्ण क्यों हैं? और किसी सैन्य संघर्ष में पानी इतना अहम क्यों हो जाता है?

आइए यही समझने की कोशिश करते हैं.

डिसैलिनेशन प्लांट्स पर निर्भरता

गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) खाड़ी के देशों का एक संगठन है. इन सभी देशों के पास तेल और गैस के भंडार हैं लेकिन पानी की किल्लत है.

जीसीसी देशों में सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, बहरीन और ओमान शामिल हैं. ये सभी देश सुन्नी बहुल हैं. उन्होंने ये संगठन साल 1981 में बनाया था.

बहरीन ने 8 मार्च को कहा कि ईरान ने उसके डिसैलिनेशन प्लांट्स पर हमला किया है. इससे पहले ईरान ने दावा किया था कि अमेरिकी हवाई हमलों में उसके डिसैलिनेशन प्लांट्स को नुकसान पहुंचा है.

खाड़ी देश जिस भौगोलिक क्षेत्र में स्थित हैं, वह दुनिया के सबसे शुष्क इलाक़ों में से एक है. यहां बारिश अनियमित है और मीठे पानी के प्राकृतिक स्रोत सीमित हैं. सऊदी अरब और कुवैत ने 1938 से इसी तरह मीठा पानी हासिल करना शुरू किया था.

कैसे करते हैं समुद्र के पानी से नमक को अलग?

डिसैलिनेशन को हिन्दी में अलवणीकरण कह सकते हैं. जैसा कि नाम से ही लग रहा है, ये समुद्र के पानी से नमक हटाने की प्रक्रिया है.

इससे साफ पीने का पानी तैयार होता है. यह खास तौर पर उन देशों के लिए उपयोगी है जिनके पास समुद्री तट तो हैं, लेकिन नदियों वगैरह से मीठा पानी आसानी से उपलब्ध नहीं है.

अलवणीकरण आम तौर पर दो मुख्य तरीकों से किया जाता है.

पहला तरीका रिवर्स ऑस्मोसिस है, जिसमें समुद्र के पानी को ऊंचे दबाव के साथ एक झिल्ली से गुजारा जाता है. यह झिल्ली पानी के अणुओं को तो गुजरने देती है, लेकिन पानी में घुले अन्य रसायनों को पार नहीं होने देती.

दूसरा तरीका थर्मल डिसैलिनेशन है. पुराने थर्मल डिसैलिनेशन प्लांट आम तौर पर डिस्टिलेशन जैसे सिद्धांत पर काम करते हैं. इस प्रक्रिया में

  • खारे पानी को गर्म किया जाता है या उसे वाष्पित होने दिया जाता है
  • पानी की भाप को निकलने देने के बजाय इकट्ठा किया जाता है
  • फिर उस भाप को ठंडा कर शुद्ध या मीठे पानी में बदला जाता है
  • इस तरह नमक पीछे रह जाता है और उसे अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है

पानी की किल्लत

साल 2023 में अरब सेंटर वॉशिंगटन डीसी में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, दुनिया भर में 40% डिसैलिनेट किए गए पानी का उत्पादन गल्फ़ देशों में होता है.

संयुक्त अरब अमीरात में पीने के पानी का करीब 42 प्रतिशत हिस्सा ऐसे ही प्लांट्स के ज़रिए आता है. वहीं कुवैत में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत, ओमान में 86 प्रतिशत और सऊदी अरब में 70 प्रतिशत है. सऊदी अरब किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे ज्यादा डिसैलिनेट किए हुए पानी का उत्पादन करता है.

खाड़ी देशों पर अध्ययन करने वाले पर्यावरण शोधकर्ता नासेर अलसैयद ने अल जज़ीरा को बताया कि इस क्षेत्र के आर्थिक विकास में डिसैलिनेट किए हुए पानी की अहम भूमिका है.

नासेर अलसैयद ने अल जज़ीरा को बताया, "ज्यादातर जीसीसी देशों के लिए मीठे पानी का मुख्य स्रोत यही है... खासकर बहरीन, कुवैत और क़तर जैसे छोटे और पानी की भारी कमी वाले देशों में. यह पानी मुख्य रूप से इंसानी इस्तेमाल के लिए होता है, इसलिए इसका एक मजबूत मानवीय पहलू भी है. और यह क्षेत्र में रोजमर्रा की जिंदगी बनाए रखने के लिए जरूरी है. ऐसे में इन सुविधाओं में किसी भी तरह की रुकावट का असर बहुत गंभीर हो सकता है."

पानी पर युद्ध का साया

फ़ारस की खाड़ी के किनारे तटरेखा पर सैकड़ों डिसैलिनेशन प्लांट मौजूद हैं. ये सभी प्रोजेक्ट ईरानी मिसाइलों या ड्रोन की मारक क्षमता के दायरे में आते हैं.

ईरान ने इस जंग के दौरान दुबई की जबल अली बंदरगाह पर हमला किया है. वहां से सिर्फ़ 12 मील की दूरी पर दुनिया का सबसे बड़ा डिसैलिनेशन प्लांट है. यही प्रोजेक्ट दुबई की अधिकतर पानी सप्लाई का मुख्य स्रोत है.

खाड़ी देशों में कई डिसैलिनेशन प्रोजेक्ट ऊर्जा परियोजनाओं से भी जुड़े होते हैं. यानी वहां समुद्री पानी से बिजली भी बनाई जाती है और खारे पानी को मीठा करने की प्रक्रिया भी होती है. इसलिए इन देशों के ऊर्जा संबंधित किसी भी प्रोजेक्ट पर हमला दोहरा असर डाल सकता है.

अगर किसी बड़े डिसैलिनेशन प्रोजेक्ट पर हमला होता है और प्लांट बंद पड़ जाता है, तो कुछ शहरों को मिलने वाला पानी कुछ ही दिनों में ख़त्म हो जाएगा.

खाड़ी देशों में इससे आपातकाल जैसी स्थिति बन सकती है. और क्योंकि किसी नए प्रोजेक्ट को दोबारा खड़ा करने और चालू करने में समय लगेगा, इसलिए यह एक लंबी अवधि की समस्या बन जाएगी.

इस दौरान खेती, उद्योग सब पर असर पड़ेगा और स्वाभाविक रूप से इससे आर्थिक अनिश्चितता भी बढ़ेगी.

1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान इराक़ी सेना ने जानबूझकर कुवैत के पानी के प्रोजेक्ट्स को नुकसान पहुंचाया था. फ़ारस की खाड़ी में इराक़ी सेना ने लाखों बैरल तेल छोड़ दिया था, जिसके कारण समुद्र में बड़े पैमाने पर तेल फैलाव हुआ और यही तेल भूजल में भी रिस गया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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