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राहुल गांधी का विदेश में मोदी सरकार की आलोचना करना, भारतीय राजनीति में बदलाव का संकेत?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
किसी दौर में कांग्रेस के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव अपने राजनीतिक विरोधी अटल बिहारी वाजपेयी को देश का प्रतिनिधि बनाकर विदेश भेजते थे तो कुछ ही दशक पहले तक, उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेसी नेता को देश के प्रतिनिधि के तौर पर विदेश भेजा था.
पिछले कुछ सालों में स्थितियां बहुत बदल गई हैं.
अपने एक हफ़्ते के लंदन प्रवास के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने जिस तरह से मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना की, उसने भारत के राजनीतिक हलक़ों से लेकर सोशल मीडिया पर बहस छेड़ रखी है.
राहुल गांधी ने ब्रिटेन के 'कैंब्रिज विश्वविद्यालय' में छात्रों को संबोधित किया था. उसके बाद उन्होंने 'इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन' के एक कार्यक्रम के अलावा ब्रितानी संसद के 'हाउस ऑफ़ कॉमन्स' के सभागार में विपक्षी लेबर पार्टी के सांसद वीरेंदर शर्मा की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया.
कैंब्रिज विश्वविद्यालय में बोलते हुए उन्होंने भारत को 'यूनियन ऑफ़ स्टेट्स' यानी भारत को 'राज्यों के संघ' के रूप में परिभाषित किया और कहा कि ऐसी संवैधानिक व्यवस्था में ये ज़रूरी है कि केंद्र सरकार लगातार राज्यों के साथ विचार-विमर्श करती रहे.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि भारत के 'लोकतांत्रिक ढाँचे पर लगातार सरकारी हमले हो रहे हैं.' उन्होंने ये भी कहा कि संसद, न्यायपालिका और प्रेस पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है.
इसके बाद इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के कार्यक्रम में उन्होंने वैसे तो रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में भारत की नीति की तारीफ़ की मगर उन्होंने चीन को लेकर भारत की विदेश नीति पर निशाना साधा.
उन्होंने कहा कि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को चीन से 'ख़तरे का अंदाज़ा नहीं' है.
राजनीतिक दलों की बदलती नीति
केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी के बयानों की आलोचना की और कहा, "राहुल गांधी अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए विदेशी धरती पर भारत की छवि ख़राब करने की कोशिश कर रहे हैं."
सोमवार को पत्रकारों से बात करते हुए ठाकुर ने कहा, "राहुल गांधी विवादों का तूफ़ान बन गए हैं. चाहे विदेशी एजेंसियां हों या चैनल, वो भारत को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं."
हालाँकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एक समय था जब राजनीतिक दलों में आपसी सहमति थी कि विदेश जाने वाले नेता अपनी अपनी राजनीतिक विचारधारा को किनारे रखकर देश के सवाल पर एक जैसा रुख़ रखेंगे. उनका मानना है कि पिछले एक दशक में ये चलन भी ख़त्म ही हो गया है.
वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त कहते हैं कि जो विचार राहुल गाँधी ने अपने लंदन प्रवास के दौरान विभिन्न कार्यक्रमों में प्रकट किए हैं, उससे कांग्रेस को कोई लाभ पहुँचता नज़र नहीं आ रहा है.
वो कहते हैं, "राहुल गांधी के बयानों को लेकर कांग्रेस तैयार भी है या नहीं? ऐसा दिख तो नहीं रहा. वो कुछ भी बोलें लेकिन उनकी पार्टी में किसी भी मुद्दे को लेकर वो राजनीतिक आक्रामकता नहीं है."
गुप्त मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के 'प्रचार तंत्र' के सामने कांग्रेस ख़ुद को मज़बूत नहीं कर पाई है. यही कारण है कि राहुल गांधी विदेश में कुछ कहें लेकिन उनकी पार्टी भारत में किसी भी मुद्दे को लेकर मज़बूती से सत्ता पक्ष को चुनौती नहीं दे पा रही है.
विरोधी दलों के बीच बढ़ती दूरियां
वो मानते हैं कि जिन मुद्दों पर राहुल गांधी ने लंदन में अपने विचार व्यक्त किए हैं, उन पर समाज में चर्चा होनी ही चाहिए लेकिन वो कहते हैं कि कांग्रेस ने इन मुद्दों को लेकर कभी सड़क पर उतरकर आंदोलन नहीं किए हैं जिससे सत्ता पक्ष को घेरा जा सकता हो.
कांग्रेस पर लंबे अरसे से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि पहले विदेश में देश की छवि को लेकर राजनीतिक दल एक हो जाया करते थे.
क़िदवई ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की मिसाल देते हुए कहा कि उन्होंने तब विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को संयुक्त राष्ट्र भेजा था ताकि भारत के पक्ष को मज़बूती से रख पाएँ. पहले विदेश में सत्ता और विपक्ष के नेता एक ही बोली बोलते थे.
बीबीसी से बात करते हुए किदवई कहते हैं, "फिर बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इसका अनुसरण करते हुए कभी सोनिया गाँधी तो कभी सलमान ख़ुर्शीद को भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा जबकि वो विपक्ष में थे."
किदवई ये भी कहते हैं कि अब न सिर्फ़ विपक्ष के नेता, बल्कि सत्ता पक्ष के लोग भी विदेशी दौरों के क्रम में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की आलोचना करने लगे हैं.
वो कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में सत्ता पक्ष के नेता भी विदेशों में जाकर देश पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की आलोचना करते हुए कहते रहे हैं कि पिछले 70 सालों में भारत में कुछ नहीं हुआ था.
जो कुछ हो रहा है या हुआ है वो सिर्फ़ उनके दल यानी बीजेपी की सरकार बनने के बाद संभव हो पाया है.
उनका कहना है, "अब भारत में लोकतंत्र शोरशराबे वाला लोक तंत्र बनने की राह पर है. चाहे सोशल मीडिया हो या फिर एक दूसरे की व्यक्तिगत आलोचना हो. राजनीति का अब यही स्वरूप उभर रहा है जिसमें मर्यादा की सीमा की कोई गुंजाइश ही नहीं नज़र आती है."
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