बहुत कुछ वैसा ही रहने वाला है

"ये पहली बार है कि मैं दिल्ली की रात देखूँगा. मुझे तो यहाँ कि सड़कों का भी नहीं पता और यहां की ठंड का अभी अंदाज़ा हो रहा है.मुझे नए कपड़े बनवाने पड़ेंगे." ये बाते कहीं बीजेपी के नवनियुक्त अध्यक्ष नितिन गडकरी ने.
अब ये सब सुनकर आप को लगेगा कि बीजेपी के नए अध्यक्ष कहाँ पार्टी के सैकड़ों मर्ज़ दूर कर पाएँगे...उन्हें तो पार्टी के घाघ नेता यूँ ही चलता कर देंगे. लेकिन, ठहरिए. इस ख़्याल को मन में आने भी मत दीजिए.
नितिन गडकरी ने दिल्ली में अपनी पहली ही पत्रकार वार्ता में स्पष्ट कर दिया कि वे इस कुर्सी पर इसलिए नहीं बैठे हैं क्योकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें ये ताज पहनाया है.
स्वयं को पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता बताने वाले गडकरी का कहना है कि अगले तीन साल वे पार्टी को मज़बूत बनाने में बिताएँगे.
सीधा संदेश
गडकरी साहब ने जो सीधा संदेश इशारों ही इशारों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को दिया वो ये था कि 'ख़ुद की बजाए पार्टी के हित में सोचें, टीम भावना बढ़ाएँ, अनुशासन बढ़ाएँ और आपसी विश्वास बढ़ाएँ.'
इन तीनों की कमी हाल में बीजेपी में साफ़ दिख रही है.
'पार्टी विथ ए डिफरेंस, पार्टी ऑफ़ डिफरेंसेस' बन गई है. केकड़ों की तरह पार्टी में होड़ लगी है कि कौन किसे कितना नीचे खींच कर आगे बढ़ा जा सकता है.
इस खींचतान में पार्टी देखती रह गई और नागपुर से नागपुर की पसंद का आदमी अध्यक्ष बनकर गया.
दिल्ली में सत्तासीन नेता अपने-अपने भविष्य और नए नेता के व्यक्तित्व और सोच की समझ में जुट गए.
जो नज़र आया वो चौंकाने वाला था. आरएसएस के लेबल से स्वयं को थोड़ा अलग झटकते हुए उन्होंने कहा कि 'संघ से स्वयं वे मन से जुड़े हैं पर बीजेपी को संघ कठपुतली की तरह नचा रहा हो, इस आरोप में कोई सच्चाई नही है.'
व्यक्तिगत राजनीति से वे पार्टी को दूर ले जाना चाहते हैं, 'क्योंकि राजनीति समाजसेवा है केवल पद की चाहत नहीं.'
सोच में नेता ही नहीं पत्रकार भी डूब गए कि कहीं बीजेपी एनजीओ (ग़ैर-सरकारी संस्था) तो नहीं बनने वाली है.
पर तपाक से भ्रम दूर करते हुए उन्होंने कहा कि 'भाजपा राजनीतिक दल है, तो राजनीति तो करेगी ही. हाँ, ध्यान ग़रीबों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों पर रखने की ज़रूरत है.'
आख़िर भारत सभी का है और सब भारत के.
रुकिए, रुकिए... एक नई भाजपा की परिकल्पना की उड़ान पर आप उड़ें, उसके पहले ये जान लें की समान नागरिक संहिता, मंदिर और धारा 370 अब भी पार्टी के एजेंडे में हैं.
तो बहुत कुछ चाहे बदल गया हो अभी बहुत कुछ वैसा ही रहने वाला है.
































