राजनीतिक बिसात पर मोहरों की बारी

बिहार चुनाव
    • Author, रूपा झा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिहार से

बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में जिन छह ज़िलों के 45 सीटों पर मतदान हुआ उसके लिए चहल-पहल पौ फटने से पहले ही शुरू हो गई.

पांच विधानसभा क्षेत्रों में नक्सली चुनौती को देखते हुए मतदान का समय सुबह सात से पांच कर दिया गया था और उनमें से एक क्षेत्र था सीतामढी ज़िले का बेलसंड, जहाँ हम भी सुबह-सुबह ही पहुंचे.

सात बजते ही कतार लगना शुरू हो गई. एक तरफ पुरूष, एक तरफ महिलाए. सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे. मतदान केद्रों पर हथियारों से लैस केंद्रीय सुरक्षाकर्मी.

बिहार में लोगों के मन की टोह लेना आसान है, ऐसा सोच कर मैंने वहाँ खड़े लोगों से बात शुरू की. वहाँ मौजूद सुरेंद्र माझी से जब मैंने पूछा कि इस बार मतदान किन मुद्दों पर होगा, तो उन्होंने पलट कर कहा- जे आत्मा कहते तकरा वोट देबई..हम काहे बताईब..हम सब काम पर वोट देबई, जात पर नै.

अनुभव

मेरे लिए ये थोड़ा चौकाने वाला अनुभव रहा है इस बार बिहार दौरे में पर ये स्पष्ट है कि अब ज़्यादातर मतदाता अपनी पंसद पर खुल कर चर्चा नहीं करना चाहतें हैं.

वे शायद अपना फैसला उनके शब्दों मे अपनी आत्मा से करना चाहते हैं. क्या ये उनके परिपक्व होने की मिसाल नही है.

बहरहाल बेलसंड से निकलते हुए मुज़फ़्फ़रपुर के रास्ते कई मतदान केंद्र देखते हुए हम जा रहे थे और पहले चरण की तरह इस चरण में भी ग्रामीण इलाक़ों में ज़्यादा लोग बाहर निकल आ रहे थे.

शहर की परिधि शुरू होते ही एक तो महिला वोटरो की संख्या में कमी दिखी और आम वोटरो की संख्या में भी गिरावट. ये भी लगा कि नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार का कोई असर नहीं हुआ. इलाक़ों में लोग बाहर निकल कर आ रहे थे.

ये सच है कि जिन ज़िलों मे हमारा जाना हुआ वहां लोगों के बीच विकास कई पहलुओं पर चर्चा होती रही.

संकेत

सड़कों की बेहतर हुई स्थिति, क़ानून-व्यवस्था बेहतर होने की चर्चा, साइकिल पर सवार फ़ुर्र से उड़ती लड़कियों की चर्चा.

बिहार चुनाव
इमेज कैप्शन, आसान नहीं होता मतदाताओं के मन में झाँकना

ये सब एक बात का संकेत दे रहा है कि कि सरकार विरोधी लहर मज़बूत नहीं है. उन इलाक़ों में भी नही जहा विपक्षी दलों का पिछले चुनाव में ज़ोर रहा है..

पर कैसी सरकार चाहिए, क्या किसी भी सरकार ने आपकी ज़िदंगी बदली है ..सवाल पूछते ही लोग फूट पड़ते थे..वे साफ कहते हैं कि उनके लिए कुछ नहीं हुआ.

एक नौजवान लड़की ने ग़ुस्साते हुए कहा कि इस बार तो इसीलिए हम वोट नहीं डालेंगे क्योंकि एक भी उम्मीदवार हमारे काम का नहीं है. सब जेब भरते हैं.

सच ये है कि बिहार के इतने जटिल ताने-बाने में विकास जाति-बिरादरी कितने अलग-अलग खड़े होंगे कहना मुश्किल है.

आम आदमी अपने पत्ते नही खोल रहा है क्योंकि अब तक राजनीति की शतरंजी बिसात में चालें चंद्रगुप्त और चाणक्य चला करते हैं.. अब बारी मोहरो की है..