पश्चिम बंगाल में 'पोरिबोरतोन' की बयार

- Author, योगेन्द्र यादव
- पदनाम, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए विशेष
"एक बार बदल कर देखें तो. पसंद नहीं आई तो पांच साल बाद फिर देख लेंगे."
अगर मगाराम बागदी ने यह बात कहीं ओर कही होती तो मेरे जेहन में न अटकती. लेकिन यह चर्चा लाल दुर्ग पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में एक गाँव में हो रही थी.
इस गाँव में दो साल पहले तक माकपा को छोड़कर किसी पार्टी का झंडा-पोस्टर लगाना नामुमकिन था. कोलकाता में वाम मोर्चे की सरकार थी तो गाँव में माकपा के नेता 'कॉमरेड' खुद सरकार थे. वोट उनके हुक्म पर गिरता था, पंचायत प्रधान उनके इशारे पर दस्तखत करता था, ज़मीन-ज़ायदाद का सौदा उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नहीं होता था, घर के झगड़े उनकी चौखट तक पहुंचते थे.
'कॉमरेड' की समृद्धि, उनकी तिकड़मों और सुकुमारियों में उनकी दिलचस्पी को लेकर कानाफूसी जरूर होती थी, लेकिन मजाल कि कोई खुलकर 'कॉमरेड' के खिलाफ एक लफ्ज़ भी बोले.
उस गाँव में इस बार तृणमूल कोँग्रेस का बड़ा बैनर लगा है. 'कॉमरेड' की करतूतों की चर्चा करते वक्त लोग कनखियों से इधर उधर देख लेते हैं, लेकिन इस बार मुँह सिले हुए नहीं है. दलित मोहल्ले में बागदी समुदाय के लोग खुलकर माकपा के विकल्प की चर्चा कर रहे हैं.
'पोरिबोरतोन' की बयार
ममता बनर्जी की सरकार के बारे में मगाराम कोई दिवास्वप्न नहीं पाले हुए हैं. लेकिन यह तय है कि उन्हें 'पोरिबोरतोन' चाहिए.

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'पोरिबोरतोन' यानी परिवर्तन सिर्फ सरकार-पलट नहीं, सिर्फ सत्ताधारियों में बदलाव नहीं, कोलकाता की राइटर्स बिन्डिंग से लेकर गाँव की दहलीज़ तक पूरे निजाम में परिवर्तन. पूरे बंगाल में इस वक्त 'पोरिबोरतोन' की बयार बह रही है.
अगर पिछले तीन साल का घटनाक्रम देखें तो विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन अपेक्षित ही था. माकपा ने सन 2006 के विधान सभा चुनाव में अपनी विशाल विजय को औद्योगीकरण और शहरी इलाकों पर अधिक ध्यान देने की अपनी नई नीति की जीत समझा. लेकिन नंदीग्राम और फिर सिंगुर के आंदोलनों ने वाम मोर्चे के तिलिस्म को ध्वस्त कर दिया.
सन 2008 पंचायत चुनाव में सत्ता में आने के बाद पहली बार माकपा को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा. अगले साल लोकसभा चुनाव में तीन दशक बाद वाम मोर्चा आधी से ज्यादा सीटें हार गया. अगर विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो प्रदेश की 294 सीटों में से 191 सीटों पर तृणमूल कोँग्रेस और उसके सहयोगियों को बढ़त मिली. उसके बाद हुए उपचुनावों और म्युनिसिपलिटी के चुनावों में वाम मोर्चे का जनसमर्थन और घटा.
दो विश्वसनीय चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षणों ने भी इसी रुझान की पुष्टि की है. उनके अनुसार तृणमूल कांग्रेस ने अपनी स्थिति लोकसभा चुनाव के बाद और मज़बूत की है. ऐसा लग रहा था कि जैसे सोवियत संघ का अभेद्य दुर्ग एकाएक ढह गया था, कुछ वैसा ही हश्र बंगाल के लाल दुर्ग का होगा.
थोड़ी संभली है माकपा
अगर राजनीतिक विश्लेषकों की बात माने तो पिछले कुछ महीनों में हालात बदले हैं. लोकसभा चुनाव के बाद लकवाग्रस्त माकपा पिछले छह महीने में उस स्थिति से उबरी है. उसके स्तब्ध कार्यकर्ताओं का मनोबल लौटा है. माकपा की अद्भुत चुनावी मशीन एक बार फिर चालू हो गयी है. हर गाँव-शहर के हर टोले का हर घर इस मशीन की पंहुच के भीतर है.
माकपा के शीर्ष नेतृत्व ने माफी मांग कर नई शुरुआत की है. मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी को देखते हुए अधिखंश मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण का लाभ देने की घोषणा भी की गयी है. भ्रष्ट कार्यकर्ताओं और बदनाम नेताओं की छुट्टी भी हुई है. आधे से ज्यादा विधायकों का टिकट काट कर नए और युवा नेतृत्व को मौका दिया गया है. इससे उत्साहित माकपा अब हवा का रुख पलटने का दावा कर रही है.
उधर तृणमूल और कांग्रेस कैम्प की कई कमजोरियां सामने आई हैं. ममता बनर्जी ने कांग्रेस से समझौता तो किया, लेकिन कांग्रेस की नाक रगड़ कर. कांग्रेस को सिर्फ पैंसठ सीटें दीं, और उसमें भी हारने वाली सीटों का अनुपात खूब है.
हालाँकि काँग्रेस का वोटर आज भी गठबंधन के साथ है लेकिन कार्यकर्ता उदासीन और नेता क्षुब्ध हैं. अधीर चौधरी जैसे काँग्रेस के दमदार नेता खुल्लमखुल्ला विद्रोही उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं.
वही बीमारियाँ
तृणमूल ने भी टिकटों के बंटवारे में कई भूल की हैं. पार्टी के बाहर से नए चेहरों को चुनाव में उतारने से उसके अपने कार्यकताओं में रोष है. पिछले तीन सालों में तृणमूल काँग्रेस का पंचायत और म्युनिसिपलिटी चलाने का अनुभव अच्छा नहीं रहा है. अक्षमता, भ्रष्टाचार और रंगदारी के आरोप संगीन हैं. सवाल यह है कि यह सब बारीक विश्लेषण परिवर्तन की हवा के सामने टिक पाएंगे.
बेशक, तृणमूल काँग्रेस के पास परिवर्तन की कोई कार्य-योजना नहीं है. ममता बनर्जी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हैं, लेकिन औद्योगीकरण और निवेश के पक्ष में हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के सवाल पर वाममोर्चा की कारगुजारी की उनकी आलोचना में दम है, लेकिन वो उससे अलग कैसे होंगी इसकी कोई योजना नहीं है. माओवाद और दार्जीलिंग के सवाल पर वो कहाँ खड़ी हैं, शायद वो भी न बता पायें.
इन बातों को माकपा का गाँव का कार्यकर्ता भी उठाता है. अखोय डोम पूछते हैं 'पोरिबोरतोन' से क्या होगा? ग़रीब को क्या मिलेगा? यह ख़तरा भी जताते हैं कि ममता की आड़ में वही भूस्वामी और पूंजीपति वापस आ जायेंगे जिन्हें वाममोर्चा सरकार ने मुश्किल से खदेड़ा था. माकपा के नेता समझाते हैं कि अगर घर की बकरी क्यारी से कन्द-मूल खाना शुर कर दे तो आप उसे निकाल कर शेर को तो घर में नहीं ले आयेंगे. स्वतंत्र बुद्धिजीवी भी यही सवाल पूछते हैं. आखिर 'पोरिबोरतोन' का एजेंडा क्या है?
सवाल जायज़ है. लेकिन फिलहाल बंगाल का मतदाता इस किस्म के सवालों से विचलित नहीं है. मतदाता नफे-नुक़सान का हिसाब नहीं कर रहा. चौंतीस सालों तक एक ही पार्टी के राज तले जी रहे बंगाल के नागरिकों के लिये परिवर्तन एक साधन नहीं साध्य बन गया है. बदलाव से जो भी हासिल हो, बदलाव कर सकने की क्षमता अपने आप में हासिल होने वाली बड़ी चीज़ है.
टूटेगा कॉमरेड का शिकंजा
चौंतीस साल के वाम मोर्चा राज ने ग़रीब को सम्मान दिया, बटाईदार और मज़दूर को सुरक्षा भी दी, लेकिन साथ ही साथ पार्टी को ग़रीब का माई-बाप भी बना दिया. जीवन के हर मोड़ पर सर्वव्यापी, सर्वज्ञानी और सर्वगुणसंपन्न पार्टी की दमघोंटू उपस्थिति ने एक साधारण नागरिक की निजता और गरिमा पर हमला किया. उच्च दर्शनों और निर्गुण सिद्धांतों की आड़ में भय का माहौल तैयार किया. सांप्रदायिकता से बचाये रखा, लेकिन भद्रलोक जातियों की गिरफ़्त ढीली नहीं हुई.
शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, पानी और रोज़गार में कुछ ख़ास उपलब्धि नहीं हुई. लेकिन माकपा के वैचारिक दबदबे के चलते इन विषयों पर खुल कर चर्चा संभव नहीं थी. आज देश भर में गुजरात और बंगाल ही ऐसे राज्य हैं जहाँ राजनीति पर चर्चा करने वक़्त लोग इधर-उधर देख लेते हैं.
आज बंगाल के नागरिक के लिये 'पोरिबोरतोन' इस भय से मुक्ति का औजार बन गया है. माकपा के ख़िलाफ़ 25 वर्षों से अनवरत लड़ रही ममता बैनर्जी 'पोरिबोरतोन' की प्रतीक बन चुकी हैं.
फिलहाल ये पूछना बेमानी है कि 'पोरिबोरतोन' से क्या हासिल होगा. लाल दुर्ग के बीचोंबीच उस गाँव में 'पोरिबोरतोन' से 'कॉमरेड' का शिकंजा टूटेगा. दिल्ली तक ये ख़बर पहुँचे, न पहुँचे उस गाँव के लिए यह क्रांति से कम नहीं है.
(लेखक सामयिक वार्ता के संपादक हैं.)
































