दीदी और अम्मा का परचम

ममता बनर्जी

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आख़िरकार 34 साल बाद पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे की सत्ता का अंत हो गया है और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने सहयोगी कांग्रेस के साथ मिलकर भारी बहुमत हासिल कर लिया है.

294 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन को 226 सीटें मिली हैं. इनमें अकेले 184 सीटें तृणमूल ने जीती हैं, जबकि कांग्रेस ने 42 सीटों पर जीत हासिल की है.

वामपंथी दलों को इस चुनाव में भारी हार का सामना करना पड़ा है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सिर्फ़ 40 सीटों पर जीत मिली है, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) को केवल दो सीटों पर जीत मिली है.

ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने 11 सीटें जीती हैं और रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने सात सीटें जीती हैं.

वामपंथी दलों ने अपनी हार स्वीकार करते हुए विपक्ष की सकारात्मक भूमिका निभाने की बात कही है. वहीं ममता बनर्जी ने इसे लोकतंत्र और बंगाल की जनता की जीत बताया है.

बुद्धदेब भट्टाचार्य

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इमेज कैप्शन, इस बार सीपीएम की नहीं चली

वाममोर्चे की हार

वाममोर्चे को पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद पहली बार विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है.

ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के गठबंधन ने दो तिहाई से अधिक सीटों पर जीत हासिल की है.

ममता बनर्जी ने इस जीत को लोकतंत्र और पश्चिम बंगाल की जनता की जीत बताया है.

उन्होंने कहा, "एक राजनीतिक दल की तरह हमारी पार्टी आती-जाती रहेगी लेकिन अब राज्य में लोकतंत्र की बहाली हो गई है."

ममता बनर्जी ने कहा है कि उनकी प्राथमिकता प्रदेश में अच्छे प्रशासन की स्थापना करना है, जिसका कई दशकों से अभाव रहा है.

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की हार ने उनके लिए एक युग का अंत कर दिया है, जिसकी शुरुआत 1977 में ज्योति बसु के मुख्यमंत्री बनने के साथ हुई थी.

हालांकि इसके संकेत पिछली लोकसभा चुनाव के समय मिल गए थे जब वामदलों को कई अहम सीटों पर क़रारी हार का सामना करना पड़ा था.

चुनाव के थोड़े दिन पहले ही मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने स्वीकार किया था कि सीपीएम का लोगों से संपर्क कमज़ोर हो गया है.

अम्मा की लहर

अगर पश्चिम बंगाल में दीदी ममता बनर्जी का जादू चला है तो तमिलनाडु में अम्मा यानी जयललिता का.

अधिकांश चुनावी विश्लेषणों को ग़लत साबित करते हुए जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने सत्तारुढ़ डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन का सफ़ाया कर दिया है.

जयललिता

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ज़्यादातर चुनाव विश्लेषक कह रहे थे कि तमिलनाडु में करुणानिधि की पार्टी डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन और जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके के बीच टक्कर की स्थिति है. पर योगेंद्र यादव जैसे कुछ ही चुनाव विश्लेषकों ने कहा था कि इन चुनावों में जयललिता की जीत होने जा रही है और हुआ भी वही .

पार्टी की करारी हार के बाद मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने पद से इस्तीफा दे दिया है.

अपनी जीत के बाद जयललिता ने कहा कि वो इस जीत के लिए जनता का शुक्रिया अदा करती हैं और कोशिश करेंगी कि जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतरें.

चुनाव परिणामों के मुताबिक एआईएडीएमके के खाते में 150 सीटें आई हैं, जबकि डीएमके को सिर्फ़ 23 सीटों हीं मिल पाई हैं.

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने नौ सीटें जीती है और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के खाते में दस सीटें आयी है.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पांच सीटें जीती है. 33 सीटें अन्य दल और निर्दलीयों नें जीती हैं.

माना जा रहा था कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में ए राजा के जेल जाने और सीबीआई के आरोपपत्र में कनिमोड़ी का नाम आने के बाद भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा बनेगा.

जयललिता ने 2जी स्पेक्ट्रम के साथ-साथ करुणानिधि परिवार के 45 सदस्यों की हर जगह मौजूदगी और उनके भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया.

चुनाव परिणाम बताते हैं कि डीएमके को परिवारवाद और भ्रष्टाचार का मुद्दा भारी पड़ा है.

हालांकि कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा है कि चुनाव परिणामों का कांग्रेस-डीएमके गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन चेन्नई से कई और विश्लेषक मानते हैं कि तत्काल न सही लेकिन इस गठबंधन पर चुनाव परिणामों का असर ज़रुर दिखाई पड़ेगा.

तरुण गोगोई

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस को तीसरी बार मौका मिला है

कांग्रेस तीसरी बार

असम में सत्तारुढ़ मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है.

असम की 126 में से 78 सीटों पर जीत के बाद तरुण गोगोई का तीसरी बार असम का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया है.

जानकारों के मुताबिक उग्रवादी संगठन उल्फा को बातचीत के लिए तैयार करने और असम को दिवालियापन के कगार से वापस लाने में कामयाब रहे मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने प्रशासनिक एवं राजनीतिक कौशल से कांग्रेस को लगातार तीसरी बार सत्ता में क़ायम रखा है.

बेबाक राय रखने वाले 75 वर्षीय गोगोई केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं.

गोगोई ने पिछले 10 साल के अपने शासन के दौरान उल्फ़ा सहित कई उग्रवादी संगठनों को वार्ता के लिए तैयार किया और राज्य में वित्तीय स्थिरता को लागू किया है.

अपनी जीत के बाद तरुण गोगोई ने कहा कि विकास और कल्याण से भरी शासन व्यवस्था पर सत्ता विरोधी लहर कभी भारी नहीं पड़ सकती.

चुनाव परिणामों के साथ ही मुख्य विपक्षी दल असम गण परिषद का सभी विपक्षी दलों को एकसाथ लेकर व्यापक ग़ैर कांग्रेसी गठबंधन बनाने का सपना चकनाचूर हो गया.

असम गण परिषद को इस चुनाव में कुल दस सीटें ही मिल पाईं हैं और उसने प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा भी खो दिया है.

कांग्रेस के बाद चुनाव में सबसे बढ़िया प्रदर्शन रहा इतर व्यापारी और सामाजिक कार्यकर्ता बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का जिसने 18 सीटें जीत कर मुख्य विपक्षी दल का स्थान पा लिया है.

2006 के पिछले विधान सभा चुनाव के समय पहली बार अस्तित्व में आई पार्टी ने पहले ही चुनाव में 10 सीटें जीती थी और इस चुनाव में अपनी स्थिति को मज़बूत करते हुए उन्होंने 18 सीटें जीती.

लेकिन इस चुनाव में सबसे ख़राब प्रदर्शन रहा भारतीय जनता पार्टी का.

भारतीय जनता पार्टी ने जहां 2006 में 10 सीटें जीती थीं वहीं इस चुनाव में उसे सिर्फ़ पांच सीटें ही मिली हैं. वहीं ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस को एक सीट से संतोष करना पड़ा.

यूडीएफ़ की जीत

केरल

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इमेज कैप्शन, यूडीएफ़ को आसान जीत की उम्मीद थी

केरल में यूडीएफ़ को आसान जीत की उम्मीद थी, लेकिन सीपीएम के भीतर मचे घमासान के बावजूद पार्टी का चुनावी प्रदर्शन संतोषजनक रहा है और एलडीएफ़ ने 140 सीटों वाली विधानसभा में यूडीएफ़ की 72 सीटों के मुक़ाबले 68 सीटें हासिल की हैं.

घोषित परिणामों के मुताबिक कांग्रेस ने 38 सीटों पर जीत दर्ज की है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को दो, जनता दल (सेक्युलर) को 4, केरल कांग्रेस (एम) को नौ, मुस्लिम लीग केरल स्टेट कमेटी को भी 20 सीटें हासिल हुई हैं. एलडीएफ में शामिल माकपा ने 45 सीटें जीती, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) को 13 सीटें मिली हैं और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने भी दो सीटों पर जीत दर्ज की है. अन्य सात उम्मीदवार विजयी घोषित किए गए हैं.

आमतौर पर केरल में वामपंथी दलों के नेतृत्व वाले गठबंधन एलडीएफ़ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ के बीच बारी-बारी से सत्ता बँटती रही है.

इस आधार पर चुनाव विश्लेषक ये मान रहे थे कि इस बार सत्ता यूडीएफ़ के हाथों में आ जाएगी.

सत्तारुढ़ गठबंधन का नेतृत्व कर रही सीपीएम में अंतर्कलह और पार्टी नेतृत्व की मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन के साथ चल रही खींचतान के कारण यूडीएफ़ की जीत आसान नज़र आ रही थी, लेकिन यूडीएफ़ को बहुत कम अंतर से एलडीएफ़ पर जीत हासिल हुई है.

पुडुचेरी में कांग्रेस की नहीं चली

पुडुचेरी की 30 सीटों में सात सीटों पर कांग्रेस, पांच सीटों पर एआईएडीएमके और दो सीटों पर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने जीत दर्ज की है. 16 सीटें अन्य के खाते में गई है.

इस तरह विधानसभा में कांग्रेस गठबंधन के पास सिर्फ़ नौ सदस्य होंगे. जबकि 21 सीटें विरोधियों के पक्ष में गई हैं.

उपचुनाव

इसके साथ ही आंध्र प्रदेश की कड़प्पा लोकसभा सीट और पुलिवेंदलू विधानसभा सीट पर उपचुनाव था.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी ने इस सीट से इस्तीफ़ा देकर कांग्रेस के ख़िलाफ़ चुनाव लडा़ और बड़ी जीत हासिल की है.

जनगमोहन की माँ विजयलक्ष्मी ने भी कांग्रेस के ख़िलाफ़ पुलिवेंदलू विधानसभा सीट पर उपचुनाव जीत लिया है.