मीडिया की धूम

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के लाखों करोड़ों घरों में इन दिनों लोग इन दिनों अपने टीवी सेट खोलते ही पहले शायद ये देखना चाहते हैं कि 'अन्ना के आंदोलन' पर ताज़ा ख़बर क्या है.
इसमें हैरान होने की भी ज़रुरत नहीं है. पिछले कुछ दिनों में भारत के तमाम छोटे बड़े शहरों में सैंकड़ों लोग सड़कों पर उतर कर आए हैं और उन्होंने अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में अपनी शिरकत की है.
सैंकड़ों जगह लोगों ने जुलूस निकाले है और दफ्तरों का बहिष्कार किया है.
इस आंदोलन में ख़ास बात यही रही है कि मीडिया ने इस पूरे प्रकरण में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है और समाचार पत्रों और टेलीविज़न चैनलों पर अन्ना का आंदोलन सुर्खियाँ बटोर रहा है.
इलेक्ट्रॉनिक या फिर टीवी न्यूज़ चैनलों की भूमिका पर ख़ास ध्यान देने की ज़रुरत है.
ज्यों ही अन्ना हज़ारे ने दिल्ली के जेपी पार्क पर अपना आमरण अनशन करने की ठानी थी तभी से सरकार ने कई शर्तें रख दीं थी.
अन्ना अडिग
अन्ना अडिग रहे और आखिरकार 16 अगस्त को ही तडके सुबह अन्ना हज़ारे को उनके आवास से गिरफ्तार कर लिया गया.
टीवी चैनलों के भीतर जैसे एक नई जान फूँक दी गई. भारत के छोटे-बड़े हर शहर में लोगों ने लाईव प्रसारणों में देखा कि कैसे दिल्ली के तिहाड़ जेल के बहार लोगों का हुजूम जमा होने लगा और कैसे लोग सड़कों पर अन्ना के समर्थन में उतर आए.
जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत मानते हैं कि मीडिया ने पूरे प्रकरण का लाईव प्रासारण दिखा कर अपनी ज़िम्मेदारी निभाई.

पुष्पेश पंत कहते हैं, "भारतीय मीडिया ने बेहद गंभीरता से अन्ना के आंदोलन को अपने श्रोताओं, दर्शकों और पाठकों के सामने रखा है. सरकार के प्रति लोगों का रोष इस आंदोलन के रूप में बहार निकल कर आया है."
न्यूज़ चैनलों पर आरोप
पिछले कई सालों से भारतीय टीवी न्यूज़ चैनलों पर तरह तरह के आरोप भी लगते रहें हैं.
विश्लेषकों का मत रहा है कि भारत के न्यूज़ चैनल बॉलीवुड और मनोरंजन पर ज्यादा ध्यान देते रहे हैं और इस बीच में असल ख़बर कहीं पर पिस कर रह जाती है.
लेकिन हेडलाइंस टुडे न्यूज़ चैनेल के मुख्य संपादक राहुल कँवल इस बात से कतई इत्तफ़ाक नहीं रखते.
राहुल कहते हैं, "टीवी न्यूज़ चैनेल वही दिखाते हैं जो जनता देखना चाहती है. और इस बात में कोई दो राय नहीं है कि जनमानस ये जानना चाहता है कि अन्ना के आंदोलन से ताज़ा ख़बर क्या है. लोग भ्रष्टाचार से उकता गए हैं. रही बात हमारी, तो हम दोनों पक्षों को तरजीह देते हैं."
सरकार पर दबाव
हालांकि अन्ना के आंदोलन को मूल रूप से लोगों ने टीवी स्क्रींस पर ही पनपता हुआ देखा लेकिन फिर भी इस तरह की बातें होती रही हैं कि प्रिंट मीडिया यानी अख़बारों ने इस प्रकरण में ज्यादा ज़िम्मेदार रवैया अपनाया है.
'ओपेन' पत्रिका के उप राजनैतिक संपादक जतिन गांधी का मत है कि टीवी न्यूज़ चैनलों ने इस आंदोलन को जश्न के रूप में मनाया है.
जतिन कहते हैं, "मैं इस बात को मानता हूँ कि मीडिया की वजह से सरकार पर काफी दबाव पड़ा और उन्हें टस से मस होना पड़ा. लेकिन मीडिया ने इस पूरी प्रक्रिया को एक त्योहार की तरह से मनाया है. मेरी एक चैनेल के वरिष्ठ संपादक से बात हुई तो पता चला कि उन्होंने दिल्ली भर में इस आंदोलन के लिए 24 रिपोर्टर तैनात कर रखे हैं. भले ही उनके पास कहने के लिए कम हो लेकिन उनसे अपडेट ज़रूर लिए जाते हैं." फ़िलहाल तो हालात यही हैं कि अन्ना हज़ारे तिहाड़ से सीधे रामलीला मैदान जाकर आमरण अनशन करने की तैयारी कर रहे हैं.
लेकिन उनके रामलीला मैदान पहुँचने के घंटों पहले ही टीवी चैनलों की लाईव प्रसारण करने वाली तमाम ओबी वैनें रामलीला मैदान में अपना खूंटा गाड़ चुकी है.
घर बैठ हर चीज़ पर नज़र बनाए रखने का इंतज़ाम पूरा है.
































