डोनल्ड ट्रंप- नरेंद्र मोदी की केमिस्ट्री और पांच बड़े सवाल

    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन से
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की पहली आधिकारिक यात्रा के लिए भारत में स्वागत की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं.

उम्मीद की जा रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात के अहमदाबाद शहर में राष्ट्रपति ट्रंप के स्वागत के लिए हज़ारों की तादाद में लोग इकट्ठा होंगे.

तकरीबन एक लाख से ज़्यादा लोगों की मौजूदगी में राष्ट्रपति ट्रंप 'दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम' का उद्घाटन करेंगे.

तीन घंटे के इस इवेंट के लिए माना जा रहा है कि 85 करोड़ रुपये से ज़्यादा की रकम ख़र्च किए जाएंगे.

ट्रंप ऐसे समय में ये दौरा कर रहे हैं जब भारत की अर्थव्यवस्था दबाव में है और बेरोज़गारी अपने चरम पर.

ट्रंप प्रशासन की कूटनीति

कश्मीर और पड़ोसी देशों से आने वाले ग़ैरमुसलमान अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने वाले विवादास्पद नागरिकता संशोधन क़ानून के मसले पर प्रधानमंत्री मोदी को घरेलू और विदेशी दोनों ही मोर्चों पर आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं.

थिंक टैंक ब्रुकिंग्स के इंडिया प्रोजेक्ट्स की निदेशक तन्वी मदान कहती हैं, "ये राजनीतिक तौर पर उनके लिए फ़ायदेमंद होगा. न्यूज़ स्टोरी के लिहाज से भी ये अच्छा है. वे दुनिया के सबसे ताक़तवर नेता के बगल में खड़े दिखेंगे और अपनी बात रखेंगे."

अमरीका में मौजूद जानकारों का कहना है कि इस दौरे से ये बात फिर से स्पष्ट होती है कि ट्रंप प्रशासन की कूटनीति में भारत की अपनी जगह है. वे कहते हैं कि अगर ये दौरा नहीं होता तो ऐसा लगता कि दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी गर्माहट नहीं रही.

लेकिन एक बड़ा सवाल जो बहुत से लोग पूछ रहे हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ऐसे वक़्त में भारत क्यों जा रहे हैं जब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर मुद्दों की कमी नहीं है. वैसे भी राष्ट्रपति ट्रंप लंबी विदेश यात्राओं को पसंद करने के लिए नहीं जाने जाते.

मतदाताओं को रिझाने की कोशिश?

बहुत से लोग ये मानते हैं कि ट्रंप ऐसे देश का दौरा कर रहे हैं जहां उन्हें कड़े सवालों से रूबरू नहीं होना है. चर्चा इस बात की भी है कि ट्रंप के दौरे के पीछे घरेलू वजहें हैं और इसका मक़सद कुछ हद तक चुनावों में भारतीय मूल के अमरीकी मतदाताओं को आकर्षित करना भी है.

अमरीका में कामयाब भारतीय समुदाय मुख्यतः डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट करता है. नेशनल एशियन अमरीकन सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2016 के राष्ट्रपति चुनावों में भारतीय मूल के अमरीकी मतदाताओं में केवल 16 फ़ीसदी लोगों ने ट्रंप के लिए वोट किया था. एक आंकड़े के मुताबिक अमरीका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या करीब 43 लाख है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया में पब्लिक पॉलिसी विभाग के प्रोफ़ेसर कार्तिक रामकृष्णन इस सर्वे से जुड़े हुए थे. कार्तिक रामकृष्णन कहते हैं, "भारतीय मूल के अमरीकी करों में कटौती और सरकार का दायरा सीमित करने में यकीन नहीं रखते. वे सामाजिक कल्याण पर ज़्यादा खर्च के हिमायती हैं."

'विदेश नीति की पहल'

एक विचार ये भी है कि पिछले साल ह्यूस्टन में हुए कार्यक्रम 'हाउडी मोदी' से एक तबके में रुख बदलने के लिए उत्साह बढ़ा होगा.

तन्वी मदान कहती हैं, "ट्रंप के चुनावी कैम्पेन में भारत से मिलने वाली फुटेज का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि ये बताया जा सके कि राष्ट्रपति का दुनिया भर में स्वागत किया जाता है. उन्होंने अमरीका को महान और आदरणीय बनाया है, ख़ासकर तब जब कि कुछ सर्वेक्षणों में ये बात सामने आई है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमरीका की प्रतिष्ठा कम हुई है."

भारतीय मूल के अमरीकी मतदाताओं पर ट्रंप के भारत दौरे का क्या असर पड़ेगा? इस सवाल पर कार्तिक रामकृष्णन कहते हैं, "इस दौरे से फौरी फायदा हो सकता है. मुमकिन है कि 16 फ़ीसदी का आंकड़ा 20-25 फ़ीसदी तक पहुंच जाए. लेकिन ये 50-50 प्रतिशत नहीं होने वाला है."

थिंक टैंक 'द हेरीटेज फाउंडेशन' में दक्षिण एशिया विभाग के रिसर्च फ़ेलो जेफ़ स्मिथ ट्रंप के भारत दौरे को 'विदेश नीति की पहल' के तौर पर देखते हैं.

कारोबार समझौता

भारत और अमरीका के बीच इस समय 160 अरब डॉलर का कारोबार हो रहा है. महीनों की बातचीत के बाद भारत के साथ कारोबार समझौता इस दौरे के केंद्र में रहेगा. राष्ट्रपति ट्रंप के प्रचार अभियान में इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा सकता है. लेकिन इस कारोबार समझौते को लेकर उम्मीदें धूमिल पड़ती जा रही हैं.

बढ़ते टैरिफ़, क़ीमतों और मेडिकल यंत्रों, ईकॉमर्स और डेटा को लेकर भारत के रुख पर अमरीका की अपनी चिंताएं हैं. भारत चाहता है कि उसे दी जा रही व्यापार सहूलियतें फिर से बहाल की जाएं. कुशल कामगारों और वीज़ा प्रणाली को लेकर भारत के अपने मुद्दे हैं.

ट्रेड एसोसिएशन 'यूएस इंडिया बिज़नेस' की अध्यक्ष निशा बिस्वाल कहती हैं, "भारत और अमरीका के बीच अगर कोई सीमित समझौता भी हुआ तो उससे दोनों देशों के उद्योगों के बीच ये अहम संदेश जाएगा कि वे कारोबार बढ़ाने को लेकर गंभीर हैं और वे विवाद सुलझा सकते हैं."

निशा बिस्वाल आगे कहती हैं, "दोनों देशों की सरकारों की तरफ़ से जो मैं सुन रही हूं, उस वजह से मैं बहुत आशान्वित नहीं हूं."

चीन फ़ैक्टर

चीन को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप का रुख सख़्त रहा है. 'वन बेल्ट वन रोड' और 'साउथ चाइना सी', ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन को लेकर भारत और अमरीका दोनों की साझा चिताएं रही हैं.

तन्वी मदान कहती हैं, "क्षेत्र में चीन की गतिविधियों और दखलंदाज़ी को लेकर दोनों देशों की चिताएं हैं. चीन को लेकर भारत और अमरीका के रणनीतिक साझेदारी के बिना ये दौरा हो पाता, ऐसा मुझे नहीं लगता है."

जानकार ये कहते हैं कि अगर अमरीका और चीन के बीच संकट गहराया हो तो भारत की चिंता इसके आर्थिक असर को लेकर है. यहां तक कि अगर अमरीका और चीन के बीच ज़्यादा नजदीकियों के सूरत में भी भारत परेशानी महसूस करेगा क्योंकि इससे उसके समीकरण से बाहर रह जाने की आशंका है.

दूसरी तरफ़ अमरीकी रवैये को लेकर जानकारों की राय ये है कि रणनीतिक स्वायत्ता की भारत की चाहत अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदारी की राह में रुकावट होगी.

विशेषज्ञों के मुताबिक़ सवाल इस बात को लेकर भी है कि क्या भारत एशिया में चीन को संतुलित करने वाली शक्ति के तौर पर खड़ा हो पाएगा या फिर घरेलू औ क्षेत्रीय राजनीति में उलझकर रह जाएगा.

एजेंडे में रक्षा सौदे

मीडिया रिपोर्टों से ऐसे संकेत मिले हैं कि ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान अरबों डॉलर के रक्षा सौदों पर बात हो सकती है. इस सौदे में भारतीय नौसेना को हेलिकॉप्टरों की बिक्री भी शामिल है.

इस सिलसिले में अमरीकी विदेश विभाग ने 1.867 अरब डॉलर के इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वीपन सिस्टम की संभावित बिक्री को मंजूरी दी है.

एक विशेषज्ञ ने कहा कि भारत की तरफ़ से ये कोशिश रही है कि वो अपनी रक्षा ज़रूरतों की खरीदारी अलग-अलग देशों से करे. हाल के समय में भारत ने अमरीका के साथ कोई बड़ा रक्षा सौदा भी नहीं किया है जैसा कि उसने रूस और फ्रांस से खरीदारी की है.

तन्वी मदान कहती हैं, "रणनीतिक वजहों से भारत और अमरीका हमेशा से बहुत क़रीब रहे हैं. यहां तक कि ट्रंप के शासन काल में भी हमने देखा है कि रक्षा और कूटनीतिक मसलों पर दोनों देशों के बीच बातचीत होती रही है."

ट्रंप और मोदी की केमिस्ट्री

राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच पिछले आठ महीनों में ये पांचवीं मुलाकात होने वाली है. वे दोनों एक दूसरे को दोस्त कहते हैं. एक दूसरे को गले लगाती हुई दोनों तस्वीरें खिंचवाते हैं.

भारत दौरे के ठीक पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा, "भारत ने हमारे साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया है लेकिन मैं प्रधानमंत्री मोदी को बहुत पसंद करता हूं." ये बयान दोनों नेताओं के आपसी रिश्तों के बारे में काफी कुछ कहता है.

ब्रुकिंग्स के हाल के एक इवेंट में एशिया ग्रुप के चेयरमैन डॉक्टर कर्ट कैम्पबेल कहते हैं, "मुझे किसी और नेता का नाम ध्यान में नहीं आता जिनका राष्ट्रपति ओबामा और राष्ट्रपति ट्रंप दोनों से ही बेहतरीन रिश्ते रहे हों. और ये फ़ैक्ट है कि मोदी और उनकी टीम बेहद प्रभावी तरीके से इंगेज करती है कि मुझे लगता है कि दोनों ही नेता कहेंगे, कि नहीं वे मुझे ज़्यादा पसंद करते हैं."

हालांकि दोनों देशों के बीच मतभेद के मुद्दे भी हैं. ईरान के साथ भारत के रिश्ते और रूस के साथ उसकी रक्षा साझेदारी, ये दो ऐसे मुद्दे हैं.

जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोशुआ व्हॉइट कहते हैं, "ऐसा नहीं लगता कि इस दौरे का एजेंडा पहले से साफ़ तौर पर तय कर लिया गया है. क्या निकलकर आता है, हमें इसका इंतज़ार करना होगा."

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