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चीन ने दिया जवाब, कहा भारत हमसे उलझना फ़ौरन बंद करे
चीन ने भारत से आग्रह किया है कि वो तत्काल अपनी ग़लत हरकतों को सुधारे और जल्द से जल्द चीनी सेना से उलझना बंद करे.
चीने के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने साथ ही कहा कि हाल ही में भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हुए संघर्ष के लिए भारत ज़िम्मेदार है.
चीन की सत्ताधारी पार्टी के अख़बार ग्लोबल टाइम्स के अनुसार विदेश मंत्रालय की दैनिक ब्रीफ़िंग में प्रवक्ता ने कहा, "पहले भारत ने द्विपक्षीय सहमतियों का उल्लंघन किया, उन्होंने अवैध तरीक़े से सीमा पार कर उकसाया, सीमा क्षेत्र में यथास्थिति को एकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए बदला, और चीनी सैनिकों को धमकाने के लिए गोलियाँ चलाईं".
चीन के इस बयान से एक दिन पहले भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भारत-चीन तनाव पर बयान देते हुए चीन पर सीमा के उल्लंघन का आरोप लगाया था.
चीनी विदेश मंत्रालय के बयाने से पहले ग्लोबल टाइम्स ने भी राजनाथ सिंह के बयान पर प्रतिक्रिया दी थी.
ग्लोबल टाइम्स के संपादक हू शीजिन ने एक लेख में लिखा कि चीन शांति और युद्ध दोनों के लिए तैयार है और भारत से वहां काम कर रहीं अति-राष्ट्रवादी ताक़तों की भाषा में ही बात करनी चाहिए.
हू शीजिन ने कहा, ''भारत के रक्षा मंत्री ने संसद को बताया कि भारतीय सैनिक कितने नेक और बहादुर थे. उन्होंने चीन-भारत संबंधों में सीमा संकट को शांतिपूर्वक हल करने के महत्व पर ज़ोर दिया. उनकी कही ये दूसरी बात उनके भाषण का प्रमुख हिस्सा थीं.''
अख़बार लिखता है कि इन दिनों भारतीय सेना ने सीमा पर नरम रुख़ अपनाया हुआ है जैसा कि राजनाथ सिंह के संबोधन से भी पता चलता है. ये नरम रुख़ चीन की सेना पीपल लिबरेशन आर्मी (पीएल) के ज़बरदस्त दबाव की वजह से अपनाया गया है.
शीजिन ने कहा कि पीएलए चीन-भारत इलाक़े में अपनी तैनाती बढ़ा रही है और कठोर कार्रवाई कर रही है. इससे भारतीय सेना को पता चल गया है कि चीन के साथ सैन्य टकराव में उलझना एक जुआ है जिसे वो नहीं झेल सकते.
'भारत में अति राष्ट्रवादी ताक़तें'
उन्होंने कहा, ''भारत में कई अलग-अलग ताक़तें हैं. कुछ अति राष्ट्रवादी हैं जो आसान रास्ते पर जाने से मना करती हैं और सख्त रुख़ पर अड़ी रहती हैं.''
उन्होंने चीनी सरकार को सलाह दी कि उन्हें भारत के साथ कूटनीतिक वार्ता करते समय उसी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए, जिसे वे ताक़तें समझती हैं- सहयोग लंबे समय तक बना रहता है जब इसे संघर्षों के ज़रिए हासिल किया जाता है.
हू शीजिन कहते हैं कि चीन को भारत-चीन सीमा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रयास करते रहना चाहिए, लेकिन अपनी सेना को ज़रूर तैयार रखना चाहिए. मज़बूत सैन्य दबाव के बिना भारत सीमा मुद्दों पर सही रवैया नहीं अपनाएगा.
क्या कहा था राजनाथ सिंह ने
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को भारत-चीन गतिरोध को लेकर संसद में बयान दिया था. उन्होंने अप्रैल से लेकर अब तक की घटनाओं के बारे में जानकारी दी थी और चीन पर पिछले समझौतों के उल्लंघन का आरोप लगाया था.
साथ ही उन्होंने कहा था कि किसी को भी हमारी सीमा सुरक्षा के प्रति हमारे दृढ़ निश्चय को लेकर संदेह नहीं होना चाहिए. भारत यह भी मानता है कि पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण संबंधों के लिए आपसी सम्मान और संवेदनशीलता आवश्यक हैं.
हालाँकि, राजनाथ सिंह ने साफ़ तौर पर कहा था कि सीमा पर तनाव का द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ेगा. भारत सरकार ने चीन से तनाव के बाद कई चीनी ऐप पर प्रतिबंध भी लगा दिया है.
चार महीने से गतिरोध
भारत और चीन के बीच लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास पिछले चार महीने से टकराव की स्थिति बनी हुई है.
इस गतिरोध के समाधान के लिए राजनाथ सिंह ने चार सितंबर को मॉस्को में चीन के रक्षा मंत्री वेई फ़ेंगे के साथ मुलाक़ात की थी.
राजनाथ सिंह ने यह भी कहा था कि अपनी संप्रभुता और सीमा की रक्षा के लिए हमारी प्रतिबद्धता पर भी किसी को संदेह नहीं होना चाहिए.
इसके बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर की चीन के विदेश मंत्री वांग यी से भी मॉस्को में मुलाक़ात हुई थी.
लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी और इसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी. इसके बाद से दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है लेकिन तनाव अब भी क़ायम है.
इसके बाद भारत ने कहा कि चीन ने 29 और 30 अगस्त की रात को पैंगॉन्ग लेक के साउथ बैंक क्षेत्र में भड़काऊ सैन्य हरकत करते हुए यथास्थिति को तोड़ने की कोशिश की जिसे नाकाम कर दिया गया.
हालांकि, चीन ने एलएसी पार करने की ख़बरों का खंडन किया था और भारत पर भी एलएसी पार करने का आरोप लगाया था.
भारत और चीन के बीच 3,500 किलोमीटर लंबी सरहद है और दोनों देश सीमा की वर्तमान स्थिति पर सहमत नहीं हैं. इसे लेकर दोनों देशों में 1962 में जंग भी हो चुकी है.
जयशंकर और वांग यी के बीच हुई बैठक में गतिरोध को ख़त्म करने के लिए पाँच सूत्रीय योजना पर सहमति बनी थी.
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