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कोरोना वैक्सीन: ऑक्सफ़ोर्ड में हो रहे ट्रायल टीम का नेतृत्व करने वाली सारा गिलबर्ट को कितना जानते हैं आप?
- Author, टीम बीबीसी
- पदनाम, नई दिल्ली
कोरोना वैक्सीन बनाने की दिशा में कई कंपनियाँ काम कर रही हैं. कई देश जुटे हुए हैं लेकिन इन सबके बीच ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के वैक्सीन टेस्ट की सबसे अधिक चर्चा हो रही है.
दावा है कि ऑक्सफ़ोर्ड की वैक्सीन का पहला ह्यूमन ट्रायल क़ामयाब रहा है. अगर आगे भी सबकुछ ठीक रहता है, तो संभव है कि बहुत जल्दी ही कोरोना वायरस की एक कारगर वैक्सीन तैयार कर ली जाए.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी, एस्ट्राज़ेनेका दवा कंपनी के साथ मिलकर यह वैक्सीन बनाने की दिशा में काम कर रही है.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की एक टीम सारा गिलबर्ट के नेतृत्व में कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने का काम कर रही है.
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कौन हैं सारा गिलबर्ट?
सारा ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की उस टीम का नेतृत्व कर रही हैं जो कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने की दिशा में सबसे आगे मानी जा रही है.
प्रोफ़ेसर सारा गिलबर्ट को हमेशा से अपने बारे में यह पता था कि उन्हें आगे चलकर मेडिकल रिसर्चर बनना है लेकिन 17 की उम्र में सारा को बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें शुरुआत कहाँ से करनी है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ एंजलिया से जीव-विज्ञान में डिग्री हासिल करने के बाद सारा ने बायो-केमिस्ट्री में पीएचडी की. उन्होंने अपनी शुरुआत ब्रुइंग रिसर्च फाउंडेशन के साथ की. इसके बाद उन्होंने कुछ और कंपनियों में भी काम किया और ड्रग मैन्युफैक्चरिंग के बारे में सीखा.
इसके बाद वो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एड्रियन हिल्स लैब आ पहुँची. यहाँ उन्होंने शुरुआत की जेनेटिक्स पर काम के साथ. इसके अलावा मलेरिया पर भी उन्होंने काफ़ी काम किया. इसके बाद वो वैक्सीन बनाने के काम से जुड़ गईं.
ट्रायल में बच्चों की मदद
सारा तीन बच्चों (ट्रिपलेट्स) की माँ हैं. बच्चों के जन्म के एक साल बाद ही वे यूनिवर्सिटी में लेक्चरर बन गईं और फिर साल 2004 में यूनिवर्सिटी रीडर.
2007 में सारा को वेलकम ट्रस्ट की ओर से एक फ़्लू वैक्सीन बनाने का काम मिला. और इसी के बाद शुरुआत हुई उनके अपने रिसर्च ग्रुप का नेतृत्व करने के सफ़र की.
सारा के तीनों बच्चे अब 21 साल के हैं.
वे सब भी बायोकेमिस्ट्री से पढ़ाई कर रहे हैं. सारा के इन तीनों बच्चों ने कोरोना वायरस के लिए तैयार की गई एक प्रयोगात्मक वैक्सीन के ट्रायल में हिस्सा भी लिया था. ब्लूमबर्ग की ख़बर के मुताबिक़, ये ट्रायल वैक्सीन उनकी माँ यानी सारा की ही तैयार की हुई थी.
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मुश्किल था सफ़र
सारा कहती हैं "काम और पर्सनल लाइफ़ में तालमेल बिठाकर रख पाना बेहद मुश्किल होता है. यह तब नामुमिन लगते लगता है जब आपके पास कोई सपोर्ट ना हो. मेरे ट्रिपलेट्स थे. नर्सरी फ़ीस मेरी पूरी तनख्वाह से अधिक होती थी. ऐसे में मेरे पार्टनर ने अपना करियर छोड़कर बच्चों संभाला."
वो कहती हैं, "साल 1998 में बच्चे हुए और उस समय मुझे सिर्फ़ 18 सप्ताह की मैटरनिटी लीव मिली थी. यह काफ़ी परेशानी वाला वक़्त था क्योंकि मेरे पास तीन प्रीमैच्योर बच्चे थे जिनकी मुझे देखभाल करनी थी. अब भले ही मैं एक लैब हेड हूँ, लेकिन मैंने सिक्के का दूसरा पहलू भी देखा है."
वो कहती हैं कि वैज्ञानिक होने की सबसे प्यारी बात ये है कि आपके लिए काम के घंटे तय नहीं होते हैं. ऐसे में एक माँ के लिए काम करना आसान हो जाता है.
लेकिन सारा इस बात से भी इनकार नहीं करती हैं कि कई बार ऐसी भी परिस्थिति बन जाती है जब सबकुछ उलझ जाता है और आपको त्याग करने पड़ते हैं.
जो महिलाएँ विज्ञान के क्षेत्र में भविष्य बनाना चाहती हैं और परिवार के साथ रहते हुए, उन्हें सलाह देते हुए सारा कहती हैं, "पहली बात जो आपके ज़हन में होनी चाहिए वो ये कि यह बहुत ही मुश्किल भरी चुनौती है. सबसे पहले ज़रूरी है कि आपके पास हर चीज़ के लिए योजना हो. साथ ही यह भी तय करना ज़रूरी है कि आपके साथ कोई ऐसा हो ही जो उस वक़्त घर का ध्यान रख सके जब आप काम पर हों.''
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