जलवायु परिवर्तन पर बड़े-बड़े वादे

दुनिया में सबसे ज़्यादा पर्यावरण प्रदूषण फैलाने वाले देश अमरीका और चीन के नेताओं ने वादा किया है कि वे जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ रहे वैश्विक तापमान को कम करने की दिशा में ठोस क़दम उठाएंगे.
इन नेताओं ने यह वादा न्यूयॉर्क में हो रहे विश्व जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में किया है जिसका आयोजन संयुक्त राष्ट्र ने किया है.
अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आगाह किया है कि अगर मौजूदा पीढ़ी ने इस समस्या को हल करने के लिए ठोस उपाय नहीं किए तो इतिहास में उन्हें सही जगह नहीं मिलेगी और आने वाली पीढ़ियों को ऐसे संकट का सामना करना पड़ सकता है जिससे निकलना असंभव हो.
उन्होंने कहा कि कोई देश कितना ही बड़ा या छोटा है, वो अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता और न ही वो इसके प्रभावों से ख़ुद को बचा सकता है. उन्होंने कहा कि इस समस्या का सामना करने के लिए अमरीका अब ज़्यादा उपाय करेगा.
बराक ओबामा ने कहा, "हम वायु और सौर ऊर्जा वाले बिजली संयंत्रों का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं, हम कार्बन उत्सर्जन को कम करने की परियोजनाओं में करोड़ों डॉलर ख़र्च कर रहे हैं ताकि हम अपने संयंत्रों को साफ़-सुथरा बना सकें."
उनका कहना था, "हमने ये भी आकलन शुरू कराया है कि देश भर में कुल कितना कार्बन उत्सर्जन होता है. मैं जी20 देशों के अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इस मुद्दे पर चर्चा करुंगा कि कार्बन उत्सर्जन करने वाले ईंधन पर अनुदान राशि को किस तरह कम किया जाए ताकि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ज़्यादा ध्यान दिया जा सके."
चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ ने कहा है कि विकसित देशों को विकासशील देशों की ज़रूरतों को भी ध्यान में रखना होगा और उन्हें स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की प्रौद्योगिकी विकसित करने में सहयोग करना होगा.
चीन के प्रयास
उन्होंने वादा किया कि चीन ऊर्जा के उत्पादन और ख़र्च में किफ़ायत बरतने और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए प्रयास तेज़ करेगा.
राष्ट्रपति हू जिंताओ ने संयुक्त राष्ट्र मंच पर अपनी बात दोभाषिये के ज़रिए पेश की.
उन्होंने कहा, "हम वर्ष 2005 के स्तर से कार्बन उत्सर्जन में वर्ष 2020 तक उल्लेखनीय कटौती करेंगे. हम ग़ैरपरंपरागत ऊर्जो स्रोतों को बढ़ावा देंगे जिनमें परमाणु स्रोत भी शामिल हैं. हम कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देंगे. हम जंगल बढ़ाएंगे और हम हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के ठोस प्रयास करेंगे और ऐसी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देंगे जो पर्यावरण के लिए उपयुक्त होगी."
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान कि मून ने इस सम्मेलन का उदघाटन करते हुए चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन की समस्या का सामना करने के लिए अगर कोई समझौता नहीं होता है तो उसका कोई नैतिक बहाना नहीं हो सकता.
विश्व नेताओं का आहवान करते हुए बान कि मून ने कहा, "आप लोगों के निर्णयों के बहुत महत्वपूर्ण परिणाम होंगे. आप लोगों के पास ऐसी चाबी है जो मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, टिकाऊ और प्रगतिशील रास्ता खोल सकती है."
उन्होंने कहा, "आपके पास ऐसी ताक़त है जिसके ज़रिए कार्बन उत्सर्जन कम करके जलवायु परिवर्तन की समस्या का सामना किया जा सकता है, आप लोगों के ही ज़रिए एक ऐसा रास्ता निकल सकता है जो विश्व स्तर पर हरित प्रगति का रास्ता हो सकता है, इसलिए यह सटीक समय है - ठोस उपाय करने का."
नैतिक बहाना नहीं

बान की मून ने कहा, " दिसंबर 2009 में कोपनहेगन में होने वाले सम्मेलन में अगर कोई व्यापक समझौता नहीं हो पाता है तो उसका कोई नैतिक बहाना नहीं हो सकता और यह नाकामी आर्थिक रूप से बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण वाली और राजनीतिक रूप से अपरिपक्व होगा. हम इस रास्ते पर अब पीछे की तरफ़ नहीं जा सकते हैं और अगर हमने पिछले साल के संकट से कुछ भी सबक सीखा है तो वो ये कि हमारी सबकी नियति एक दूसरे से जुड़ी हुई है."
एक तरफ़ तो विश्व नेताओं ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर सम्मेलन में विचार किया, दूसरी तरफ़ विमान सेवा उद्योग ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने का संकल्प व्यक्त किया है.
ब्रिटिश एयरवेज़ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विली वेल्श ने कहा है कि उनकी विमान सेवा वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को कम करके वर्ष 2005 के स्तर से आधे पर लाने की कोशिश करेगी.
विमान सेवा उद्योग की यह कहते हुए आलोचना की जाती है कि यर क्षेत्र कार्बन उत्सर्जन की समस्या का सामना करने के लिए कोई योगदान नहीं दे रहा क्योंकि यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ती जारही है.
दूसरी तरफ़ इस उद्योग क्षेत्र का कहना है कि ज़्यादा कुशल हवाई जहाज़ और कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले ईंधन के इस्तेमाल से इस महत्वपूर्ण मदद मिलेगी.
































