सवाल पीछे छूटे लोगों का

- Author, नलिन कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन
इंटरनेट का नाम लेते ही दिमाग़ में एक आभासी दुनिया की छवि बनती है जिसकी आबादी असल दुनिया की आबादी के मुक़ाबले कहीं तेज़ी से बढ़ रही है. हालाँकि इस समय दुनिया भर में क़रीब एक अरब लोग ही इंटरनेट की पहुँच में हैं.
यानी अभी भी रीयल वर्ल्ड के अधिकतर लोग साइबर वर्ल्ड की चौखट तक नहीं पहुँच पाए हैं.
इस अपेक्षाकृत सीमित पैठ के बाद भी समाज के हर क्षेत्र में इंटरनेट का असर साफ़ दिखने लगा है. बात गहन अनुसंधान की हो या मनोरंजन की, संचार की हो या व्यापार की, आंदोलन की हो या प्रचार की- हर जगह इंटरनेट का असर समग्रता में ज़ाहिर हो रहा है.
इंटरनेट अमरीका की रक्षा प्रयोगशालाओं में 40 साल पहले अस्तित्व में आया था, जब कंप्यूटरों की आपस में बात कराने की प्रणाली विकसित की गई. सही मायने में ये आम लोगों के बीच पहुँचा 20 साल पहले जब दुनिया भर के कंप्यूटरों में जमा जानकारियों को कहीं भी सुलभ करा सकने वाली भाषा या तकनीक सामने आई.
इंटरनेट का दायरा जिस तेज़ी से बढ़ रहा है, इसकी भावी दिशा और दशा के बारे में कोई सटीक भविष्यवाणी असंभव है. लेकिन कुछ बातें ज़रूर स्पष्ट हैं.
इस बारे में विकिपीडिया के सहसंस्थापक जिमी वेल्स ने बीबीसी को बताया, “अगले पाँच से दस साल में एक अरब और लोग इंटरनेट से जुड़ जाएँगे. ऑनलाइन हो रहे ये लोग अमरीका, यूरोप या जापान से नहीं होंगे क्योंकि यहाँ के अधिकतर लोग पहले से ही इंटरनेट पर हैं. इंटरनेट से जुड़ने वाले नए लोग मुख्यत: चीन और भारत जैसे देशों से होंगे."
वे कहते हैं, "अफ़्रीकी जनता भी बड़ी संख्या में इंटरनेट से जुड़ेगी हालाँकि अपेक्षाकृत धीरे-धीरे. मैं समझता हूँ इस प्रक्रिया के रोचक सांस्कृतिक प्रभाव देखने को मिलेंगे.”
तो क्या ये एक तरह से दुनिया में अमरीकी लोकसंस्कृति के प्रभुत्व के अंत की शुरुआत नहीं है?
जिमी वेल्स इस सवाल के जवाब में अपना एक अनुभव साझा करते हैं, “हाल ही में सऊदी अरब के मेरे एक दोस्त ने अपनी फ़ेसबुक साइट पर एक दक्षिण अमरीकी वीडियो डाला. ये वीडियो स्पेनी भाषा के एक टेलीविज़न कार्यक्रम का था जिसमें प्रतिभागी बॉलीवुड के एक गाने पर नाच रहे थे- हिंदी भाषा के गीत को स्पेनी लहज़े में गाते हुए. उस वीडियो को मज़े लेकर देखते हुए मन में सवाल उठा कि इसमें अंग्रेज़ी कहाँ है! इस तरह का सांस्कृतिक आदान-प्रदान महत्वपूर्ण है, क्योंकि कला, संगीत और विचारों के इस अनूठे संगम पर अमरीकी संस्कृति की छाप नहीं दिखती है.”
नई पता प्रणाली
एक अनुमान के अनुसार इस समय इंटरनेट पर 20 करोड़ वेबसाइट हैं जिनकी गिनती हर पल सैंकड़ो के हिसाब से बढ रही है. लेकिन आने वाले दिनों में इंटरनेट पर एक और तरह से भीड़ बढ़ेगी.
बताया इंटरनेट का जनक माने जाने वाले विन्ट सर्फ़ ने- “आप देखेंगे कि भविष्य में ज़्यादा से ज़्यादा उपकरण इंटरनेट से जुड़े होंगे. घर की ही बात करें तो टेलीविज़न, सेटटॉप बॉक्स और म्यूज़िक सेट जैसे तमाम उपकरणों के अपने आईपी एड्रेस होंगे ताकि आप इंटरनेट के ज़रिए उसको काम में ला सकें.”

विन्ट सर्फ़ ने जब अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इंटरनेट की शुरुआत की थी तो उन्होंने ये नहीं सोचा था कि जल्दी ही दुनिया के हर व्यक्ति को इंटरनेट से जोड़ने का सपना देखा जाने लगेगा. उन्होंने 32 बिट्स की इंटरनेट पहचान प्रणाली विकसित की थी क्योंकि तब उन्हें लगता था कि चार अरब 30 करोड़ इंटरनेट पते भविष्य की सारी ज़रूरतों के लिए पर्याप्त होंगे.
लेकिन जिस तेज़ी से वेबसाइटों की संख्या बढ़ रही है, और जितनी बड़ी संख्या में नए-नए उपकरण इंटरनेट जुड़ रहे हैं कि उन्हें मौजूदा प्रणाली आईपीवी4 के ज़रिए संभालना संभव नहीं होगा.
इसलिए अब विन्ट सर्फ़ यथाशीघ्र नई प्रणाली आईपीवी6 (छठी पीढ़ी का इंटरनेट प्रोटोकॉल) को अपनाए जाने की ज़रूरत बताते हैं, क्योंकि मौजूदा प्रणाली ज़्यादा दिन तक इंटरनेट के विस्तार का आधार नहीं बन सकती है. आईपीवी6 की क्षमता के बारे में विंट सर्फ़ बताते हैं- “ये 128 बिट्स वाली आईपी एड्रेस प्रणाली है. यदि आप हिसाब लगाएँ कि इसमें कितने पतों की गुंजाइश है तो ये आंकड़ा बनेगा 340 खरब खरब खरब खरब इंटरनेट पते.”
'सब रीयल है'
विंट सर्फ़ अगले कुछ वर्षों में इंटरनेट की दिशा के बारे में तीन मुख्य बातों का उल्लेख करते हैं- ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग मोबाइल उपकरणों से वेब सुविधाओं का उपयोग करेंगे, इंटरनेट नेटवर्क दिन-प्रतिदन तेज़ होते जाएँगे और आम उपयोग के अधिकतर उपकरण इंटरनेट से जुड़ जाएंगे. वे स्मार्ट इलेक्ट्रिक ग्रिड को लेकर भी उत्साहित हैं जिनसे जुड़े उपकरणों से सेंसर या सूचक के काम लिए जा सकेंगे.
लेकिन इंटरनेट के ज़रिए जिस तरह से लोगों को अधिकार मिल रहे हैं और आज़ादी मिल रही है, क्या ये डर नहीं है कि भविष्य में जनता पर सरकारों का नियंत्रण नहीं के बराबर रह जाएगा और अराजकता जैसी स्थिति बन जाएगी? इस सवाल के जवाब में विन्ट सर्फ़ कहते हैं- “ये समझ लेना बिल्कुल ज़रूरी है कि इंटरनेट या साइबरस्पेस की परिकल्पना असली दुनिया से अलग नहीं है. हम असली दुनिया में रहते हैं, और इंटरनेट भी इसी दुनिया में है. ये ज़रूरी है कि हम क़ानून की पहरेदारी में रहें क्योंकि अराजकता का दामन थामना सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है. और मैं नहीं समझता कि इंटरनेट अराजकता को परिपोषित करेगा. मेरा मानना है कि इंटरनेट सभ्यता के विकास में मानव का सहायक साबित होगा.”
डिजिटल डिवाइड
जिस तरह पहिए, भाप के इंजन, बिजली या कंप्यूटर के आविष्कार से मानव सभ्यता में क्रांतिकारी बदलाव देखे गए, इंटरनेट का असर उनके मुक़ाबले कहीं ज़्यादा होने की भविष्यवाणी की जाती है. इसमें कोई संदेह नहीं कि इक्कीसवीं सदी में ज्ञान का मुख्य स्रोत और कारोबार का मुख्य आधार इंटरनेट ही होगा.
अफ़सोस की बात है कि इंटरनेट के हिसाब से दुनिया आज दो हिस्सों में बंटी हुई नज़र आती है. इस डिजिटल डिवाइड के एक छोर पर हैं अमरीका, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के देश, जहाँ लोग इंटरनेट के सुपरहाईवे पर सरपट भाग रहे है.
दूसरे सिरे पर हैं अफ़्रीका और एशिया के अधिकतर देश जहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी इंटरनेट की पगडंडियो तक भी नहीं पहुँच पाया है.
इस डिजिटल-डिवाइड के फलते-फूलते हिस्से में हर घर तक 100 मेगाबाइट प्रति सेकेंड की तेज़ी वाला इंटरनेट पहुँचाने की योजनाएँ कार्यान्वित की जा रही हैं, तो वहीं इसके पिछड़े हिस्से की बहुसंख्य आबादी को ‘स्पीड’ की कोई चिंता नहीं है क्योंकि अभी तो वे इंटरनेट से जुड़ ही नहीं पाए हैं.
इस विभाजन को पाटने के लिए ज़रूरी है कि विकासशील देशों की सरकारें बिना देरी किए सार्वभौम इंटरनेट सुविधा के लक्ष्य को साक्षरता और जनस्वास्थ्य जैसी प्राथमिकताओं के समानान्तर रखना शुरू करें.












