आप जानते हैं कि अमीर असल में कितने अमीर हैं

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- Author, गिल बी. जूनियर
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
'अगर ग़रीबों को ये पता चल जाए कि अमीर कितने अमीर हैं, तो सड़कों पर दंगे होंगे.'
अमरीकी अभिनेता और कॉमेडियन क्रिस रॉक ने ये बात 2014 में न्यूयॉर्क पत्रिका को दिए एक इंटरव्यू में कही थी. क्रिस अमीर और ग़रीब के बीच बढ़ती खाई पर बात कर रहे थे. ये बात कहकर उन्होंने अमीर-ग़रीब के भेद पर रिसर्च की चुनौतियों को उजागर कर दिया.
आख़िर अमीर और ग़रीब के बीच फ़ासले को नापने का सब से अच्छा तरीक़ा क्या है?
अमीर-ग़रीब के बीच फ़र्क़ का पता लगाने वाले ज़्यादातर रिसर्च, आमदनी को पैमाना बनाते हैं. इसकी बड़ी वजह है कि आमदनी से जुड़े आंकड़े ज़्यादा और आसानी से मिल जाते हैं. मगर, हमें समझना होगा कि अमीर कोई एक साल की आमदनी से रईस नहीं बन जाते. ये तो बरसों-बरस संपत्ति जोड़ने की वजह से होता है. अब पहले की संपत्ति का हिसाब लगाना थोड़ा मुश्किल होता है.
अमीर लोग यही चाहते हैं कि उनकी संपत्ति और आमदनी को लेकर हम अटकलें ही लगाते रहें. कभी हक़ीक़त से वाबस्ता न हों. वरना, वही होगा, जिसका अंदेशा क्रिस रॉक ने इंटरव्यू में जताया था.
जो लोग धनी और ग़रीब लोगों के बीच फ़ासले पर रिसर्च करते हैं, उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा आंकड़ों की ज़रूरत महसूस होती है ताकि इस खाई की गहराई और फ़ासले का सटीक अंदाज़ा लगाया जा सके. हालांकि कोई ये नहीं चाहता कि सच्चाई पता चलने पर हिंसा हो. मगर समाज के तबक़ों के बीच कितना फ़ासला है, ये सच सबको पता होना ज़रूरी है.
अमीर-ग़रीब के बीच खाई की सबसे अच्छी जानकारी हमें लोगों की संपत्ति का आकलन कर के मिलती है.

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सामाजिक असमानता
समाज में असमानता का पता लगाने के कई तरीक़े हैं.
इनमें सबसे लोकप्रिय ज़रिया है, लोगों की आमदनी. वजह साफ़ है. आमदनी से जुड़े आंकड़े बहुतायत में मौजूद हैं. इनका हिसाब लगाना भी आसान होता है. हालांकि इससे अमीर-ग़रीब के बीच फ़र्क़ की असल तस्वीर नहीं पता चलती.
इसके मुक़ाबले संपत्ति हमारी ताज़ा आमदनी की नुमाइंदगी नहीं करती. बल्कि ये हमारी बरसों की कमाई का नतीजा होती है. कई बार ये पिछली पीढ़ियों की मेहनत और कमाई के ज़रिए भी हमें हासिल होती है. अगर विद्वान, रिसर्चर और नीतियां बनाने वाले लोग संपत्ति पर रिसर्च करें, तभी उन्हें अमीर और ग़रीब के बीच खाई की गहराई और चौड़ाई का सही-सही अंदाज़ा होगा.
किसी के पास कितनी संपत्ति है, इससे हमें उसके रहन-सहन और ज़िंदगी में तरक़्क़ी के मिलने वाले मौक़ों के बारे में भी जानकारी मिलती है. हमारी संपत्ति से ही तय होता है कि हम बच्चों की तालीम में कितने पैसे ख़र्च करेंगे और संपत्तियां ख़रीदने में कितना पैसा लगाएंगे. कितनी रक़म अपने ऐशो-आराम पर ख़र्च करेंगे और कितना निवेश रिटायरमेंट के प्लान में करेंगे.
संपत्ति होने पर हमें तनख़्वाह के फ़ासलों और अचानक आई मुसीबतों से भी ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता.
अगर आप अमीर हैं, आपके पास संपत्ति है तो आपके लिए ख़राब हुई वॉशिंग मशीन की जगह नई मशीन लेने के लिए ज़्यादा सोचना नहीं पड़ेगा. कोई बीमारी आ गई तो आप फ़ौरन बेहतर इलाज पर पैसे ख़र्च कर सकते हैं. इनके मुक़ाबले कोई ग़रीब इंसान वॉटर हीटर ख़राब होने पर उसे बदलने के लिए सौ बार सोचेगा और बीमार पड़ना तो किसी भी ग़रीब के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है.

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अमीरों और ग़रीबों के बीच फ़ासले
अगर हम अमरीका में अमीरों और ग़रीबों की संपत्ति के बीच फ़ासले को देखें तो ये विकसित देशों में भी सबसे बड़ा फ़र्क़ है.
अमरीका का हडसन इंस्टीट्यूट आम तौर पर पूंजीपतियों का समर्थक माना जाता है. इसी हडसन इंस्टीट्यूट ने 2017 की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि 2013 में अमरीका में सबसे अमीर 5 फ़ीसद लोगों के पास देश की 62.5 प्रतिशत संपत्ति है. जबकि तीस साल पहले सबसे अमीर 5 फ़ीसद अमरीकियों के पास देश की 54.1 फ़ीसद संपत्ति ही थी. इसका नतीजा ये हुआ कि बाक़ी 95 प्रतिशत अमरीकियों की संपत्ति 45.9 फ़ीसद से घटकर 37.5 प्रतिशत ही रह गई.
इस वजह से 2013 में ज़्यादा आमदनी वाले परिवारों की सालाना औसत आमदनी (6,39,400 डॉलर), औसत आमदनी वाले परिवारों की आमदनी (96,000 डॉलर) से सात गुना ज़्यादा थी. अमरीका में अमीरों और ग़रीबों की आमदनी का ये पिछले तीस सालों में सबसे बड़ा फ़ासला था.
असमानता पर रिसर्च करने वाले इमैनुअल साएज़ और गैब्रिएल ज़ुकमैन के रिसर्च से पचा चला कि अमरीका के सबसे ज़्यादा अमीर 0.01 फ़ीसद लोगों के पास 2012 में देश की 22 फ़ीसत संपत्ति थी. जबकि इन्हीं लोगों के पास 1979 में देश की केवल 7 फ़ीसद संपत्ति थी.
संपत्ति के इन आंकड़ों के मुक़ाबले अगर आप सिर्फ़ आमदनी से जुड़े आंकड़े देखेंगे, तो तस्वीर अलग ही दिखेगी.
2013 में अमरीका के सबसे अमीर पांच फ़ीसद परिवार अमरीका की कुल आमदनी का 30 प्रतिशत ही कमाते थे, जबकि इन्हीं लोगों के पास क़रीब 63 प्रतिशत संपत्ति थी.
सिर्फ़ अमरीका ही ऐसा विकसित देश नहीं है, जहां अमीर और ग़रीब की संपत्तियों के बीच फ़ासला इतना गहरा और चौड़ा हो रहा है. लेकिन अमरीका इस मामले में दूसरे अमीर देशों के मुक़ाबले में भी बहुत आगे है. अमरीका के सबसे अमीर 5 फ़ीसद लोगों के पास औसत अमरीकी से 91 गुना ज़्यादा संपत्ति है. ये दुनिया के 18 सबसे अमीर देशों के बीच सबसे बड़ा फ़र्क़ है.

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नीदरलैंड्स की हक़ीक़त
अमीर-ग़रीब के बीच बड़े फ़ासले की इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर आने वाले नीदरलैंड्स में अमीरों और ग़रीबों के बीच इससे आधा का फ़ासला ही है.
हाल ही में अमरीका में बना टैक्स कट ऐंड जॉब्स एक्ट से ये फ़ासला और बढ़ेगा.
इस क़ानून का सबसे प्रमुख प्रावधान है लोगों के टैक्स में कटौती. सबसे ज़्यादा 39.6 प्रतिशत टैक्स देने वालों को इस कानून की वजह से आमदनी का 37 प्रतिशत ही टैक्स देना होगा. संपत्ति कर देने वाले परिवारों की संख्या में भी इस कानून से काफ़ी कमी आएगी. इसके अलावा कॉरपोरेट टैक्स भी 35 फ़ीसद से घटाकर 21 प्रतिशत कर दिया गया है.
इसका सबसे बड़ा फ़ायदा अमीरों को ही होगा. टैक्स देने वाले नीचे के 20 फ़ीसद लोगों के टैक्स में औसतन 40 डॉलर की कमी आएगी. इनके मुक़ाबले अमीरों का टैक्स 5420 डॉलर घट जाएगा. सबसे अमीर 0.1 फ़ीसद लोग इस क़ानून की वजह से 61,920 डॉलर बचाएंगे. 2015 तक सबसे अमीर लोगों की टैक्स बचत बढ़कर 1 लाख 52 हज़ार 200 डॉलर हो जाएगी. जबकि बाकी लोगों की टैक्स बचत मामूली ही रहेगी. ये सभी टैक्स रियायतें 2026 में ख़त्म हो जाएंगी.
ज़्यादा रईस टैक्स देने वाले लोग इस कानून के दूसरे पहलुओं से भी फ़ायदा हासिल करेंगे. जैसे कि तमाम रिसर्च बताते हैं कि टैक्स की दरें घटाने का सबसे ज़्यादा फ़ायदा अमीरों को ही होता है. वहीं संपत्ति कर देने वालों की तादाद घटने का मतलब ये होगा कि इन लोगों के पास, अगली पीढ़ियों के लिए और संपत्ति जमा होती जाएगी.
इस टैक्स क़ानून के समर्थक दावा करते हैं कि इससे ग़रीब और अमीर के बीच फ़ासला नहीं बढ़ेगा क्योंकि अमीर लोग जो पैसे बचाएंगे वो आख़िर में ख़र्च करेंगे, तो ये बाज़ार के रास्ते समाज के निचले तबक़े के लोगों तक पहुंचेगा.
जबकि रिसर्च ये बताते हैं कि ऐसा होता नहीं. टैक्स कानूनों से अमीरों को फ़ायदा पहुंचता है. लेकिन, इससे आर्थिक तरक़्क़ी नहीं होती. बल्कि ग़रीब लोगों को तालीम के कम बेहतर मौक़े मिलते हैं. उनकी औसत उम्र भी घटती है. 2017 में अमरीकियों की औसत उम्र घटी ही है.

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बढ़ती जागरूकता
तो क्या क्रिस रॉक की ये बात सही है कि ग़रीब अमरीकियों को अमीरों की रईसी का ठीक से अंदाज़ा नहीं है?
सर्वे बताते हैं कि क्रिस रॉक सही हैं. 2011 के एक सर्वे में शामिल लोगों के जवाब बताते हैं कि वो अमीरों और ग़रीबों की संपत्ति के फ़ासले से अनजान हैं.
सर्वे से ये भी पता चला कि औसत अमरीकियों को अमीर-ग़रीब के बीच बढ़ते फ़ासले की फ़िक्र है. वो नहीं चाहते कि अमीरों और ग़रीबों की संपत्ति में ज़्यादा फ़र्क़ हो.
अब अमीर और ग़रीब अमरीकियों के बीच ये फ़ासला नैतिक और सामाजिक रूप से ठीक है या नहीं? क्या इससे दंगे हो सकते हैं? इन सवालों के जवाब तो फ़िलहाल साफ़ नहीं हैं.
आगे चलकर जो भी हो, मगर पहले हमारे लिए ये जानना ज़रूरी है कि अमरीका में अमीरों और ग़रीबों के बीच फ़ासला कितना है. फिर इस जानकारी का हम क्या करेंगे, ये हम पर निर्भर करता है.
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