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बीमारी में भी लोग काम पर क्यों आते हैं?
- Author, पीटर रबिंस्टेन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
1993 से अब तक ब्रिटेन में बीमारी में छुट्टी लेने वालों की संख्या लगभग आधी रह गई है.
ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टेटिस्टिक्स के अनुसार पहले सालाना औसत कर्मचारी बीमारी की वजह से 7.2 दिन की छुट्टी लेता था जो 2017 में केवल 4.1 दिन रह गई. लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के डिपार्टमेंट ऑफ़ इंफ़ेक्शियस डीज़ीज़ एपिडेमियोलॉजी की शोध एसोसिएट काइली एन्सलाइ का मानना है कि यह बदलाव चिकित्सा के क्षेत्र में हुई प्रगति की वजह से आया हो, ऐसा मुश्किल ही लगता है. ऐसा नहीं है कि लोग अब कम बीमार पड़ रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि कार्य संस्कृति में आए बदलाव की वजह से ऐसा हो रहा है. इस बदलाव के तहत छुट्टी लेने पर अपने अधिकारी का विश्वास खोना या फिर इसे बहाने के रूप में देखने के कारण बहुत सारे कर्मचारी तब भी काम पर आ रहे हैं जब वे बीमार हैं.
उत्तरी गोलार्ध में दिसम्बर से फ़रवरी के बीच में संक्रमण के कारण होने वाले बुख़ार से कार्यालयों में अनुपस्थिति बढ़ जाती है. ये साल का वह समय होता है जब हवा ठंडी और शुष्क होती है. यही स्थितियां बुख़ार के विषाणु को तेज़ी से फैलाने के लिए आदर्श होती हैं.
डॉक्टरों का मानना है कि बुख़ार के शुरूआती दो दिनों में उसके छुआछूत से फैलने का सबसे अधिक ख़तरा रहता है. इसलिए इस दौरान संक्रमित कर्मचारी तथा उसके सहयोगियों के स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है कि कर्मचारी छुट्टी ले लें.
विशेषज्ञों का कहना है कि कार्य संस्कृति में आने वाले बदलाव के कारण छुट्टी लेने को एक धब्बे के रूप में लिया जाने लगा है.
ब्रिटेन में बीमा प्रदान करने वाली कंपनी एक्सा पीपीपी द्वारा वर्ष 2015 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत कर्मचारी बीमार होने के बावजूद अपने मैनेजर को इस डर से असली वजह नहीं बताते कि उन पर अविश्वास किया जाएगा.
जिन लोगों के मालिक उन पर काम से छुट्टी न करने का दबाव बनाते हैं उन्हें अपने स्वास्थ्य तथा अपनी उत्पादकता के साथ-साथ अपने सहयोगियों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि किस तरह से अपनी बीमारी की बात अपने अधिकारियों को बताई जाए.
बीमारी का लांछन
तो कुछ बॉस बीमारी को अपराध क्यों मानते हैं?
नई प्रौद्योगिकी और तत्काल जुड़ाव की तकनीकों से कार्य की एक नई संस्कृति उभरी है. कार्य पर निर्भर करते हुए अब यह आवश्यक नहीं है कि कार्य पूरा करने के लिए आप कार्यालय में ही रहें. कई कर्मचारी कार्य पूरा करने के सभी उपकरणों से सुसज्जित होते हैं, जैसे कम्प्यूटर या वाई-फाई और कार्यालय से दूर भी काम कर सकते हैं.
लेकिन इस संस्कृति के साथ भी कुछ ऐसे प्रबन्धकों में अविश्वास भी पैदा हुआ है जो अपने कर्मचारियों पर निगाह नहीं रख पाते.
वाणिज्यिक सम्पदा कंपनी स्टाइल्स कॉर्पोरेशन में मानव संसाधन के उपाध्यक्ष जॉर्ज बाऊ का मानना है कि यह प्रवृत्ति उन लोगों में अधिक है जो पुरानी पीढ़ी के हैं और यह कभी मान ही न पाये कि घर से भी वास्तविक रूप में अच्छी तरह कार्य सम्पन्न किया जा सकता है. अविश्वास और अधिकाधिक उत्पादक की तलाश ने मिलकर कुछ प्रबन्धकों को बीमारी के कारण होने वाली अनुपस्थिति को भी शक की निगाह से देखने के लिए मजबूर किया है.
एक्सा पीपीपी के सर्वेक्षण में केवल 42 प्रतिशत वरिष्ठ प्रबन्धकों में यह सहमति थी कि बुख़ार के कारण छुट्टी ली जा सकती है. 40 प्रतिशत से कम ने पीठ के दर्द या सर्जरी की वजह से छुट्टी लेना उचित बताया.
अध्ययन में यह भी पाया गया कि यदि अनुपस्थिति का कारण मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित हो तो केवल 39 प्रतिशत कर्मचारियों ने अपने बॉस को सही कारण बताया, जबकि शारीरिक स्वास्थ्य के मामले में 77 प्रतिशत ने ऐसा ही किया.
कुछ अन्य कारण
लेकिन, बीमारी में भी काम पर आने के पीछे केवल प्रबन्धन की धारणा ही नहीं है. दरअसल, आधुनिक अर्थव्यवस्था में बहुत सारी ऐसी नौकरियां हैं जो कभी औपचारिक और पूर्णकालिक हुआ करती थीं, अब अंशकालिक रह गई हैं.
एडिनबरा नेपियर यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर पीट रॉबर्टसन ने वर्ष 2017 मे इस संबंध में एकदम सटीक बात लिखी थी.
यूएस ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टेटिस्टिक्स के अनुसार पिछले दो वर्षों में नौकरियां मिलने और छूटने दोनों में बढ़ोतरी देखी गई है. इस बदलाव के कारण कर्मचारी बीमार रहने के बावजूद भी नौकरी पकड़े रहने के लिए काम पर आ रहे हैं.
इस क्रिया को 'प्रेज़ेन्टीज़्म' कहा गया है यानी ऐसे लोग जो बीमारी के बावजूद काम पर आ रहे हों.
प्रेज़ेन्टीज़्म से दिक्क़तें
चार्टर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ पर्सनेल डेवलपमेंट के अनुसार पिछले दशक में प्रेज़ेन्टीज़्म तीन गुना हो गया है. वर्ष 2018 में 1000 प्रतिभागियों से अधिक पर हुए एक अध्ययन के अनुसार 86 प्रतिशत लोगों ने पिछले वर्ष अपने संगठनों में इस समस्या के उदाहरण देखे जो कि 2010 में केवल 26 प्रतिशत थी.
एक्सा पीपीपी के छोटे और मझोले उद्योगों के निदेशक ग्लेन पार्किंसन ने वर्ष 2015 में लिखा था कि प्रबन्धक बीमार कर्मचारियों की दशा समझने की बिल्कुल कोशिश नहीं करते इसलिए कर्मचारियों को बीमारी के बारे में बताने में चिन्ता होती है. मालिकों को बीमार कर्मचारियों पर भरोसा करना चाहिए और जहां भी संभव हो उन्हें घर से काम करने की छूट देनी चाहिए.
प्रेज़ेन्टीज़्म की छूट देना किसी भी कंपनी के लिए इस बात से ज्यादा महंगी साबित होगी कि बीमार लोगों को छुट्टी लेने की छूट देने का माहौल बनाया जाए. मानसिक स्वास्थ्य या अन्य बीमारियों के मामले में शुरूआती दिनों में ही यदि आराम मिल जाए तो बाद में स्वस्थ होने में कम समय लगता है.
पिछले दशक में प्रेज़ेन्टीज़्म तीन गुना हो गया है.
पीट्सबर्ग विश्वविद्यालय के वर्ष 2013 के एक अध्ययन के अनुसार बीमारी में ऑफ़िस में बिताया एक दिन वहां बीमारी के मामले 40 प्रतिशत से बढ़ा सकता है. शोधकर्ताओं ने इस संबंध में पेनसिल्वानिया की एलेघनी काउंटी के 5 लाख से अधिक लोगों पर शोध किया. आंकड़ों में पाया गया कि कुल कर्मचारियों का लगभग साढ़े 11 प्रतिशत कर्मचारियों में बीमारी कार्यस्थल की वजह से आती है.
अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण बात यह पायी गई कि यदि संक्रमण के शुरू के एक या दो दिन घर पर ही रहने की छूट मिल जाए तो एक दिन की छूट पर लगभग 17 हज़ार लोगों में (लगभग 25 प्रतिशत कमी) तथा दो दिन की छूट पर 26 हज़ार लोगों में (लगभग 40 प्रतिशत कमी) संक्रमण से मुक्ति पाई गई.
सीधी बात यह है कि प्रेज़ेन्टीज्म के स्पष्ट फ़ायदे किसी भी कार्यस्थल के लिए हैं. लेकिन जिन जगहों पर ऐसी नीतियां नहीं बनी हैं वहां कर्मचारियों को ही अपने प्रबन्धकों को बीमारी की जानकारी देने के तरीक़े बनाने होंगे जिससे रोज़ का काम बाधिक न हो.
ईमानदारी की नीति
विशेषज्ञों का मानना है कि जितनी जल्दी कोई कर्मचारी अपनी बीमारी के बारे में अपने प्रबन्धक को बता देता है, उतना ही बेहतर है. बीमार पड़ते ही यदि इसकी जानकारी बॉस को दे दी जाए तो न केवल सम्मान बढ़ता है बल्कि प्रबन्धक को कर्मचारी की अनुपस्थिति से निपटने के लिए अधिक समय भी मिल जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि ईमानदारी से किसी भी ग़लतफ़हमी या नाराज़गी से बचा जा सकता है.
इस संबंध में पीट्सबर्ग स्थित एक स्वास्थ्य सेवा कंपनी के विशेषज्ञ मार्क मार्सेन कहते हैं कि सबसे सही तरीक़ा संगठन की नीतियों और तरीक़ों को अपनाना है. झूठ बोलना या बढ़ा-चढ़ाकर बताना बिल्कुल ग़लत है.
मार्सेन ये भी मानते हैं कि प्रबन्धक दो तरह के होते हैं- एक तो वो जो मानते हैं कि कर्मचारी काम नहीं करना चाहते और इसलिए उन्हें नियमों में बांधना पड़ता है. ऐसे प्रबन्धक किसी भी कर्मचारी के बारे में कुछ भी सोच सकते हैं, ख़ासतौर से तब जब छुट्टी लेने के लिए बीमारी को कारण बताया जाए.
दूसरी तरह के प्रबन्धक वो होते हैं जो एक उचित मानक रखते हैं और अपने कर्मचारियों पर विश्वास करते हैं. ऐसे प्रबन्धकों की ही ज़िम्मेदारी होती है कि कार्यस्थल पर एक ऐसी संस्कृति बनाई जाए कि कर्मचारी स्वयं ही विश्वसनीय बन सके. इसके लिए सर्वोत्तम तरीक़ा उदाहरण प्रस्तुत करना है.
इस मामले में एक संतुलित व्यवहार के लिए दोतरफ़ा पहल ज़रूरी है. इसमें कर्मचारी और प्रबन्धक दोनों को ही एक दूसरे की ज़िम्मेदारियां और भलाई के बारे में सोचकर ही काम पर ध्यान देना होगा. विशेष रूप से बुख़ार के मौसम में प्रेज़ेन्टीज़्म की समस्या कम करने के लिए यह ज़रूरी है.
बाऊ कहते हैं, "एक अच्छा बॉस को सहानुभूति रखने वाला और समझदार होना चाहिए. ईमानदारी से एक-दूसरे का ध्यान रखने से बेहतर बॉस और कर्मचारी के बीच कोई और बंधन नहीं होता."
(यह लेख बीबीसी कैपिटल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी कैपिटल के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)
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