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स्वर्ण मंदिर: गुरु अमर दास से लेकर 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' तक, जिसने देखे इतिहास के कई मुश्किल दौर- विवेचना
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
सिखों के तीसरे गुरु अमर दास ने स्वर्ण मंदिर के निर्माण का पहला क़दम उठाया था. पवित्र जल के बीच बने सिख धर्म के इस पवित्रतम स्थान को अपना पूरा आकार लेने में काफ़ी समय लगा. गुरु अमर दास ने इस जगह को वहां की शांति की वजह से चुना था.
मशहूर पत्रकार पतवंत सिंह अपनी किताब 'द सिख्स' में लिखते हैं, "इससे पहले सिख गुरु अपनी पसंद की जगहों पर रहते आए थे. पहले गुरु की पसंद करतारपुर थी, दूसरे गुरु ने खडूर में रहना पसंद किया था जबकि तीसरे गुरु ने गोइंदवाल को अपना निवास स्थान बनाया था."
उन्होंने लिखा, "उस समय लोगों को अंदाज़ा नहीं था कि एक दिन एक सरोवर के किनारे बनी यह जगह सिख धर्म का इतना बड़ा प्रतीक बन जाएगी. तीसरे गुरु के समय में इस जगह पर मिट्टी की एक झोपड़ी हुआ करती थी जहां वे ध्यान और प्रार्थना किया करते थे."
गुरु अमर दास ने सिख धर्म में सामाजिक सुधारों के लिए बहुत काम किया था. उन्होंने न सिर्फ़ सती प्रथा पर रोक लगवाई बल्कि महिलाओं को पर्दा करने से भी रोका.
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उन्होंने विधवाओं को पुनर्विवाह करने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने सिख समाज में पुरुषों और महिलाओं की बराबरी पर भी बहुत ज़ोर दिया.
90 वर्ष से ऊपर की आयु में गुरु अमरदास के देहांत के बाद राम दास को चौथा गुरु बनाया गया.
अन्य धर्मगुरुओं से उलट सिख गुरुओं को रसोई में काम करते, बर्तन धोते, खेतों की जुताई करते, लकड़ी काटते और कई सामुदायिक कामों में हाथ बंटाते देखा जाता था.
गुरु राम दास ने सरोवर और उसके आस-पास की ज़मीन ख़रीदी
जोज़ेफ़ डेवी कनिंघम अपनी किताब 'अ हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स फ़्रॉम द ओरिजिन ऑफ़ द नेशन टु द बैटल्स ऑफ़ द सतलज' में लिखते हैं, "यह स्थान रावी और ब्यास नदियों के बीच में और गोइंदवाल से पचास मील उत्तर-पश्चिम में था. इस बात से आश्वस्त होकर कि यह जगह सिख धर्म का भावी केंद्र बनेगी गुरु रामदास ने 700 रुपये में सरोवर और उसके आसपास की ज़मीन ख़रीद ली."
"यही वह जगह है जहाँ हरमंदिर साहब बनाया गया. शुरू के सालों में इसे कई दूसरे नामों से पुकारा जाता था जैसे गुरु का चक, चक गुरु रामदास और रामदासपुर लेकिन 18वीं सदी की शुरुआत से इसे अमृतसर कहकर पुकारा जाने लगा था. इस शब्द की उत्पत्ति 'अमृत सरोवर' शब्द से हुई थी."
बिना भेदभाव के सबका स्वागत
अमृतसर की महत्ता पांचवें गुरु अर्जन देव के जीवनकाल में और बढ़ी. उनका दौर 25 वर्षों का रहा. उन्होंने अमृतसर को एक तीर्थस्थान से भी बड़ा स्थान बनाया. यह स्थान सिखों को जोड़ने और उनके गौरव का शक्तिशाली प्रतीक बन गया.
इस नगर की आत्मा थी हरमंदिर साहब जिसे दरबार साहब के नाम से भी पुकारा जाने लगा.
पतवंत सिंह लिखते हैं, "सरोवर को गुरु राम दास ने 1577 में चौड़ा करवाया. गुरु अर्जन देव ने इसकी सतह को पक्का करवाया और पानी तक जाने के लिए चारों तरफ़ सीढ़ियां बनवाईं. हरमंदिर साहब का निर्माण शुरू होने से पहले ही सरोवर में नहाने की परंपरा शुरू हो चुकी थी. निर्माण के दौरान सरोवर को खाली और सूखा रखा गया. जब निर्माण पूरा हो गया तब इसमें पानी भरा गया."
खुशवंत सिंह अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स' में लिखते हैं, "आम मंदिरों को ऊंचे चबूतरे पर बनाया जाता था. इसके विपरीत स्वर्ण मंदिर को नीचे बनाया गया, ताकि इसमें प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को नीचे उतर कर जाना पड़े. हिंदू मंदिरों में जहाँ सिर्फ़ एक प्रवेश द्वार होता था, हरमंदिर साहब में चार प्रवेश द्वार बनाए गए. ये चार द्वार हिंदुओं की चार जातियों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों का प्रतिनिधित्व करते थे और बताते थे कि इस मंदिर में सभी जाति के लोगों का बिना भेदभाव के स्वागत है. इसकी वास्तुकला हिंदू और मुस्लिम शैली का सम्मिश्रण थी."
मंदिर निर्माण के लिए आमदनी का 10वां हिस्सा
स्वर्ण मंदिर परिसर को किसी एक वास्तुकार ने डिज़ाइन नहीं किया था और न ही इसे एक बार में बनाया गया था.
यह परिसर कई शताब्दियों में बनकर तैयार हुआ और इसमें कई पीढ़ियों का धन, समय और भक्ति लगी.
खुशवंत सिंह लिखते हैं, "गुरु अर्जन देव को मंदिर निर्माण के लिए धन की ज़रूरत थी. सभी सिखों से कहा गया कि वह अपनी कुल आमदनी का दसवां हिस्सा गुरु के नाम पर मंदिर निर्माण के लिए दें."
"इस धन से न सिर्फ़ मंदिर का निर्माण शुरू हुआ बल्कि कई सामुदायिक परियोजनाएं भी शुरू की गईं. जब मंदिर का निर्माण पूरा हो गया तो इस स्थान को अमृतसर का नाम दिया गया जिसका अर्थ था अमृत का सरोवर."
गुरु ग्रंथ साहब की स्थापना
सन् 1604 में अकबर की मृत्यु से एक वर्ष पहले पांचवें गुरु अर्जन देव ने इस मंदिर में गुरु ग्रंथ साहब को स्थापित किया. इसको अंतिम रूप सिखों के अंतिम गुरु गोबिंद सिंह ने दिया.
गुरु गोबिंद सिंह ने सन् 1708 में अपनी मृत्यु से पहले अपने अनुयायियों से कहा कि वह गुरु ग्रंथ साहब को अपने सबसे बड़े गुरु के तौर पर देखें.
इस बीच अमृतसर का प्रशासन सिख गुरुओं के हाथ में रहा और वह एक स्वायत्त नगर के तौर पर काम करता रहा.
गुरु अर्जन देव को मृत्यु दंड
सन् 1606 में अकबर की मृत्यु के एक वर्ष के अंदर ही अर्जन देव को अक़बर के बेटे जहांगीर के आदेश पर मृत्युदंड दे दिया गया.
उस ज़माने में भारत आए एक पुर्तगाली पादरी जेरोम ज़ेवियर ने एक पत्र में जहांगीर के फ़ैसले के बारे में लिखा, "जब जहांगीर का बेटा शहज़ादा ख़ुर्रम बग़ावत करके आगरा से भाग रहा था तो वह उस जगह से गुज़रा जहां गुरु रह रहे थे. उनकी ख्याति के बारे में सुनकर शहज़ादा उनसे मिलने चला गया. गुरु ने उसे बधाई दी और उसके सिर पर एक छोटा-सा मुकुट रख दिया."
"जहांगीर को जब ये कहानी पता चली तो उन्होंने गुरु की गिरफ़्तारी का आदेश दे दिया. पहले गुरु पर बड़ा जुर्माना लगाया. जब उन्होंने वह जुर्माना अदा नहीं किया तो उन्हें तरह-तरह की कड़ी यातनाएं दी गईं लेकिन वह गुरु को अपने विचारों से नहीं डिगा सके."
हरमंदिर साहब के प्रबंधक मणि सिंह को मौत की सज़ा
सन् 1738 में हरमंदिर साहब के प्रबंधक मणि सिंह ने अमृतसर में दीवाली मेला आयोजित करने की अनुमति मांगी.
उन्हें इस शर्त पर मेला आयोजित करने की अनुमति दी गई कि वह मेला समाप्त हो जाने के बाद राज्य के ख़ज़ाने में पांच हज़ार रुपए जमा करेंगे. मणि सिंह को उम्मीद थी की श्रद्धालुओं के चढ़ावे से वह उस राशि को जमा कर लेंगे.
सोहन लाल अपनी किताब 'द सीकर्स पाथ' में लिखते हैं, "गवर्नर ज़करिया ख़ां ने व्यवस्था बहाल करने के बहाने से अमृतसर में एक बड़ी फ़ौज भेज दी. इससे श्रद्धालुओं में डर का माहौल फैल गया और मणि सिंह वादा की हुई राशि जमा नहीं कर पाए."
"मणि सिंह को गिऱफ़्तार कर लाहौर लाया गया और मौत की सज़ा सुनाई गई. उन्हें धर्म परिवर्तन कर अपनी जान बचाने का विकल्प दिया गया. उनके अस्वीकार करने पर उन्हें जान से मार दिया गया."
अहमद शाह अब्दाली और सिखों की भिड़ंत
सन् 1757 में अफ़गान शासक अहमद शाह अब्दाली ने स्वर्ण मंदिर पर हमला करके उसे अपवित्र कर दिया. दिल्ली, मथुरा और वृंदावन की लूट के साथ जब अब्दाली वापस लौट रहा था तो सिखों ने उस पर हमला कर दिया.
एचआर गुप्ता अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द सिख्स' में लिखते हैं, "जैसे ही अब्दाली ने सतलज पार की, सिखों ने उस पर हमला बोल दिया. लूट के सामान से लदे और लड़ाई में थक चुके अब्दाली के सैनिक बीस या तीस सिख घुड़सवारों के आगे असहाय हो गए."
"वह अचानक कहीं से प्रकट हो जाते और अब्दाली के सैनिकों पर हमला कर जंगलों में गायब हो जाते. अब्दाली के सिंधु नदी के किनारे तक पहुंचने तक ये हमले जारी रहे. अब्दाली को अपने लूट के माल के बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ा. सिखों ने उसके चंगुल से दो हज़ार से अधिक हिंदू महिलाओं को छुड़ाया."
दीप सिंह का बलिदान
अक्तूबर, 1764 को अब्दाली ने सातवीं बार 18 हज़ार सैनिकों के साथ सिंधु नदी पार की. अमीनाबाद में नासिर ख़ां के नेतृत्व में 12 हज़ार बलूच क़बायली भी उनसे आ मिले.
अमृतसर के रास्ते में सिख छापामार उसके सैनिकों को परेशान करते रहे. अफ़गानों ने शहर को घेर लिया.
खुशवंत सिंह लिखते हैं, "जब अफ़गान सैनिक हरमंदिर साहब पहुंचे तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि मंदिर के प्रवेश द्वार पर सिर्फ़ 30 सैनिक उसकी सुरक्षा कर रहे थे. उनका नेतृत्व खेमकरण के गुरबख़्श सिंह कर रहे थे. वह बहादुरी से लड़े लेकिन अफ़गानों की जीत हुई. इस असमान लड़ाई में सभी सिख मारे गए और उनके शवों को पवित्र सरोवर में फेंक दिया गया. एक बार फिर सरोवर में तोड़े गए भवन का मलबा फेंक दिया गया. यह तीसरी बार था जब सिखों के सबसे बड़े धर्मस्थल को अपवित्र किया गया था."
पतवंत सिंह लिखते हैं, "अब्दाली ने हरमंदिर साहब को नष्ट करने और पवित्र सरोवर को अपवित्र करने का आदेश दिया. उसने सिखों के नरसंहार का हुक्म भी दिया. उसने अपने बेटे तैमूर शाह को लाहौर का गवर्नर नियुक्त किया और उसे आदेश दिया कि सिखों को जड़ से उखाड़ फेंका जाए."
अफ़गान सेना के दरबार साहब को नष्ट करने के कुछ दिनों के अंदर ही कुछ सिख इस अपमान का बदला लेने के लिए जमा हो गए. उन्होंने दीप सिंह के नेतृत्व में अफ़गान सैनिकों पर हमला बोल दिया.
पतवंत सिंह लिखते हैं, "सिखों ने आखिरी दम तक अफ़ग़ानों का मुकाबला किया जब तक दीप सिंह घायल होकर गिर नहीं पड़े. उन्होंने पवित्र सरोवर की परिक्रमा पर अपने प्राण त्यागे. दरबार साहब आने वाले तीर्थयात्री अब भी उस स्थान पर रुककर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं."
लाहौर पर सिखों का कब्ज़ा
सन् 1759 में अकाल तख़्त से एक हुकुमनामा जारी करके कहा गया कि दरबार साहब के पुनर्निर्माण के लिए सिख हर जगह से चंदा भेजें.
अगले वर्ष सिखों का सरबत खालसा हुआ जिसमें प्रस्ताव पास किया गया कि खालसा के नाम पर लाहौर पर कब्ज़ा करने के लिए हमला बोला जाएगा.
उसी साल नवंबर में उन्होंने जस्सा सिंह अहलुवालिया के नेतृत्व में लाहौर पर हमला बोल कर उस पर कब्ज़ा कर लिया.
कुछ दिनों बाद जस्सा सिंह लाहौर से हट गए लेकिन हटने से पहले उन्होंने हरमंदिर साहिब की देखभाल के लिए भारी धन वसूल किया.
पतवंत सिंह लिखते हैं, "अप्रैल, 1765 की बैसाखी पर दरबार साहब में फिर एक सरबत खालसा का आयोजन किया गया. एक बार फिर लाहौर पर कब्ज़ा करने का प्रस्ताव पास किया गया. एक त्वरित सैनिक अभियान के बाद 16 अप्रैल, 1765 को सिखों का लाहौर पर कब्ज़ा हो गया. उन्होंने पूरे पंजाब पर अपनी प्रभुसत्ता की घोषणा कर दी. राजनीतिक सत्ता पर अधिकार करने के अवसर पर चांदी के सिक्के जारी किए गए."
महाराजा रणजीत सिंह ने चढ़वाई सोने की परत
सन् 1802 में महाराजा रणजीत सिंह ने स्वर्ण मंदिर में आकर मत्था टेका और प्रण किया कि वह संगमरमर और सोने से इसका पुनर्निर्माण करवाएंगे.
उन्होंने मिस्त्री यार मोहम्मद ख़ां को इसकी छत बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी. उन्होंने इसकी देखभाल के लिए सरदार देसा सिंह मजीठिया को नियुक्त किया.
रणजीत सिंह के सेनापति हरि सिंह नलवा ने अकाल तख़्त के गुंबद पर सोने की परत चढ़वाई.
रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद स्वर्ण मंदिर अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ गया. पंजाब के अंग्रेज़ डिप्टी कमिश्नर ने मंदिर के प्रशासन के लिए अपने लोगों को नियुक्त किया.
सिखों ने मंदिर का प्रशासन उन्हें दिए जाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करने शुरू कर दिए.
19 जनवरी, 1922 को सरकार ने अकाल तख़्त पर जमा बड़ी भीड़ के सामने स्वर्ण मंदिर की चाबियां सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार खड़क सिंह को सौंप दीं.
अब भी करीब डेढ़ लाख लोग रोज़ इस मंदिर में आते हैं. यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित कर रखा है.
आज़ादी के बाद सन् 1984 में स्वर्ण मंदिर भारत सरकार और भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख अलगाववादियों के संघर्ष का केंद्र बना, उस कठिन दौर से उबरने में पंजाब को कई साल लगे.
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