ईरान ने 'अस्तित्व की लड़ाई' में सऊदी अरब के साथ हुए इस अहम समझौते को कुर्बान कर दिया

    • Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
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पिछले साल जून में अमेरिका के ईरान के परमाणु ठिकानों पर किए गए हमले के बाद सऊदी अरब ने न केवल ईरान को अपना 'भाईचारा वाला देश' कहा, बल्कि हमलों की निंदा करते हुए इसे ईरान की संप्रभुता का उल्लंघन भी बताया था.

एक्सपर्ट्स ने सऊदी अरब की प्रतिक्रिया को ईरान और सऊदी के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक "सकारात्मक" और "बड़ा कदम" बताया था.

लेकिन महज नौ महीने बाद सऊदी विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान ईरान को चेतावनी दे रहे हैं कि "तनाव का जवाब तनाव से दिया जाएगा" और दोनों देशों के बीच विश्वास का रिश्ता अब "टूट चुका है."

बीते तीन हफ्ते में ईरान ने अमेरिका-इसराइल के हमलों के जवाब में सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों पर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं.

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ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची ने दलील दी है कि ये मिसाइल हमले इस्लामिक देशों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि इन देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों और प्रतिष्ठानों पर किए जा रहे हैं.

ईरान के किए गए इन मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण, सऊदी अरब और ईरान के बीच 2023 में चीन की मध्यस्थता से हुआ सुलह समझौता, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों को बहाल करना और धीरे-धीरे तनाव को कम करना था, अब समाप्त हो गया है.

सऊदी अरब के विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान का 19 मार्च को दिया गया बयान ईरान के प्रति सऊदी अरब के हालिया रुख़ में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इसके कई अन्य कारण भी हैं.

पिछले साल ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी हमलों के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने आठ साल में पहली बार अमेरिका का दौरा किया.

राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में सऊदी-अमेरिकी संबंध तनावपूर्ण हो गए थे. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में सऊदी क्राउन प्रिंस की अमेरिका यात्रा को संबंधों की नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है.

हालिया मिसाइल हमलों के बाद ईरान और सऊदी अरब के बीच मौजूदा संघर्ष ऐसे समय में सामने आया है जब सऊदी अरब पर विजन 2030 के तहत अपनी सामाजिक और आर्थिक सुधार योजना के वादों को पूरा करने का दबाव बढ़ रहा है.

क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता की योजना, विजन 2030 की सफलता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं. इसलिए सऊदी अरब के सामने ईरान को नियंत्रित करने की अपनी इच्छा और क्षेत्रीय संघर्ष को नियंत्रित करने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है, ताकि वर्तमान स्थिति का उसकी दीर्घकालिक योजना पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सके.

पश्चिमी मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोहम्मद बिन सलमान ने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ हाल ही में हुई टेलीफोन बातचीत में ईरान के ख़िलाफ़ जारी अमेरिकी हमलों का समर्थन किया.

हालांकि, यह जानकारी सऊदी अरब के आधिकारिक रुख़ से मेल नहीं खाती, जो ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी और इसराइली सैन्य अभियानों का विरोध करता प्रतीत होता है.

जनवरी 2026 में सऊदी क्राउन प्रिंस ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान को बताया था कि सऊदी अरब ने संयुक्त राज्य अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिए अपने क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था.

ये एक ऐसा रुख़ था जिसकी पुष्टि सऊदी विदेश मंत्री ने भी हाल ही में एक बयान में की थी.

सऊदी अरब का रुख़ सख्त हुआ

हालांकि अब ईरान के प्रति सऊदी अरब का आधिकारिक रुख़ सख्त हो गया है. फिर भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सऊदी अरब और ईरान दोनों ही कम से कम बयानबाज़ी कर राजनयिक लचीलापन बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.

सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए यह कहने से परहेज किया कि ये मिसाइलें ईरान ने दागी थीं.

वहीं, सऊदी अरब में ईरान के राजदूत अलीरेज़ा एनायती ने भी हाल ही में उन खबरों का खंडन किया है जिनमें कहा गया था कि सऊदी अरब के तेल ठिकानों को ईरानी मिसाइलों से निशाना बनाया गया था.

ईरानी राजदूत ने रॉयटर्स को यह भी बताया कि वह सऊदी अधिकारियों के संपर्क में हैं और कई मामलों में संबंध "आगे बढ़ रहे हैं."

फ़ैसल बिन फ़रहान का 19 मार्च का बयान ईरान के सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और क़तर में ऊर्जा संयंत्रों को निशाना बनाने की धमकी देने के एक दिन बाद आया.

उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ईरान अब चीन की मध्यस्थता वाले समझौते को व्यवहारिक नहीं मानता था.

सऊदी विदेश मंत्री ने कहा था, 'ईरान कभी भी सऊदी अरब का रणनीतिक साझेदार नहीं रहा है और अगर वह क्षेत्रीय वर्चस्व की अपनी विचारधारा और बल प्रयोग की नीति को त्याग देता है तो वह रणनीतिक साझेदार बन सकता है.'

रियाद में अरब और मुस्लिम विदेश मंत्रियों की एक आपातकालीन बैठक के बाद फ़ैसल बिन फ़रहान पत्रकारों से बात कर रहे थे, जिसमें ईरान से खाड़ी देशों के ख़िलाफ़ अपने हमलों को तुरंत रोकने का आह्वान किया गया था.

ईरान के शुरुआती हमलों के जवाब में सऊदी अरब ने 28 फ़रवरी को एक बयान जारी कर उन्हें "कायरतापूर्ण" बताया. साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि ईरानी अधिकारी इस बात से भली-भांति अवगत थे कि सऊदी अरब ने अपने हवाई क्षेत्र और ज़मीन को ईरान को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था.

चीन ने पिछले साल दिसंबर में तेहरान में सऊदी अरब, ईरान और बीजिंग के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक में भाग लिया था, जो इस समझौते के अस्तित्व के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का संकेत था, लेकिन उसने इसके संभावित अंत के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम कहा है.

मौजूदा संघर्ष में हूती विद्रोही कहां खड़े हैं?

पिछले तीन सालों में, ईरान के बारे में सऊदी आधिकारिक बयानों और राज्य के प्रमुख मीडिया आउटलेट्स के लेखों से स्पष्ट संकेत मिले हैं कि चीन की मध्यस्थता से किया गया 2023 का समझौता कमज़ोर नींव पर बना था.

समझौते पर हस्ताक्षर होने के तुरंत बाद, ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच सभी विवाद हल हो गए हैं. वहीं सऊदी मीडिया में भी इसी तरह की संशयपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित हुईं.

विश्वास कायम करने के लिए किए गए इन राजनयिक प्रयासों के बावजूद सऊदी अरब, ईरान को संदेह की नज़र से देखता रहा.

समझौते के तहत, दोनों देशों ने एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने पर सहमति जताई थी. यह मुद्दा सऊदी अरब के लिए विशेष रूप से विवादास्पद साबित हुआ है, क्योंकि उसका मानना ​​है कि ईरान अभी भी प्रॉक्सी समूहों का समर्थन कर रहा है और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा कर रहा है.

अपने ताज़ा बयान में, सऊदी के विदेश मंत्री ने कहा कि ईरान के "विरोधाभास" तेहरान के साथ रियाद के संबंधों में एक ऐतिहासिक चुनौती रहे हैं और उन्होंने यमन में हूती विद्रोहीयों जैसे क्षेत्रीय समूहों के लिए ईरान के समर्थन से बार-बार इनकार करने पर भी शिकायत की.

उनके मुताबिक, ईरान को "अपराध करने और फिर उन्हें नकारने" की आदत हो गई है.

सऊदी अरब ने 2015 में पड़ोसी यमन में शिया विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक लंबा और खर्चीला सैन्य अभियान शुरू किया. जिसके दौरान हूती लड़ाकों के समूह ने सीमा पार हमलों में अरामको तेल फेसिलिटीज़ और सैन्य बुनियादी ढांचे सहित विभिन्न स्थलों को निशाना बनाया.

हालांकि सऊदी अरब ने 2023 में यमनी विद्रोही समूह के साथ ऐतिहासिक वार्ता की मेजबानी की थी. लेकिन मौजूदा संघर्ष की शुरुआत के बाद से दोनों पक्षों के बीच शत्रुता फिर से उभर कर सामने आई है और इसमें काफी बढ़ोतरी हुई है.

हालिया संघर्ष के दौरान हूती लड़ाकों ने अभी तक ईरान के समर्थन में कोई कार्रवाई नहीं की है.

लेकिन इस महीने की शुरुआत में एक प्रमुख यमनी मीडिया आउटलेट की एक रिपोर्ट में एक ईरानी अधिकारी द्वारा मीडिया को दिए गए बयान का हवाला दिया गया था, जिसमें संकेत दिया गया था कि ईरान विद्रोहियों को लाल सागर में रणनीतिक बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर हमले फिर से शुरू करने के लिए तैयार कर सकता है.

यह वही बाब अल-मंडेब है जिसे ग़ज़ा संघर्ष के बाद हूती विद्रोहियों ने अमेरिकी और इसराइली जहाज़ों के लिए बंद घोषित कर दिया था.

ईरान की रणनीति

ईरान ने इस क्षेत्र में अपने अभियान के दौरान सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को जानबूझकर ख़तरे में डाला है.

28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से, ईरानी अधिकारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे हर जगह अमेरिकी और इसराइली ठिकानों और हितों को निशाना बनाएंगे.

वास्तविकता यह है कि खाड़ी देशों को निशाना बनाने का ईरान का प्रयास जटिल और व्यापक रहा है. जिसमें अमेरिकी हवाई अड्डों से लेकर नागरिक बुनियादी ढांचे और ऊर्जा सुविधाओं तक को शामिल किया गया है. जिसके कारण ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि हुई है और इसका उद्देश्य अमेरिका पर युद्ध से पीछे हटने के लिए दबाव डालना है.

ईरान ने अपने बयानों में सऊदी अरब को सीधे तौर पर निशाना नहीं बनाया है, लेकिन सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य अड्डों और संपत्तियों की मौजूदगी ईरान की नज़र में इसे एक वैलिड टारगेट बनाती है.

ईरान लंबे समय से इस क्षेत्र से अमेरिकी उपस्थिति को हटाने की कोशिश कर रहा है.

और सऊदी अरब अपने विशाल ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर्स के कारण ईरानी मिसाइलों और ड्रोन के लिए एक आसान लक्ष्य बन गया है. हालांकि ईरानी सैन्य अधिकारियों ने बार-बार ज़ोर देकर कहा है कि इन सुविधाओं पर हमले वास्तव में इसराइली "प्रौपेगेंडा" अभियानों का परिणाम हैं.

ईरान के लिए सऊदी अरब अब एक व्यापक और बेहद खतरनाक क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा बन गया है. जिसका उद्देश्य तेल और गैस की कीमतों को बढ़ाने और ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध रोकने के लिए ट्रंप पर दबाव बढ़ाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाना है.

खाड़ी देशों ने इस बात से इनकार किया है कि उनकी भूमि या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए किया जा रहा है. लेकिन वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट किया है कि यह पूरी तरह से संभव है कि खाड़ी देशों के क्षेत्र का इस्तेमाल अमेरिकी मिसाइल हमलों के लिए किया जा सकता है.

सऊदी अरब के साथ ईरान के संबंध वर्तमान में उन अनगिनत बलिदानों में से एक हैं जिन्हें वह अपने अस्तित्व की लड़ाई में एक शक्तिशाली दुश्मन के ख़िलाफ़ लड़कर कर रहा है.

सऊदी अरब के साथ बिगड़ते संबंधों को लेकर कुछ ईरानी अधिकारी भी नाराज़ हैं. खासकर राष्ट्रपति ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान जिन्होंने हमलों के लिए माफ़ी मांगी और कहा कि अगर ईरान पर हमलों में खाड़ी देशों की ज़मीन का इस्तेमाल नहीं किया गया तो उन पर हमले बंद हो जाएंगे.

हालांकि, खाड़ी देशों के साथ ईरान का तनाव समय के साथ कम नहीं हुआ. ईरान के कट्टरपंथी गुटों ने तुरंत इस संदेश को खारिज कर दिया और अंततः राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान को अपने बयान पर स्पष्टीकरण देने के लिए मजबूर होना पड़ा.

ईरान में कूटनीति अब हाशिए पर चली गई है और आने वाले दिनों में भी ऐसा ही रहेगा क्योंकि इसराइल, ईरानी नेताओं को निशाना बना रहा है, जिससे प्रमुख निर्णयों की शक्ति इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के हाथों में जा रही है.

सऊदी अरब और क्षेत्र के अन्य देशों के संबंध में, ईरान के रवैये को ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व सचिव अली लारिजानी के अपनी मृत्यु से एक दिन पहले मुस्लिम देशों को लिखे एक खुले पत्र में व्यक्त किए गए शब्दों में संक्षेप में बताया जा सकता है.

उन्होंने इस संघर्ष को एक तरफ ईरान, मुस्लिम देशों और "प्रतिरोध की धुरी" और दूसरी तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल के बीच बताया और पूछा था, "तो आप किस पक्ष का साथ देंगे?

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