ईरान की मिसाइलें क्या यूरोप तक पहुंच सकती हैं?

    • Author, निक एरिक्सन
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया द्वीप पर स्थित अमेरिका-ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे की ओर लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. ईरान की इस कार्रवाई को मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बढ़ने का संकेत माना जा रहा है.

हालांकि निशाने पर लिए गए ठिकानों पर हमला नहीं हो सका, लेकिन इसराइल डिफ़ेंस फोर्स का कहना है कि युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार इस तरह की लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया है.

ईरान ने अब तक आधिकारिक रूप से मिसाइल दागने की पुष्टि नहीं की है और ईरानी मीडिया ने अपनी रिपोर्टिंग में ज्यादातर विदेशी स्रोतों का हवाला दिया है.

विशेषज्ञ अब इस असफल हमले के प्रभावों का आकलन कर रहे हैं, जिसमें यह भी शामिल है कि इसका संभावित लक्ष्यों के दायरे पर क्या असर पड़ सकता है.

क्या भविष्य में बर्लिन, पेरिस और लंदन जैसे यूरोप के शहर भी निशाने पर आ सकते हैं?

ब्रिटेन के एक कैबिनेट मंत्री ने कहा है आईडीएफ़ के इस दावे की पुष्टि करने के लिए "कोई ठोस आकलन नहीं है" कि ईरान के पास लंदन तक पहुंचने वाली लंबी दूरी की मिसाइलें हैं.

ईरान ने अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता (रेंज) पर खुद एक सीमा तय कर रखी थी, हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि अब इसमें बदलाव हो चुका है.

बीबीसी न्यूज़ पर्शियन की गोनचेह हबीबियाज़ाद कहती हैं, "ईरान का मिसाइल कार्यक्रम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय जांच का केंद्र रहा है. ईरान इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि उसका मिसाइल विकास कार्यक्रम पूरी तरह रक्षात्मक है और राष्ट्रीय प्रतिरोध (डेटरेंस) की रणनीति पर आधारित है, वहीं आलोचकों का कहना है कि लंबी दूरी की क्षमताओं में ये बढ़ोतरी क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को बदल सकती है."

अभी एक महीना भी नहीं हुआ है जब ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को लेकर जताई जा रही चिंताओं को दूर करने के लिए बातचीत चल रही थी, और आगे भी वार्ता के दौर होने की संभावना थी, तभी इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला शुरू कर दिया.

चागोस द्वीपसमूह, जिसमें डिएगो गार्सिया शामिल है ईरान से लगभग 3,800 किलोमीटर दूर स्थित है.

'वॉल स्ट्रीट जर्नल' और सीएनएन ने अज्ञात अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बैलिस्टिक मिसाइल दागे जाने की ख़बर दी, लेकिन कहा कि कोई भी हथियार अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचा.

रिपोर्ट के मुताबिक़, एक मिसाइल कथित तौर पर उड़ान के दौरान ही विफल हो गई, जबकि दूसरी को एक अमेरिकी युद्धपोत ने बीच में ही मार गिराया. बीबीसी समझता है कि ये रिपोर्टें सही हैं.

घटना के तुरंत बाद, इसराइल डिफेंस फ़ोर्स ने कहा कि अब यूरोप, एशिया और अफ़्रीका के कई शहर ख़तरे में हैं. ये भी कहा कि उसने पिछले साल ही बता दिया था कि ईरान ऐसी क्षमताओं वाली मिसाइलें विकसित करने का इरादा रखता है.

आईडीएफ़ के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़, लेफ्टिनेंट जनरल एयाल ज़मीर ने चागोस द्वीपसमूह की ओर मिसाइल दागे जाने के बाद एक वीडियो संदेश में कड़ी चेतावनी दी.

उन्होंने कहा, "ईरान ने 4,000 किलोमीटर की रेंज वाली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल दागी हैं. इन मिसाइलों का उद्देश्य इसराइल को निशाना बनाना नहीं था. इनकी रेंज यूरोप की राजधानियों तक पहुंचती है. बर्लिन, पेरिस और रोम सभी सीधे ख़तरे के दायरे में हैं."

अन्य विशेषज्ञों में ब्रिटेन के ज्वाइंट फोर्सेज कमांड के पूर्व प्रमुख और रक्षा विशेषज्ञ जनरल सर रिचर्ड बैरन्स शामिल हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि इस घटना ने ईरान के मिसाइल भंडार और उसकी पहुंच को लेकर नए सिरे से आकलन करने को मजबूर कर दिया है.

उन्होंने कहा, "पहले हम मानते थे कि ईरान की मिसाइलों की रेंज 2,000 किलोमीटर है, जबकि डिएगो गार्सिया 3,800 किलोमीटर दूर है."

ईरान अब तक कहता रहा है कि उसने अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर खुद एक सीमा तय कर रखी थी, जिसके तहत उनकी मारक क्षमता 1,240 मील (2,000 किमी) तक सीमित थी.

इसका मतलब था कि ईरान की मिसाइलों की पहुंच में इसराइल तो था, लेकिन यूरोप नहीं.

हाल के हमले में मारे गए आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने 2021 में कहा था कि यह एक राजनीतिक निर्णय था न कि मिसाइल निर्माण में किसी तकनीकी बाधा के कारण और यह फ़ैसला सैन्य नेताओं तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आई) के विरोध के बावजूद लिया गया था.

उनका उद्देश्य इसराइल के ख़िलाफ़ ख़तरे को बनाए रखना था, लेकिन यूरोप को चिंता में डालना नहीं था, क्योंकि यूरोप तेहरान के निशाने पर नहीं था.

हालांकि, पिछले साल सितंबर में एक ईरानी सांसद ने सरकारी टीवी पर कहा था कि आईआरजीसी ने सफलतापूर्वक एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया है, हालांकि उन्होंने उसकी रेंज के बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी.

मिसाइल रेंज क्षमता

इसके अलावा, अमेरिकी अधिकारी लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जरिए ऐसी तकनीक विकसित की गई है, जिससे वह अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें बना सकता है.

'टाइम्स ऑफ़ इसराइल' के मुताबिक़ ज़रूरत पड़ने पर ईरान इस तकनीक का उपयोग कर सकता है.

कुछ विश्लेषक भी इससे सहमत हैं. लंदन स्थित रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की पूर्व महानिदेशक डॉ. कैरिन वॉन हिप्पेल ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "यदि यह माना जाए कि मिसाइलें डिएगो गार्सिया तक पहुंच सकती हैं..तो ईरान ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें भी विकसित कर रहा है, जिनकी रेंज 10,000 किलोमीटर तक हो सकती है, हालांकि हमने अभी तक की सैन्य कार्रवाई में इन्हें नहीं देखा है."

इसका मतलब यह होगा कि ईरान से दागी गई मिसाइलें संभावित रूप से अमेरिका के मुख्य भूभाग तक भी पहुंच सकती हैं.

अब पर्यवेक्षकों का कहना है कि हिंद महासागर में प्रस्तावित हमले से यह संकेत मिलता है कि ईरान ने पहले जो सीमा तय की गई थी, वह अब हटा दी गई है.

लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि यह संदेहास्पद है कि मिसाइलें अपने निर्धारित लक्ष्य तक पहुंच पातीं, भले ही उन्हें पहले ही इंटरसेप्ट न किया गया होता.

ब्रिटेन के हाउसिंग मंत्री स्टीव रीड ने बीबीसी से कहा, "ऐसा कोई ठोस आकलन नहीं है कि ईरान ब्रिटेन को निशाना बना रहा है या फिर वह ऐसा करना भी चाहे तो क्या कर सकता है."

अहम सवाल यह है कि क्या ईरान ने इतनी लंबी दूरी के हमलों को अंजाम देने के लिए जरूरी परिचालन तकनीक में महारत हासिल कर ली है, जिसमें इतनी दूरी पर मिसाइलों को नियंत्रित और निर्देशित करने की क्षमता शामिल है.

इसमें एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी नजर आता है.

कुछ लोगों का मानना है कि ईरान का इरादा कभी भी इन लक्ष्यों पर हमला करने का नहीं था, बल्कि तेहरान एक स्पष्ट चेतावनी और प्रतिरोध (डिटरेंस) का संदेश देना चाहता था.

तेल अवीव स्थित इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज से जुड़े और इसराइल की सैन्य खुफिया एजेंसी के पूर्व अधिकारी डैनी सिट्रिनोविच ने लंदन के 'द इंडिपेंडेंट' अखबार से कहा, "ऐसा नहीं है कि वे सोचते हैं कि कल वे लंदन या पेरिस पर हमला करेंगे, लेकिन मेरे विचार में यह उनके लिए एक और बात है, जिससे वे अपनी जवाबी ताकत और मजबूत करना चाहते हैं."

इस सप्ताह हिंद महासागर में हुई घटनाओं पर इसराइल की प्रतिक्रिया को भी एक तरह की लामबंदी की अपील के रूप में देखा जा सकता है.

यूरोप में नेटो के पूर्व उप कमांडर जनरल सर रिचर्ड शिर्रेफ ने बीबीसी से कहा, "बेशक, इसराइल ऐसा कहेगा क्योंकि उसके हित में है कि युद्ध का दायरा बढ़े और अमेरिका और इसराइल के साथ ज्यादा से ज्यादा अन्य देशों को इसमें शामिल किया जाए."

उन्होंने आगे कहा, "हमें इसका विरोध करना चाहिए. यह ट्रंप का युद्ध है, जिसका कोई स्पष्ट अंत या रणनीति नहीं है, और यह एक दलदल में बदलता जा रहा है. हमें बताया गया था कि छह महीने पहले परमाणु क्षमताओं को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था. इस मामले में वॉशिंगटन से आने वाली किसी भी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)