भारत के लिए क्यों अहम हैं नेपाल के चुनाव?

    • Author, फणीन्द्र दाहाल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज नेपाली
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

नेपाल में पांच मार्च को होने वाले चुनावों से पहले कुछ भारतीय विश्लेषकों ने टिप्पणी की है कि उन्हें यहां किसी को भी बहुमत मिलने की संभावना नहीं दिखती और ज़रूरत पड़ने पर भारत अपनी नीति में बदलाव कर सकता है.

भारतीय सेना के एक रिटायर जनरल ने कहा है कि कुछ सरकारी अधिकारियों ने वामपंथी दलों की सीटों में कमी का विश्लेषण किया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत, जिसने अपनी विदेश नीति में 'पड़ोसी पहले' का सिद्धांत अपनाया है, चुनावों के बाद अपनी नेपाल नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेगा.

उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता में कोई भी दल आए, भारत नेपाल को उसके राजनीतिक बदलाव के दौर में सहयोग करेगा.

वहीं, एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि नेपाल में जो भी दल सत्ता में आएगा, भारत उसके साथ सहयोग करेगा और नेपाल की इच्छा के अनुसार 'शांति, विकास और स्थिरता' के लिए मदद करेगा.

हाल के वर्षों में, नेपाल में राजशाही के साथ एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग बढ़ रही है, जबकि भारत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर झुकाव रखने वाली आबादी का एक वर्ग इस मुद्दे के प्रति सहानुभूति रखता है.

हालांकि, भारतीय अधिकारी इन मुद्दों से खुद को दूर रखने की कोशिश करते दिख रहे हैं, और जैसे-जैसे मतदान की तारीख क़रीब आ रही है, भारत नेपाली सरकार को चुनाव कराने के लिए आवश्यक साजोसामान मुहैया करा रहा है.

नेपाल में पिछले साल सितंबर महीने में जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार गिर गई थी और वहां चुनाव की ज़रूरत पड़ी.

क्या कह रहे हैं भारतीय जानकार

कुछ दिन पहले, भारत के मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान की वेबसाइट पर नेपाल के चुनाव पर एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसमें विश्लेषण किया गया कि चुनाव में कोई भी पार्टी बहुमत हासिल नहीं करेगी.

इंस्टीट्यूट के रिसर्च फ़ेलो निहार आर. नायक ने लिखा, "किसी भी पार्टी के स्पष्ट बहुमत हासिल करने की संभावना बहुत कम है और चुनाव के बाद (सरकार गठन) की चर्चाएं या तो सीपीएन-यूएमएल या राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसडब्लूपी) पर केंद्रित रहने की उम्मीद है."

इस टिप्पणी में सीपीएन (यूएमएल) को देश भर में एक मज़बूत संगठन और गठबंधन बनाने के अनुभव वाली ताकत के रूप में बताया गया है, जबकि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसडब्लूपी) को युवाओं के बीच में मज़बूत शक्ति बताया गया है.

इस टिप्पणी में कहा गया है कि किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता है तो ऐसी स्थिति में दोनों ही दल गठबंधन बनाकर इसका नेतृत्व करने के प्रयास में दिखाई दे रहे हैं.

भले ही इस साल के चुनाव में नेपाल में किसी एक दल को बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा हो लेकिन यह चुनाव इस बात को तय कर सकता है कि इन दोनों दलों में नेपाल की अगली गठबंधन सरकार पर किसका नियंत्रण होगा.

नेपाल के मामलों पर क़रीबी नज़र रखने वाले भारतीय सेना के सेवानिवृत्तमेजर जनरल अशोक मेहता का कहना है कि आगामी चुनाव से नेपाल के शक्ति समीकरण में उल्लेखनीय बदलाव आने की उम्मीद भारत सरकार के कुछ अधिकारी कर रहे हैं.

घटेंगे कम्युनिस्ट पार्टियों के वोट?

मेहता के विश्लेषण के अनुसार, इस बार के चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है.

अलग-अलग लोगों से बातचीत के बाद उन्हें यह भी लगा कि नेपाली कांग्रेस और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी की सीटें घट सकती हैं.

उनका कहना है, "हालांकि ऐसी बातें सरकार कभी सार्वजनिक रूप से नहीं कहती. लेकिन हमारे विश्लेषण के मुताबिक नेपाल की संसद में पहले लगभग 60 प्रतिशत तक रही कम्युनिस्ट दलों की उपस्थिति इस बार घट सकती है. चुनाव के बाद उनका प्रतिनिधित्व 40 से 47 प्रतिशत तक सीमित रह सकता है."

उन्होंने कहा कि ऐसे परिणाम से भारत और अमेरिका दोनों खुश होंगे और इससे भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती में दिखाई दे रही समस्या को हल करने में भी मदद मिल सकती है.

उन्होंने कहा, "माओवादी और अन्य वामपंथी दल भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की भर्ती के ख़िलाफ़ खड़े होते रहे हैं. यहां यह अपेक्षा है कि अगर गैर-कम्युनिस्ट सरकार बनती है तो वह अग्निवीर योजना को मंजूरी दिलाने में सहूलियत दे सकती है."

'अग्निपथ' योजना के तहत भर्ती होने वाले 'अग्निवीरों' में से 75 प्रतिशत को चार वर्ष की सेवा के बाद एक निश्चित राशि देकर सेवा से बाहर करने का नियम है, जबकि केवल 25 प्रतिशत को ही स्थायी सैन्य सेवा में रखकर पेंशन का लाभ दिया जाएगा. भारत सरकार द्वारा यह नियम लागू किए जाने के बाद से नेपाल इस पर असंतोष जताता रहा है.

जून 2022 में इस योजना के लागू होने के बाद से नेपाल से भारतीय सेना में होने वाली भर्ती स्थगित है.

इतने अहम क्यों हैं इस बार के चुनाव?

नेपाल में भ्रष्टाचार के अंत और सुशासन की मांग को लेकर हुए जेन ज़ी आंदोलन से पैदा हुई असहज परिस्थितियों के बीच प्रतिनिधि सभा चुनाव एलान किया गया था.

इससे पहले ख़बरें आई थीं कि भारत और नेपाल के कुछ साझेदार मित्र देशों का जोर था कि नेपाल में चुनाव पांच मार्च की घोषित तारीख पर ही हो.

औपचारिक चुनावी अभियान शुरू होने से पहले ही आगामी चुनाव को नई और पुरानी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जा रहा है.

ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति संबंध के वाइस प्रेसिडेंट हर्ष वी पंत का मानना है कि जेन ज़ी प्रदर्शनों के दौरान उभरे युवाओं के गुस्से के मद्देनज़र नीतिगत सुधारों के लिहाज़ से यह चुनाव परिणाम महत्वपूर्ण होगा.

उन्होंने बीबीसी नेपाली सेवा को बताया, "मुझे लगता है कि यह बेहद महत्वपूर्ण चुनाव है क्योंकि जेन ज़ी प्रदर्शनों ने राजनीतिक अभिजात्य वर्ग को झटका दिया है. युवाओं ने सड़कों पर जो आक्रोश व्यक्त किया है, उससे ठोस नीतिगत सुधार की एक तरह की अपेक्षा पैदा हुई है. राजनीतिक सुधार, चुनावी प्रक्रिया में सुधार और नीतिगत बदलाव से जुड़े होने के कारण इस चुनाव का परिणाम अहम रहेगा."

उन्होंने आगे कहा, "आखिरकार केवल निर्वाचित सरकार ही इन सुधारों के लिए कदम उठा सकती है. सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार ने कुछ पहल की है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता केवल नई निर्वाचित सरकार से ही आएगी. मेरा मानना है कि जब नई सरकार ज़िम्मेदारी संभालेगी, तब नीतियां तय करते समय उस दौरान उठे मुद्दों पर ज़रूर विचार किया जाएगा."

सोशल मीडिया साइट्स पर प्रतिबंध के बीच युवाओं ने पिछले साल सितंबर में भ्रष्टाचार को ख़त्म करने और सुशासन की मांग को लेकर राजधानी में व्यापक प्रदर्शन किया. विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली से कम से कम 19 लोगों की मौत हो गई. हालात पर नियंत्रण लाने में विफल रहने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया था.

ओली सहित कई प्रमुख दलों के नेताओं को सेना के हेलीकॉप्टर से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था. उस समय दो दिनों में कुल 77 लोगों की मौत हुई थी और 84 अरब रुपये से अधिक की संपत्ति को क्षति हुई थी. उसी राजनीतिक संकट के बीच सुशीला कार्की के नेतृत्व में बनी सरकार ने प्रतिनिधि सभा को भंग करते हुए चुनाव कराने की सिफ़ारिश की थी.

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के नेपाल अध्ययन केंद्र से जुड़े एक प्रोफ़ेसर एनपी सिंह का मानना है कि विशेष परिस्थितियों में हो रहा यह चुनाव इस बार 'निर्णायक' साबित हो सकता है.

उन्होंने कहा, "नेपाल में दलों ने पिछले 17-18 वर्षों में केवल अपने निहित स्वार्थों पर ध्यान दिया. पांच महीने में एक सरकार और उसके पांच महीने बाद दूसरी सरकार बनने जैसी स्थिति थी. लोकतंत्र को संभाल पाना मुश्किल हो गया था."

उन्होंने कहा, "बड़े विध्वंस के बाद यह चुनाव हो रहा है, इसलिए यह निर्णायक दिखता है. जनता को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उनके सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध दल ही निर्वाचित हों. सरकार के ख़िलाफ़ ही विद्रोह हुआ था, इसलिए नागरिकों का सरकार पर भरोसा कायम होना ज़रूरी है. ऐसा नहीं हुआ तो लोकतंत्र टिक नहीं सकेगा."

चुनाव को स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में बताते हुए भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि निर्वाचित सरकार नेपाल और भारत दोनों के हित में है.

भारतीय सेना के एक अन्य सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसबी अस्थाना ने कहा, "भारत ने हमेशा किसी भी पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई है और इसी वजह से मुझे लगता है कि प्रदर्शनों के बावजूद आधिकारिक तौर पर (नेपाल के बारे में) ज्यादा बयान नहीं दिए गए हैं."

उन्होंने कहा, "हम स्थिरता वाला नेपाल चाहते हैं और वहां लोकतांत्रिक तरीके से सरकार बनते देखना चाहते हैं. लेकिन संबंध आगे कैसे बढ़ेंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सत्ता में कौन आता है और उसका झुकाव किस दिशा में है."

भारत की नेपाल नीति

साल 2006 में हुए दूसरे जनआंदोलन के बाद भारत ने राजशाही और संसदीय बहुदलीय व्यवस्था को साथ लेकर चलने वाली 'ट्विन पिलर' नेपाल नीति को त्याग दिया था.

साल 2008 में नेपाल की संविधान सभा द्वारा राजशाही को औपचारिक रूप से समाप्त किए जाने के बाद के वर्षों में नेपाल में अब तक 15 बार सरकार बन चुकी है.

नेपाल की शांति प्रक्रिया और विभिन्न समय पर हुए आंदोलनों का समर्थन करने वाला भारत यह कहता रहा है कि वह 'स्थिर और समृद्ध' नेपाल देखना चाहती है.

ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति संबंधी उपाध्यक्ष हर्ष वी पंत का मानना है कि चुनाव के बाद सत्ता में आने वाले किसी भी पक्ष के साथ भारत सहयोग करेगा और दिल्ली की नेपाल नीति में कोई खास बदलाव नहीं होगा.

उन्होंने कहा, "नेपाल की घरेलू राजनीति ऐसी चीज नहीं है जिसे भारत नियंत्रित कर सके. एक मित्रवत पड़ोसी के नाते भारत की भूमिका नेपाली नागरिकों के जनादेश से बनी सरकार के साथ काम करने की रहेगी. नेपाल एक ट्रांजिशन से गुजर रहा है और उसमें भारत सहयोग करता रहेगा."

उन्होंने कहा कि नेपाल की पुरानी राजनीतिक शक्तियों को नई शक्तियाँ बुनियादी तौर पर चुनौती दे रही हैं, लेकिन अभी तक नई पीढ़ी के नेतृत्व का स्पष्ट उदय नहीं हो पाया है.

भारत यह देखना चाहता है कि नेपाल अपने निश्चित हितों पर ध्यान दे.

उन्होंने कहा, "इमिग्रेशन, सीमा या संसाधनों के प्रबंधन जैसे मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं. ये मुद्दे पहले भी थे और आगे भी रहेंगे. दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध हैं और उनका भविष्य भी साझा है. आपसी संबंधों के व्यापक भविष्य को नुकसान पहुंचाए बिना विवादों या मतभेदों का प्रबंधन किया जाना चाहिए. मुझे उम्मीद है कि ऐसा ही होगा."

हर्ष वी पंत का मानना है कि यदि चुनाव के बाद भी कमजोर सत्ता गठबंधन बनता है तो हाल के समय में नेपाल-भारत संबंधों में जो उतार-चढ़ाव देखे गए हैं, वे जारी रह सकते हैं.

उन्होंने कहा, "अगर चर्चा के अनुसार गठबंधन की सरकार बनती है, लेकिन गठबंधन के भीतर कलह या जेन ज़ी आंदोलन के एजेंडे को आगे बढ़ाने में विफल रहने के कारण वह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाती, तो नेपाल-भारत संबंधों में पहले जैसी हलचल फिर दिख सकती है. देश के भीतर स्पष्ट और स्थिर निर्णय लेने वाली सरकार न बनने की स्थिति में विदेश नीति भी अस्थिर हो सकती है."

क्या है भारत की रणनीति?

नेपाल की खुली सीमा तीन दिशाओं में भारत के पाँच अलग-अलग राज्यों से जुड़ी है. उत्तर में तिब्बत के पठार से सीमा जुड़ने के कारण नेपाल की रणनीतिक भू-राजनीतिक स्थिति और यहाँ बढ़ते दिख रहे चीनी प्रभाव को लेकर पश्चिमी देश भी रुचि दिखाते रहे हैं.

साल 2017 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल की सरकार के दौरान नेपाल चीन की परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव (बीआरआई) में शामिल हुआ था. बाद में 2024 के अंत में के पी शर्मा ओली के नेतृत्व में नेपाल ने बीआरआई कार्यान्वयन ढांचे पर हस्ताक्षर किए. दोनों ही समय नेपाली कांग्रेस सत्ता गठबंधन का हिस्सा थी.

बीएचयू के एनपी सिंह का कहना है कि कुछ नेताओं को "चीन की तरफ़ झुका" हुआ देखा जा सकता है.

वह कहते हैं, "जब ओली या प्रचंड की सरकार बनती है, तो वे वैचारिक रूप से चीन के साथ अधिक जुड़ जाते हैं. चीन उन्हें संरक्षण और सहायता देता है. हम कभी यह नहीं कहते कि चीन के साथ संबंध खराब किए जाएँ. लेकिन नेपाल को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि भारत के साथ उसका संबंध ऐसा नहीं है कि हम उसे कर्ज़ के जाल में फँसाएँगे. हम विकास में सहयोगी बनना चाहते हैं. हमारा संबंध ऐसा नहीं है कि हर निर्णय के लिए उन्हें हमेशा हमारी ओर देखना पड़े."

भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसबी अस्थाना का कहना है कि कुछ नेपाली नेताओं के "भारत-विरोधी बयान" सकारात्मक रूप में नहीं लिए जाते और दिल्ली अपने सुरक्षा हितों को लेकर संवेदनशील है.

उन्होंने कहा, "नेपाल का चीन के साथ जैसा संबंध है, उससे अपने आप किसी टकराव की स्थिति पैदा होती है, ऐसा मुझे नहीं लगता. लेकिन यदि वह संबंध हमारे भू-क्षेत्रीय दावे पर अतिक्रमण करता है, तो भारत उसके ख़िलाफ़ खड़ा होगा. चीन के सहयोग से नेपाल में रेलमार्ग निर्माण पर भारत को कोई आपत्ति नहीं होगी. लेकिन यदि नेपाल द्वारा दी गई कोई भी रियायत भारत की सुरक्षा को प्रभावित करती है, तो वहीं हमारी चिंता शुरू होगी."

पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को कुछ भारतीय मीडिया ने "चीन के क़रीबी" नेता के रूप में दिखाया है. सत्ता छोड़ने से पहले चीन की आधिकारिक यात्रा पर गए ओली ने नेपाल द्वारा अपने क्षेत्र के रूप में दावा किए गए लिपुलेख मार्ग से व्यापार शुरू करने को लेकर भारत-चीन सहमति पर गंभीर असहमति जताई थी.

इस बार जारी किए गए चुनावी घोषणापत्रों में भी प्रमुख दलों ने सीमा विवाद सुलझाने से लेकर संतुलित कूटनीतिक संबंध बनाए रखने का वादा किया है.

चीन के साथ हुए कई समझौते लंबित पड़े होने का उल्लेख करते हुए भारतीय सेना के सेवानिवृत्त जनरल अशोक मेहता ने कहा कि भूगोल भारत के पक्ष में है और नेपाल में किसी भी प्रकार की सरकार बनने पर उसे दिल्ली के साथ मिलकर काम करना ही पड़ेगा.

उन्होंने कहा, "नेपाल में चुनी गई कोई भी सरकार यही कहेगी कि वह भारत और चीन के बीच समान संबंध बनाए रखना चाहती है. लेकिन मूल रूप से नेपाल और भारत के बीच का संबंध विशेष प्रकार का है. यह केवल रोटी-बेटी या इतिहास की वजह से नहीं, बल्कि रणनीतिक भूगोल के कारण भी है."

उन्होंने कहा, "नेपाल की कोई भी निर्वाचित सरकार भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए बिना मूल रूप से समृद्ध नहीं बन सकती."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.