You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
भारत के पास इतने दिनों का रणनीतिक तेल भंडार, सरकार ने कहा हालात काबू में
- Author, जैस्मिन निहलानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
भारत के रणनीतिक तेल भंडार सिर्फ़ पांच दिन की मांग पूरी कर सकते हैं, क्योंकि कुल क्षमता का एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा खाली पड़ा है. यह बात बीबीसी के विश्लेषण में सामने आई है.
सरकार ने पिछले साल बताया था कि भारत की कुल भंडारण क्षमता लगभग 74 दिन की है.
कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल (सीएजी) की 2025 में जारी ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक़, इन भंडारण सुविधाओं का सालों से पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ है.
ईंधन की कमी की आशंका ने भारत के कई शहरों में घबराहट में ख़रीदारी को बढ़ावा दिया, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि पेट्रोल और डीज़ल का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है. सरकार ने कहा है कि हालात पूरी तरह से काबू में हैं.
राज्यसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया कि भारत के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडारण है. उन्होंने कहा कि भारत ने कच्चे तेल के आयात को विविध बनाया है और संकट से निपटने के लिए भंडारण को प्राथमिकता दी है.
हालांकि, इसी हफ़्ते पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने राज्यसभा में बताया था कि भारत के कच्चा तेल का भंडार कुल क्षमता का लगभग 64% है.
राज्य सभा में दिए गए जवाब के अनुसार, भारत के पास आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में तीन जगहों पर 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) कच्चे तेल को रणनीतिक भंडार में रखने की क्षमता है.
इसमें से 3.372 एमएमटी अभी भरा हुआ है, यानी क्षमता का एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा खाली है.
इन भंडारों का प्रबंधन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व्स लिमिटेड (आईएसपीआरएल) करती है, जिसे सरकार ने विशेष उद्देश्य के लिए बनाया है.
खाड़ी पर अत्यधिक निर्भरता
भारत हर महीने लगभग 20 एमएमटी पेट्रोलियम उत्पादों का उपभोग करता है, यानी औसतन लगभग 0.67 एमएमटी रोज़ाना.
वर्तमान स्तर पर, रणनीतिक भंडार लगभग पांच दिन के लिए पर्याप्त होगा.
इन रणनीतिक भंडारों के अलावा, सरकार ने पिछले साल राज्यसभा में बताया था कि तेल विपणन कंपनियों के पास 64.5 दिन की मांग के बराबर स्टॉक है. आईएसपीआरएल की कुल 9.5 दिन की क्षमता को मिलाकर भारत की कुल भंडारण क्षमता लगभग 74 दिन की है.
भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और अपनी ज़रूरतों का 88% से ज़्यादा आयात करता है.
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2025 में भारत के कच्चे तेल के आयात का 50% से ज़्यादा हिस्सा मध्य-पूर्व से आया था, मुख्यतः इराक़, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से.
साल 2019 से 2022 के बीच यह निर्भरता 60% से भी ऊपर चली गई थी.
इस भारी निर्भरता को देखते हुए, क्षेत्र में किसी भी तरह की रुकावट आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है.
रणनीतिक भंडार ऐसे ही हालात या अचानक क़ीमतों में उछाल के समय एक सुरक्षा कवच की तरह काम करने के लिए बनाए गए हैं.
रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ट ने बीबीसी से कहा, "हमारे रणनीतिक भंडार काफ़ी कम हैं और जैसा ऊर्जा मंत्री ने कहा कि रणनीतिक व परिचालन भंडार मिलाकर, यह लगभग 74 दिन का है. यह एक कमज़ोरी है क्योंकि हम आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं. समय के साथ, मेरा मानना है कि सरकार ने क्षमता बढ़ाई है और इसे और बढ़ाने की योजना भी है."
भारत की आगे की रणनीति पर वशिष्ठ कहते हैं, "पहला है परिचालन और रणनीतिक भंडार को बढ़ाना. दूसरा है रेन्यूएबल स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाना. तीसरा है अपने घरेलू तेल और गैस क्षेत्र को मज़बूत करना ताकि उत्पादन बढ़ सके."
भंडारण क्षमता का लक्ष्य
इंटीग्रेटेड रिसर्च एंड एक्शन फॉर डेवलपमेंट (आईआरएडीई) के चेयरमैन और पूर्व योजना आयोग सदस्य किरीट पारिख ने भी बीबीसी से कहा, "बेहतर रणनीति यह होगी कि पैसे खर्च करके तेल की मांग को तेज़ी से और बड़े पैमाने पर घटाया जाए… मेरा मानना है कि ऐसे विकल्प मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल करके तुरंत मांग कम की जा सकती है. हम पहले से ही उन पर काम कर रहे हैं. हमें बस इसे और तेज़ करना होगा."
सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया कि भंडारण क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ है.
वित्त वर्ष 2024 में, 3.98 एमएमटी क्षमता वाले भूमिगत चट्टानी गुफ़ाओं में सिर्फ़ 2.91 एमएमटी कच्चा तेल रखा गया था, यानी 27% हिस्सा खाली रहा.
भारत में कच्चा तेल भूमिगत चट्टानी गुफ़ाओं (रॉक केवर्न्स) में रखा जाता है. ये गुफ़ाएं चट्टानों में बनाए गए बड़े कृत्रिम स्थान होते हैं. इन गुफ़ाओं से कच्चा तेल पाइपलाइन के ज़रिए भारतीय रिफ़ाइनरियों तक पहुंचाया जाता है.
ऑडिट ने भंडारण क्षमता बढ़ाने की धीमी प्रगति पर भी सवाल उठाए हैं.
रिपोर्ट में कहा गया, "सरकार/आईएसपीआरएल ने सिर्फ़ 5.33 एमएमटी की भंडारण क्षमता बनाई है, जो (मार्च 2024 तक) 7.88 दिन के आयात को कवर कर सकती है, जबकि फेज़-1 में 19 दिन का आयात कवर करने का लक्ष्य रखा गया था."
बीबीसी ने इस मामले पर आईएसपीआरएल से संपर्क कर उसका पक्ष जानना चाहा लेकिन उनकी ओर से अभी तक जवाब नहीं मिला है. जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
वैश्विक स्तर पर, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) 90 दिन के आयात के बराबर भंडार रखने की सिफ़ारिश करती है.
दिसंबर 2025 तक जापान के पास 208 दिन के आयात को कवर करने वाले भंडार थे, जबकि दक्षिण कोरिया के पास लगभग 200 दिन का स्टॉक था. चीन के बारे में अनुमान है कि उसके भंडार लगभग 120 दिन का आयात कवर करते हैं.
इसके मुकाबले, भारत की कुल भंडारण क्षमता, जिसमें रणनीतिक भंडार और तेल विपणन कंपनियों के स्टॉक दोनों शामिल हैं, काफ़ी कम है- सिर्फ़ 74 दिन.
हालांकि, पारिख के अनुसार बड़े भंडार रखना भी महंगा पड़ता है.
वह कहते हैं, "इस समय, जबकि हम संकट से घिरे हुए हैं, भंडार बढ़ाने का कोई मतलब नहीं है. क्योंकि इस समय यह बहुत महंगा होगा. अगर आप 120 या 110 डॉलर प्रति बैरल की दर से ख़रीद रहे हैं, तो उसे स्टोर करना समझदारी नहीं है. हमें भंडार तब बढ़ाना चाहिए था जब क़ीमतें वाक़ई कम थीं, जैसे साठ डॉलर या उससे कम."
इस स्टोरी की हेडलाइन को संशोधित किया गया है और संदर्भ सहित नई हेडलाइन दी गई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)