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पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच ऐसा क्या हुआ कि पुराने विवाद ताज़ा हो गए
- Author, सौरभ चौहान
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
हिमाचल प्रदेश और पंजाब के रिश्तों में हमेशा एक अपनापन रहा है. दोनों पड़ोसी राज्य अक्सर एक-दूसरे को 'बड़ा भाई' और 'छोटा भाई' कहते आए हैं.
साझा इतिहास, सांस्कृतिक निकटता, व्यापार, रोज़गार और पर्यटन ने इन संबंधों को लंबे समय तक सहज बनाए रखा. लेकिन हाल के दिनों में दोनों राज्यों के बीच एक बार फिर तनातनी का माहौल बनता दिखाई दे रहा है.
सतह पर विवाद टोल शुल्क को लेकर है, लेकिन इसके पीछे कई पुराने और अनसुलझे मुद्दे भी हैं, जो समय-समय पर सामने आते रहते हैं और रिश्तों में खिंचाव पैदा करते हैं.
इस बार विवाद की शुरुआत हिमाचल प्रदेश सरकार के उस फ़ैसले से हुई है जिसमें एक अप्रैल 2026 से राज्य में प्रवेश करने वाले अन्य राज्यों में पंजीकृत वाहनों पर लगने वाली एंट्री फ़ीस में भारी बढ़ोतरी कर दी गई है.
फ़रवरी के मध्य में राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश टोल्स एक्ट, 1975 के तहत 2026–27 की संशोधित टोल नीति अधिसूचित की. इसके अनुसार अन्य राज्यों में पंजीकृत निजी कारों, जीपों और हल्के मोटर वाहनों के लिए प्रवेश शुल्क को 70 रुपये से बढ़ाकर 170 रुपये कर दिया गया है.
मिनी बसों और हल्के कमर्शियल वाहनों के लिए यह शुल्क 320 रुपये तक, तीन एक्सल वाले ट्रकों के लिए 600 रुपये तक, भारी निर्माण वाहनों के लिए 800 रुपये और सात या उससे अधिक एक्सल वाले वाहनों के लिए 900 रुपये तक कर दिया गया है.
हिमाचल में पंजीकृत वाहनों को इस शुल्क से पूरी तरह छूट रहेगी.
हिमाचल सरकार का कहना है कि यह क़दम पर्यटक वाहनों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है, क्योंकि पहाड़ी राज्य की सड़कों और ढांचे पर इसका दबाव बढ़ रहा है.
इसके साथ ही राज्य को अतिरिक्त राजस्व की भी ज़रूरत है. उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने फ़रवरी में ही कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बंद किए जाने से हिमाचल को लगभग 10,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हो रहा है.
ऐसे में राज्य सरकार नए संसाधन जुटाने के उपाय तलाश रही है. सरकार ने टोल संग्रह प्रणाली में सुधार के लिए ई-नीलामी, इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह, सीसीटीवी निगरानी और चरणबद्ध तरीके से फ़ास्ट टैग लागू करने जैसे क़दम भी शुरू किए हैं, ताकि व्यवस्था पारदर्शी और प्रभावी बन सके.
क्यों भड़की पंजाब सरकार
पंजाब में इस फ़ैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई. 11 मार्च 2026 को पंजाब विधानसभा में वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि पंजाब सरकार हिमाचल में पंजीकृत वाहनों पर जवाबी प्रवेश शुल्क लगाने के विकल्प पर विचार कर रही है.
रूपनगर के विधायक दिनेश चड्ढा के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि 'एक राष्ट्र, एक कर' के सिद्धांत के तहत कोई राज्य दूसरे राज्य के वाहनों पर इस तरह का कर नहीं लगा सकता.
उन्होंने आरोप लगाया कि हिमाचल की कांग्रेस सरकार ने प्रवेश शुल्क 70 रुपये से बढ़ाकर 170 रुपये कर दिया है, जबकि बड़ी संख्या में पंजाबी पर्यटक हिमाचल घूमने जाते हैं.
चीमा ने यह भी कहा कि यह फैसला हिमाचल की कमजोर वित्तीय स्थिति को दर्शाता है, जहां कर्मचारियों का महंगाई भत्ता फ़्रीज़ है और नई भर्तियां भी सीमित हैं.
उन्होंने संकेत दिया कि पंजाब सरकार इस मामले के क़ानूनी और प्रशासनिक पहलुओं का अध्ययन कर रही है और ज़रूरत पड़ी तो सीमा क्षेत्रों में स्थानीय निकायों के माध्यम से जवाबी क़दम भी उठाए जा सकते हैं.
अगले ही दिन हिमाचल की ओर से भी प्रतिक्रिया आई. पंजाब सीमा के बिल्कुल नजदीक ऊना ज़िले के कुटलेहर विधानसभा क्षेत्र में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने कहा, "हम पहाड़ी लोग हैं, लेकिन हम किसी से डरते नहीं. किसी को हमें डराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए."
उन्होंने इस मौके पर कई पुराने मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि हिमाचल को भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) से लगभग 5,000 करोड़ रुपये के बकाए मिलने हैं, जबकि मंडी ज़िले की शानन जलविद्युत परियोजना पर भी हिमाचल का दावा है.
उन्होंने यह भी कहा कि चंडीगढ़ में हिमाचल की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन इस पर कभी गंभीर चर्चा नहीं होती.
अग्निहोत्री ने कहा, "हम पंजाब को बड़ा भाई मानते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप विधानसभा में कुछ भी बोलते रहें." उस समय मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी मंच पर मौजूद थे.
पुराने विवाद फिर से ताज़ा हुए
दरअसल, टोल शुल्क का यह विवाद केवल एक प्रशासनिक फ़ैसले तक सीमित नहीं है. दोनों राज्यों के बीच कई पुराने मुद्दे लंबे समय से लंबित हैं. इनमें सबसे प्रमुख है मंडी ज़िले के जोगिंदरनगर में स्थित 110 मेगावाट की शानन जलविद्युत परियोजना.
यह परियोजना 1925 में मंडी रियासत और ब्रिटिश पंजाब के बीच 99 साल की लीज़ पर शुरू हुई थी, जिसकी अवधि 2 मार्च 2024 को समाप्त हो गई. हिमाचल का कहना है कि ज़मीन और पानी दोनों उसके हैं, इसलिए अब परियोजना उसे वापस मिलनी चाहिए.
दूसरी ओर पंजाब का तर्क है कि 1966 के पंजाब पुनर्गठन अधिनियम और 1967 की केंद्र सरकार की अधिसूचना के तहत यह परियोजना उसके अधिकार में है. मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था.
बाद में पंजाब ने सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट में स्थायी रोक की याचिका दायर की, जिसका हिमाचल ने विरोध किया. मामला अभी भी अदालत में लंबित है.
इसी तरह भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड से जुड़ा आर्थिक विवाद भी लंबे समय से दोनों राज्यों के बीच मतभेद का कारण बना हुआ है.
हिमाचल का कहना है कि भाखड़ा, पोंग और ब्यास-सतलुज लिंक परियोजनाओं में उसकी 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी है और इसके आधार पर उसे करीब 5,000 करोड़ रुपये मिलने चाहिए. दिसंबर 2025 में हिमाचल सरकार ने एचपी लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1954 के तहत बीबीएमबी की हाइडिल ज़मीन पर 2 प्रतिशत वार्षिक भूमि राजस्व सेस लगा दिया.
इससे बीबीएमबी पर सालाना लगभग 500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
पंजाब के जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने इसे संघीय ढांचे के ख़िलाफ़ बताते हुए कहा कि इससे पंजाब पर भी लगभग 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा. बीबीएमबी ने भी इस सेस को अवैध करार दिया है.
एक-दूसरे से जुड़ा हुआ इतिहास
राजनीतिक और आर्थिक विवादों के अलावा पिछले वर्ष कुछ सामाजिक घटनाओं ने भी माहौल को संवेदनशील बना दिया था. मार्च 2025 में कुल्लू ज़िले के मनाली और मणिकरण में कुछ पंजाबी पर्यटकों के जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीर वाले झंडे लगाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया था.
कुछ स्थानीय लोगों ने इसे राजनीतिक और अलगाववादी प्रतीक बताया, जबकि सिख समूहों ने इसे धार्मिक प्रतीक कहा. मामला इतना बढ़ गया कि मणिकरण में एक घटना के दौरान एक स्थानीय युवक पर हमले की ख़बर सामने आई.
इसके बाद पंजाब में भी प्रतिक्रिया देखने को मिली. होशियारपुर और अन्य जगहों पर एचआरटीसी बसों पर पोस्टर लगाए गए, अमृतसर बस स्टैंड पर बसों की खिड़कियां तोड़ी गईं और सरहिंद में जालंधर-मनाली बस पर पत्थरबाजी की गई. इसके बाद एचआरटीसी ने सुरक्षा कारणों से पंजाब के लगभग दस रूटों पर बस सेवाएं अस्थायी रूप से बंद कर दी थीं.
हालांकि दोनों सरकारों ने उस समय स्थिति को संभालने की कोशिश की. उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने विधानसभा में कहा था कि निशान साहिब या अन्य धार्मिक झंडों से हिमाचल को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यात्रियों और कर्मचारियों की सुरक्षा सर्वोपरि है.
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी बताया कि उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से इस मुद्दे पर बातचीत की है और पंजाब सरकार ने आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है.
दरअसल, पंजाब और हिमाचल का इतिहास भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है. हिमाचल प्रदेश का गठन 15 अप्रैल 1948 को कई पहाड़ी रियासतों को मिलाकर किया गया था. 1956 में यह केंद्र शासित प्रदेश बना और 25 जनवरी 1971 को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला.
1966 के पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत शिमला, कांगड़ा, कुल्लू, लाहौल-स्पीति और ऊना के कुछ हिस्सों को हिमाचल में शामिल किया गया.
आज दोनों राज्यों के बीच लगभग 400 से 500 किलोमीटर लंबी सीमा है और आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर उनका संपर्क लगातार बना रहता है.
यही कारण है कि कई लोग मानते हैं कि ऐसे विवाद किसी के हित में नहीं हैं.
हिमाचल सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि 'पड़ोसी राज्यों के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन उन्हें सार्वजनिक मंचों पर बयानबाज़ी से आगे बढ़कर बातचीत की मेज पर हल करना चाहिए.'
आख़िरकार सवाल यह नहीं है कि कौन बड़ा भाई है और कौन छोटा, बल्कि यह है कि क्या दोनों राज्य अपने पुराने रिश्ते की समझदारी को बनाए रख पाते हैं या हर नया फैसला एक नए विवाद की शुरुआत बनता रहेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.