You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नोटबंदी- 'आम आदमी और राजनीतिक दल के लिए अलग प्रावधान क्यों?'
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नोटबंदी के दौर में केंद्र सरकार बार बार ये दावा करती रही है कि यह क़दम काले धन पर अंकुश लगाने के लिए उठाया गया है. हालांकि, नोटबंदी के बारे में आदेश लगातार बदले भी गए हैं.
हाल में राजस्व सचिव हंसमुख अधिया ने बयान में कहा- "राजनीतिक पार्टी को उसे दिए गए चंदे पर आयकर क़ानून के तहत छूट मिलती है. अगर किसी व्यक्तिगत ख़ाते में पैसा जमा कराया जाता है, तो उसकी सूचना हमें मिल ही जाती है."
उन्होंने ये भी कहा कि राजनीतिक दल पुरानी करेंसी में मिला चंदा बैंक में जमा करा सकते हैं लेकिन नोटबंदी के बाद पुराने नोटों में चंदा नहीं ले सकते हैं.
उन्होंने कहा कि प्रावधान वही है कि यदि किसी ने 20 हज़ार रुपए से कम चंदा दिया है तो वो कैश में हो सकता है, और यदि रकम इससे ज़्यादा हो तो पार्टी को चंदा देने वाले की पूरी डीटेल रखनी होगी.
इससे आभास ये हुआ कि आम लोग लोग तो अपने अपने बैंक ख़ाते में महज ढाई लाख रूपये तक जमा कर सकते हैं लेकिन राजनीतिक दल कितनी भी रकम जमा करा सकते हैं.
लेकिन इसके बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक दलों को कोई ख़ास छूट नहीं दी गई है और वो पुराने नोटों में डोनेशन नहीं ले सकती हैं.
ये भी बताया गया कि चाहे राजनीतिक दलों को दिए चंदे पर आय कर नहीं लगता, लेकिन आयकर क़ानून में पर्याप्त प्रावधान हैं जिनके तहत राजनीतिक दलों की संपत्ति की पड़ताल हो सकती है.
राजनीतिक दलों के चंदे के बारे में पारदर्शिता के अभाव की बात कई सालों से होती रही है.
कुछ साल पहले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच कमीशन ने संयुक्त अध्ययन में पाया था कि राजनीतिक पार्टियों के चंदे में 75 फ़ीसदी के स्रोत की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है.
बीबीसी ने इस विषय पर दो स्वतंत्र विश्लेषकों से बातचीत की-
जगदीप एस. छोकर (संस्थापक, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफ़ार्म्स)
"आम लोगों के लिए ढाई लाख रूपए पर सवाल पूछा जाएगा लेकिन राजनीतिक पार्टियां जितना पैसा जमा कराना चाहें करा सकती हैं, स्पष्ट नहीं है कि उनसे कोई कुछ पूछेगा या नहीं.
मेरी नज़र में ये संविधान में समानता के अधिकार के तहत अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है. क्या देश में राजनीतिक पार्टियों के लिए एक क़ानून है और बाकी जनता और दूसरी संस्थाओं के लिए दूसरा.
वैसे इस फ़ैसले का इस्तेमाल करते हुए राजनीतिक दलों से जुड़े लोग अपना काला धन सफेद बना सकते हैं.
मान लीजिए कि किसी के पास 20 करोड़ रुपये हैं. यदि वो व्यक्ति पैसा राजनीतिक दलों को देता है, तो हो सकता है कि वो इसे जमा करा दें.
यदि कोई कुछ दिनों बाद सर्विस के नाम पर फर्जी बिल बनाकर पार्टी को देता है तो वो कुछ हिस्सा चेक के माध्यम से आपको लौटा भी सकते हैं और बाक़ी हिस्सा उनके काम आ जाएगा.
पिछले 16-17 सालों का अनुभव बताता है कि सुधार के ख़िलाफ़ राजनीतिक पार्टियां एकजुट हो सकती हैं.
अभी तो ये कहा गया है कि दलों को पैसा जमा कराने की सीमा में छूट है. लेकिन अगर राजनीतिक पार्टियों ने काफ़ी पैसा जमा किया तो बाद में उनसे पूछताछ हो सकती है. आजकल जो आदश दिया जाता है, वो दूसरे तीसरे दिन बदल जाता है.
सरकार जो कह रही है उसको लेकर शंका लगातार बढ़ रही है."
उर्मिलेश, वरिष्ठ पत्रकार
''राजनीतिक दलों की आमदन और खर्चे के ब्योरे पूरी तरह पारदर्शी नहीं होते हैं. पहले एक लिमिट थी 20 हज़ार रूपये तक चंदा लेने की, लेकिन अब किसी भी सीमा तक ले सकते हैं.
वो पैसा कहां से ले रहे हैं, किस तरह से ले रहे हैं, यह चंदा लेने के बहुत सारे मामलों में सार्वजनिक नहीं होता है. चुनाव आयोग अपने लेखा विभाग से इसकी जांच तक नहीं करा सकता है.
अभी तक ये आरोप लग रहे थे कि सरकार के विरोधी राजनीतिक दलों के पास बोरा का बोरा धन पड़ा हुआ है, इसलिए विरोध कर रहे हैं.
अब सवाल ये है कि उनको कोई दिक्कत नहीं होगी. इसका मतलब वो चाहे जितना पैसा बैंक खाते में जमा कर सकते हैं.
ब्लैक मनी को खत्म करने के नाम हुई नोटबंदी लागू है लेकिन राजनीतिक दलों की फंडिंग में इसे लागू नहीं किया गया है.
ऐसे में नोटबंदी का पूरा फैसला देश की आम जनता, किसान, मजूदर, निम्न मध्य वर्ग, नौकरी पेशा लोगों पर ही लागू किया गया है.
राजनीतिक दल तो पहले से ही मालामाल हैं. उन्हें और भी सुविधाएं दे दी गई हैं ताकि कोई उनका बाल बांका नहीं कर सके."
(वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश से बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी की बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)