योगी की 'सख़्ती' में कैसे दिखेगा 'मेड इन इंडिया'!

    • Author, रोहित घोष
    • पदनाम, कानपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार अगर यूं ही बूचड़खाने बंद कराती रही तो प्रदेश के चमड़ा कारखानों में भी शायद जल्द ताले लग जाएं और लाखों लोगों के सामने रोज़ी-रोटी की समस्या खड़ी हो जाएगी. ​

भारत में चमड़े का काम मुख्यतः चार शहरों में होता है- कानपुर, आगरा, कोलकाता और चेन्नई. सबसे बड़ा केंद्र कानपुर हैं जहाँ 400 से ज़्यादा टैनरियां (चमड़ा शोधन कारख़ाना) हैं.

आज की परिस्थिति में टैनरी मालिक हो या कर्मचारी, सभी सहमे हुए हैं.

योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बने एक हफ्ता ही हुआ है और उत्तर प्रदेश में 100 से ज़्यादा बूचड़खाने बंद करवा दिए गए हैं.

चमड़ा उद्योग कच्चे माल के लिए पूरी तरह से बूचड़खानों पर ही निर्भर है.

कानपुर की बड़ी टैनरियों में से एक सुपर टैनरी के निदेशक इमरान सिद्दीकी कहते हैं, "अगर बूचड़खाने नहीं खुले तो टैनरियों में ताले लगने शुरू हो जाएंगे. टैनरियों का कच्चा माल मुख्यतः बूचड़खानों से ही आता है."

चमड़ा उद्योग

वे कहते हैं, "जब किसी जानवर के चमड़े पर किसी टैनरी में काम होता है तो उस टैनरी के साथ-साथ 92 अन्य उद्योगों को भी काम मिलता है जैसे रसायन या डाई उद्योग."

सिद्दिकी ने बताया, "उत्तर प्रदेश में करीब 9,500 करोड़ रुपए का चमड़ा और चमड़े से बना सामान सालाना तैयार होता है. चमड़ा उद्योग से करीब 5.5 लाख लोग जुड़े हैं. अगर बूचड़खाने बंद ही रहे तो चमड़ा कारोबार भी ठप होगा और लोग भी बेरोज़गार होंगे."

सिद्दीकी के कहा, "अगर ये मान लें की एक टैनरी कर्मचारी के परिवार में चार सदस्य हैं तो कितने लोग प्रभावित होंगे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है."

वे कहते हैं की चमड़ा उद्योग में 40 प्रतिशत चमड़ा बड़े, लाइसेंस प्राप्त बूचड़खानों से आता है. 40 प्रतिशत छोटे बूचड़खानों और ग्रामीण इलाकों से आता हैं. शेष 20 प्रतिशत उन जानवरों से प्राप्त होता है जिनकी मौत उम्र या किसी बीमारी के कारण हो जाती है.

गाय का चमड़ा

सिद्दीकी कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर भैंस के चमड़े का काम होता है. कुछ कारखानों में गाय के चमड़े का काम भी होता है जो अमरीका, यूरोप और अफ्रीका से आयात किया जाता है."

उनके अनुसार यूरोप के देशों में भैंस के चमड़े की अच्छी मांग कम दाम की वजह से है.

वे कहते हैं, "ये सोचना ग़लत है कि चमड़े के काम में सिर्फ़ मुसलमान ही हैं. इस कारोबार में करीब 15 प्रतिशत लोग अगड़ी जातियों के हिंदू हैं, 55 प्रतिशत दलित, 30 प्रतिशत मुसलमान हैं. इस उद्योग में ज़्यादा संख्या तो हिंदुओं की है."

सिद्दीकी को डर है कि बूचड़खाने और चमड़ा उद्योग बंद हो गए तो प्रदेश में कानून-व्यवस्था की एक बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है.

कच्चा माल

कुछ ही कारोबारी हैं जो आयातित चमड़े पर काम करते हैं. सिद्दीकी का कहना है, "अगर बूचड़खाने बंद रहे तो हर टैनरी का मालिक चमड़ा आयात नहीं करा सकता है. वो बहुत महंगा पड़ेगा."

स्मॉल टैनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हाफ़िज़-उर-रहमान कहते हैं, "हमारे संस्थान से करीब 350 कारोबारी जुड़े हैं. इसके अलावा कानपुर में करीब 50 ऐसी और टैनरियां होंगी जो बहुत बड़े स्तर की हैं."

वे कहते हैं, "अभी टैनरियों में काम नहीं रुका है क्योंकि कच्चा माल थोड़ा-बहुत स्टॉक में है. पर अगर बूचड़खाने बंद ही रहे तो टैनरियां भी धीरे-धीरे बंद होने लगेंगी."

रहमान कहते हैं, "कच्चे माल के लिए चमड़ा उद्योग पूरी तरह से बूचड़खानों पर ही निर्भर है. अगर बूचड़खाने नहीं खुले तो चमड़ा उद्योग पूरी तरह से ठप हो जाएगा और लोगों के सामने भूखे मारने की नौबत आ जाएगी."

उन्होंने कहा, "सवाल ये नहीं है कि असर कितना पड़ेगा. चमड़ा उद्योग पूरी तरह से बंद हो जाएगा."

इमरान सिद्दीकी कहते हैं, "हम नए मुख्यमंत्री से मिलेंगे. उनके सामने अपनी बात रखेंगे. अगर फिर भी कुछ नहीं होता है तो न्यायालय जाएंगे."

कानपुर के सीसामऊ विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक इरफ़ान सोलंकी खुद एक टैनरी मालिक हैं.

वो कहते हैं, "हम नए मुख्यमंत्री से बात करेंगे और अपनी परेशानी उन्हें बताएंगे."

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