गांधी का साबरमती आश्रम: 1200 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट का गांधीवादी क्यों कर रहे हैं विरोध

    • Author, तेजस वैद्य
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

अहमदाबाद के प्रसिद्ध गांधी आश्रम का नवीनीकरण 1200 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है. नवीनीकरण की इस परियोजना को लेकर विवाद पैदा होते हुए दिख रहा है. कुछ गांधीवादी नाराज़ हैं.

करीब 130 कार्यकर्ताओं और गांधीवादियों ने इसके विरोध में पत्र लिखा है. विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि इतने बड़े खर्च के साथ इस प्रोजेक्ट पर अमल करने से गांधीजी की सादगी खत्म हो जाएगी और ये योजना गांधीवादी सोच के विरुद्ध है.

चिट्ठी में ऐसी चिंता व्यक्त की गई है कि परियोजना की वजह से गांधीजी का सबसे महत्वपूर्ण स्मारक और स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियां धूमधाम और व्यावसायीकरण में हमेशा के लिए खो जाएंगी.

अहमदाबाद में 'साबरमती आश्रम प्रिज़र्वेशन एंड मेमोरियल ट्रस्ट' की चेयरपर्सन इलाबेन भट्ट ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "हम गांधीवादी मूल्यों को जोखिम में डाल कर कुछ भी नहीं करेंगे. सरकार ने लिखित में आश्वासन दिया है कि इनका सरकारीकरण नहीं होगा. गांधी आश्रम की पवित्रता, सादगी और गांधी विचार के तत्व संभाल कर रखे जाएंगे."

"इन सब का ख्याल करके, सरकार के साथ सलाह-मशविरे के बाद इस बात पर सहमति बनी है कि आश्रम में सभी की सहमति से ही कोई बदलाव किया जाएगा. सरकार के पत्र में भी ये बात बताई गई है."

सरकार की भूमिका

साबरमती आश्रम गांधीजी की सादगी के लिए जाना जाता है. ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि इस परिसर को करोड़ो रुपये खर्च करके सजाया गया तो सादगी नहीं रहेगी.

इसके जवाब में इलाबेन भट्ट कहती हैं, "हम ऐसा नहीं कह सकते. सरकार भी लोगों द्वारा चुनी जाती है, हमारा ही हिस्सा है. जनता, विजिटर्स और सरकार हर किसी का कर्तव्य है कि जो कुछ भी अभी है, उसे बनाए रखा जाए."

गांधीजी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने बीबीसी को बताया, "लोगों ने लोकतांत्रिक तरीके से ही हिटलर को चुना था, तो क्या उसने जो किया, उसके साथ सहमत हो जाना चाहिए? लोकतंत्र में असहमति बहुत महत्वपूर्ण है. एक बार सहमति दे दी, इस का मतलब ये नहीं है कि हमेशा के लिए सहमति दे दी."

तुषार गांधी ने ये भी आरोप लगाया कि "गांधी स्मारक निधि की स्थापना के समय जो सिद्धांत तैयार किए गए थे, वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि आश्रम या स्मारक के किसी भी काम में सीधे तौर पर सरकार शामिल नहीं होगी. यह भी लिखा था कि सरकार से पैसे मत लो."

"साथ ही लिखा गया है कि अगर सरकार से पैसा लेना जरूरी है तो सरकार की भूमिका सिर्फ पैसे देने तक ही सीमित होनी चाहिए. कोई भी कार्य ट्रस्ट की इच्छा से होना चाहिए. सरकार सिर्फ फंड प्रदान करे और बाकी कार्य से अलग रहे."

'सरकार की मानसिकता मेगलमेनिएक'

गुजराती साहित्य परिषद के अध्यक्ष प्रकाश शाह बीबीसी से बातचीत में कहते है, "मौजूदा सरकार का रवैया मेगलमेनिएक (भव्यता के प्रति आकर्षित) है. आश्रम के संदर्भ से देखें तो मेगलमेनिएक की थोड़ी सी भी अभिव्यक्ति गांधी की सोच के विपरीत है."

"सरदार पटेल की प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बड़ी लागत से बनाई गई है. वल्लभभाई पटेल होते तो खुद इसे स्वीकार नहीं करते. अब आश्रम को वर्ल्ड क्लास बनाने की बात चल रही है. मूलतः इस चर्चा को मैं एक नागरिक के रूप देखता हूं."

"मुझे लगता है कि गांधी और गांधी आश्रम की विशेषता उनका गैर-सरकारी होना है. लेकिन सरकार से 'क्रिटिकल डिस्टेंस' रखने के लिए गांधीजी का स्वाभाविक आग्रह था. आज की सरकार सब कुछ छीनना चाहती है, अपने कब्ज़े में कर लेना चाहती है."

'केंद्र सरकार सेंट्रल विस्टा बनाए, आश्रम का नवीनीकरण उनका काम नहीं है'

सरकार ने आश्रम के नवीनीकरण के लिए गवर्निंग काउंसिल बनाई है, जिसमें राज्यसभा सांसद नरहरि अमीन भी सदस्य के रूप में शामिल हैं.

बीबीसी से बात करते हुए अमीन ने कहा, "ऐसी कोई बात नहीं है. इस प्रोजेक्ट को गांधीवादी मूल्यों को नजर में रख कर अंजाम दिया जाना है. प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य दुनिया के लोगों को यहां आकर्षित करना है, ताकि शांति के संदेश का प्रचार हो सके. कोई बड़ी इमारत या फाइव स्टार होटल नहीं बनाया जा रहा है. गांधीवादी मूल्यों से जुड़ी सभी गतिविधियों जारी रहेंगी."

लेकिन दुनिया के लोग तो आते ही हैं, अमेरिका के बराक ओबामा हों या डोनाल्ड ट्रंप या दुनिया के अन्य नेता, सालों से आश्रम आते रहे हैं.

इस मुद्दे पर नरहरि अमीन कहते हैं, "हां, आ रहे है, लेकिन अगर कोई अच्छा कार्य हो रहा हो तो उसका विरोध करने की क्या जरूरत है? गांधी की विचारधारा पूरे विश्व में फैले, यही उद्देश्य है. अभी आश्रम के आसपास गैरकानूनी इमारतें बन गई हैं, होटल और छोटीमोटी दुकानें बनी हैं."

आश्रम की सादगी और पवित्रता

प्रकाश शाह कहते हैं, "आश्रम का नवीनीकरण कहिए या आश्रम का गौरव, प्रोजेक्ट के बारे में जनता को बताया गया हो, सार्वजनिक सुझाव या चर्चा हुई हो, एसी जानकारी नहीं है. ये ठीक है कि सरकार दिल्ली में सेंट्रल विस्टा बना ले, लेकिन गांधी आश्रम लोगों की अपनी जगह है."

"आश्रम के ट्रस्टियों को ये मुद्दा समझना चाहिए कि सवाल इस आश्रम के ट्रस्टियों और सरकार तक सीमित नहीं है. भारत के लोगों का इससे सीधा संबंध है. आश्रम की सादगी और पवित्रता बनी रहेगी, अगर ऐसा दावा किया जा रहा है तो फिर इसका पूरा ब्लूप्रिंट जनता के सामने पेश करना चाहिए."

तुषार गांधी और प्रकाश शाह दोनों इस बात से सहमत हैं कि सरकार सब को बताए कि वह क्या करना चाहती है. उसे रहस्य बनाकर नहीं रखना चाहिए.

इस पर नरहरि अमीन कहते है, "इसमें कोई रहस्य नहीं है. प्रोजेक्ट अभी प्लानिंग स्टेज में है, फाइनल नहीं हुआ है. 55 एकड़ जमीन के लिए कार्रवाई की जा रही है. छह अलग-अलग ट्रस्ट हैं, उनके साथ बातचीत हो रही है."

'ट्रस्टियों ने कलाई काटकर सरकार को दे दिया'

'गांधी से जुड़े संस्थानों पर सरकारी कब्ज़ा रोको', इस नारे के साथ 130 कार्यकर्ताओं ने एक 'लेटर कैंपेन' शरू किया है. रामचंद्र गुहा, राजमोहन गांधी, नयनतारा सहगल, आनंद पटवर्धन, गणेश देवी, प्रकाश शाह इस कैंपेन में शामिल हैं.

पत्र में कहा गया है, "वर्तमान सरकार 1949 से बने शांतिपूर्ण और व्यवस्थित वातावरण की जगह 54 एकड़ ज़मीन पर 'वर्ल्ड क्लास' पर्यटन स्थल बनाना चाहती है. इसके लिए 1200 करोड़ रुपये का 'गांधी आश्रम मेमोरियल एंड प्रिसिंक्ट डेवेलपमेंट प्रोजेक्ट' तैयार किया गया है."

"अख़बारों की ख़बरो के अनुसार प्रस्तावित 'वर्ल्ड क्लास' मेमोरियल में नए संग्रहालय, एक एम्फी थिएटर, वीआईपी लाउंज, दुकानें, फूड कोर्ट इत्यादी होंगे. ख़बरों में कहा गया है कि ये प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की प्रत्यक्ष निगरानी में होगा."

"ये कदम देश की सभी गांधीवादी संस्थानों के व्यापारीकरण करने की मौजूदा सरकार की रणनीति के अनुरूप है. इसका सबसे बुरा उदाहरण सेवाग्राम में मिलता है. हालांकि सभी गांधीवादी आर्काइव्स पर सरकार का नियंत्रण सबसे चिंताजनक है."

"जिन तत्वों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी, वो विचारधारा अभी भी भारत की सत्ता बैठे कई लोगों को प्रेरित करती आई है. इस जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है."

'वर्ल्ड क्लास' बनाने की आवश्यकता

चिट्ठी में आरोप लगाया गया है कि गांधी आश्रम के नवीनीकरण से आश्रम की सादगी और गांधीवादी मूल्यों का संदेश नष्ट हो जाएगा.

पत्र में आगे लिखा गया है कि "1200 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट से आश्रम की सादगी ख़त्म हो जाएगी. साबरमती आश्रम में हर साल लाखों भारतीय, खासकर स्कूली बच्चे और विदेशी प्रवासी आते हैं."

"पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए इसको 'वर्ल्ड क्लास' बनाने की आवश्यकता नहीं है. गांधी प्रभाव और जगह का महत्त्व और सादगी ही काफी है. आश्रम का हृदय कुंज, अन्य ऐतिहासिक इमारतें, और मौजूदा संग्रहालय ऐसे ही रखे जाएंगे, फिर भी वे केंद्र में नहीं रहेंगे."

"नए म्यूज़ियम, एम्फी थिएटर, फूड कोर्ट, दुकानें बनेंगी और ये सब कोने में धकेल दिए जाएंगे. 'गांधी थीम पार्क' बनाने की बात की गई है और सबसे बुरी बात ये है कि गांधी की 'दूसरी हत्या' की कल्पना की गई है."

"यदि ये प्रोजेक्ट बना तो गांधी का सबसे आधिकारिक स्मारक और हमारा स्वतंत्रता संग्राम हमेशा के लिए धूमधड़ाके और व्यापारीकरण में खो जाएगा."

'मोदी भी गुजराती और गांधीजी भी गुजराती'

प्रस्तावित प्रोजेक्ट को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर नरहरि अमीन कहते हैं, "गांधी आश्रम से जुड़ी गतिविधियां चलती रहेंगी. 1200 करोड़ रुपये सड़क, रोशनी, पार्किंग की सुविधा आदि बनाने के लिए हैं. एक बगीचा बनाना है."

"होटल, रेस्तरां या वैभवशाली इमारतों का कोई सवाल ही नहीं है. सादगी बरकरार रहेगी. आश्रम परिसर के आसपास के लोगों को नए घर के साथ मुआवजा दिया जाना है. इस पर कुल 1,200 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है."

"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजराती हैं. गांधीजी भी गुजराती थे. गुजराती होने के नाते नरेंद्र मोदी के लिए गांधीजी का बहुत महत्व है. इसलिए ये प्रोजेक्ट है."

130 लोगों को इसी चिट्ठी के बाद 'आश्रम प्रिजर्वेशन एंड मेमोरियल ट्रस्ट' ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की. इसमें बताया गया है कि "ट्रस्टी ये सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि ये स्थान सालों से नैतिकता और मूल्यों का सम्मान करता आया है."

"उसे संरक्षित रखा जाए और सुविधाएं बढ़ाई जाएं. इसका मतलब है कि आश्रम हमेशा गांधीजी के आदर्श और संदेश बरकरार रखेगा. इसके साथ जुड़े तमाम लोग और ट्रस्टियों के संपर्क में रहे अधिकारी, सब लोग इस मूल्य से परिचित हैं, ऐसा हम समझते हैं."

ट्रस्टियों और सरकार से सवाल

तुषार गांधी का मानना है कि ट्रस्टियों ने ये बयान देकर अपनी कलाई खुद ही काट ली है.

पत्र लिखने वालों में शामिल प्रकाश शाह ने बीबीसी को बताया, "मैं चाहता हूं कि पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों के साथ सरकार की बातचीत हो. अभी देर नहीं हुई है. सरकार और ट्रस्टियों के बीच हुए समझौते का विवरण भी दिया जाना चाहिए."

"उसमें सुधार की गुंजाइश है. ऐसी बात होनी चाहिए. पत्र लिखनेवाले आश्रम के विरोधियों का कोई मोर्चा नहीं हैं. ये गांधी और उनके आश्रम के प्रति लगाव रखने वाले लोगों की चिंताएं हैं. इसे व्यापक सलाह-मशविरे के जरिये दूर करना चाहिए."

इलाबेन और आश्रम के ट्रस्टियों ने ये भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि आश्रम की सादगी बरकरार रहेगी लेकिन प्रकाश शाह का कहना है कि ''इलाबेन कह तो रही हैं अच्छी बात लेकिन ये प्रक्रिया से होना चाहिए.''

तुषार गांधी ट्रस्टियों और सरकार से सवाल करते हैं, "अगर आप आश्रम का हित देखना चाहते हैं तो प्रस्तावित प्रोजेक्ट का ब्लूप्रिंट लेकर लोगों के बीच क्यों नहीं आ जाते? लोगों की सहमति से ही काम होगा."

'गोडसे मंदिर बनाने वाले गांधी आश्रम की चिंता करने लगे तो संशय होगा'

एक चर्चा ये हो रही है कि गांधी आश्रम परिवर्तन के बाद नया, दिव्य और आकर्षक लगेगा तो इसे भाजपा शासन की उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाएगा.

इलाबेन कहती हैं, "कई तरह की आशंकाएं सामने आती रहेंगी लेकिन हम श्रद्धा और विश्वास के साथ काम करते हैं. पक्ष-विपक्ष रहेंगे, लेकिन पार्टी पॉलिटिक्स का दबाव नहीं है."

अहमदाबाद के गांधीवादी मनीषी जानी कहते हैं, "गोडसे मंदिर बनाने वाले गांधी आश्रम की चिंता करने लगेंगे, तो संदेह होगा. यह फासीवादी सरकार है, सभी संस्थाओं को नष्ट कर रही है. स्वायत्तता नष्ट कर रही है."

"इतिहास कहता है कि हमेशा अपने से एक अलग तरह के इतिहास को मिटाने की कोशिश होती है. आश्रम का नवीनीकरण इतिहास मिटाने की प्रक्रिया का हिस्सा है. इसलिए भी हम इसका विरोध करते हैं."

"सरकार संस्था को अपने हाथ में लेना चाहती है तो ट्रस्टियों को इसका विरोध करना चाहिए. ट्रस्टी मालिक नहीं, संरक्षक हैं. संरक्षण करना उनका कर्तव्य है. गांधीजी होते तो वे आश्रम के नवीनीकरण के ख़िलाफ लड़ने के लिए निकल पड़ते."

"गांधीजी क्या ट्रस्टियों की तरह चुप रहते? यही प्रश्न ट्रस्टियों को स्वयं से पूछना चाहिए. ट्रस्टियों को सत्याग्रह का विचार आना चाहिए."

ट्रस्टियों की आलोचना के बारे में पूछे जाने पर इलाबेन ने कहा, "आलोचना हो सकती है. सार्वजनिक जीवन में ये कोई नया अनुभव नहीं है. आश्रम के मूल्यों की हानि होने पर हम सत्याग्रह करने से नहीं डरते."

"मुझे अहमदाबाद और अन्य लोगों का समर्थन दिखाई देता है. अगर कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं तो तो लोकतंत्र में ऐसा कहना जायज़ है. हम हमेशा सब कुछ निगेटिव ही क्यों लेते हैं?"

'आश्रम निवासी परिसर खाली करेंगे तो उस ज़मीन का मालिक कौन होगा?'

'साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन एंड मेमोरियल ट्रस्ट' में छह ट्रस्टी हैं. कार्तिकेय साराभाई, सुदर्शन अयंगर, नितिन शुक्ल, अशोक चटर्जी, अमृत मोदी और इलाबेन भट्ट. गांधी प्रेमी और गांधीजी के वंशज इन ट्रस्टियों के रवैये पर सवाल उठा रहे हैं.

तुषार गांधी ने कहा, "ट्रस्टियों के बयान में कायरता दिखती है. अगर ट्रस्टी कुछ नहीं कर सकते तो बेहतर है इस्तीफा दे दें. कबूल कर लें कि वे जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर सकते हैं. आश्रम परिसर में पीढ़ियों से रहने वाले परिवारों को पैसे देकर हटाया जा रहा है."

"मुद्दा ये है कि बाद में इस जगह का स्वामित्व किसके पास रहेगा. अभी हरिजन सेवक संघ के हाथ में है. सरकार पैसे देकर जो ज़मीन खाली करवाएगी, उस जमीन का मालिक कौन होगा? इस बारे न तो बताया गया है और ना ही ट्रस्टी जवाब मांग रहे हैं."

गांधी आश्रम की झोपड़ी का क्या होगा?

मनीषी जानी का मानना है कि गांधी आश्रम का नवीनीकरण उसे आम आदमी से दूर ले जाने की प्रक्रिया है.

वे कहते हैं, "गांधी आश्रम में आप सादगी की भावना महसूस करेंगे. इसके चारों ओर महल खड़ा करेंगे, ये क्या बात हुई. ये स्थिति मान्य नहीं होनी चाहिए. अभी अगर आप गांधी आश्रम से गुजर रहे हों और अंदर जाना हो तो ये बहुत आसान है."

"कोई टिकट नहीं, कोई सुरक्षा नहीं. आप तुरंत अंदर जा सकते हैं. कोई बंधन नहीं. जब टिकट आती है, तो बंधन आ जाता है. खादी फिर बुटीक बन जाएगी."

ये भी महत्वपूर्ण है कि मानव जाति के इतिहास में दस सबसे महत्वपूर्ण मार्च में दांडी मार्च शामिल है, जो गांधी आश्रम से निकली थी.

मनीषी जानी कहते हैं, "वर्ल्ड क्लास टूरिज़्म की बातों से सत्याग्रह शब्द की गरिमा धूमिल होती है. इसके खिलाफ भी आपत्ति है. आसपास आडंबर खडा होगा तो सादगी और पवित्रता कैसे बरकरार रह सकती है? आसपास महलों के बीच एक झोपड़ी लगाने जैसा यह है. झोपड़ी फंस जाती है, उलझ जाती है."

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ 'साबरमती आश्रम प्रिजर्वेशन एंड मेमोरियल ट्रस्ट' के पास नवीनीकरण के बाद पांच एकड़ से बढ़कर 53 एकड़ जमीन होगी. आसपास 177 इमारतें हैं. इसमें से 65 कैंपस इसमें आ जाएंगी.

गहलोत की चिट्ठी

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक चिट्ठी ट्विटर पर पोस्ट की है.

उन्होंने लिखा है, "गांधी आश्रम की पवित्रता और गौरव को नष्ट करना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले पर पुनर्विचार करे और ऐतिहासिक आश्रम को जस का तस रखना चाहिए. साबरमती आश्रम को नष्ट करने और इसे संग्रहालय में बदलने का गुजरात सरकार का फैसला चौंकाने वाला है. गांधीजी ने अपने जीवन के 13 साल उस आश्रम में बिताए थे."

"लोग यह पवित्र स्थल आकर देख सकते हैं कि गांधीजी कितने सादगीपूर्ण तरीके से जीते थे. साबरमती आश्रम अपने सद्भाव और भाईचारे की भावना के लिए जाना जाता है. देश और विदेश से लोग गांधी आश्रम को देखने आते हैं, तो वे कोई वर्ल्ड क्लास इमारत देखने नहीं आते हैं. लोग उस स्थान की सादगी और आदर्श की सराहना करते हैं."

"इसलिए उस स्थान को आश्रम कहा जाता है, न की म्यूज़ियम. ये निर्णय राजनीति से प्रेरित है. इतिहास में ये कृत्य निर्मम कार्यों में गिना जाएगा. विरासत को नुक़सान पहुंचाने वालों को आनेवाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी."

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