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सुकीरथरणी: तमिल कवयित्री ने बताया, क्यों नहीं लिया अदानी प्रायोजित पुरस्कार
- Author, दिव्या जयराज
- पदनाम, बीबीसी तमिल
तमिल कवयित्री सुकीरथरणी ने पिछले दिनों न्यू इंडियन एक्सप्रेस समूह की ओर से दिए जाने वाले देवी सम्मान को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. उन्होंने अपने इनकार की वजह अदानी समूह का सम्मान समारोह का मुख्य प्रायोजक होना बताया है.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस समूह देश भर में उल्लेखनीय काम करने वाली महिलाओं को हर साल 'देवी सम्मान' से सम्मानित करता है.
इस साल जिन 12 महिला शख़्सियतों को सम्मान के लिए चुना गया था, उनमें तमिलनाडु की कवयित्री सुकीरथरणी भी शामिल थीं. इन्हें साहित्य, ख़ासकर दलित साहित्य में योगदान के लिए ये सम्मान देने का फ़ैसला किया गया था.
लेकिन कवयित्री ने सम्मान लेने से पहले ही सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इसे स्वीकार ना करने की घोषणा कर दी.
उन्होंने अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा, "अदानी समूह इस सम्मान समारोह का मुख्य प्रायोजक है. मेरी दिलचस्पी ऐसे किसी सम्मान में नहीं है जिसको अदानी समूह की वित्तीय मदद मिल रही हो. मैं इस मुद्दे पर बोलती रही हूं, इसलिए मैं सम्मान लेने से इनकार कर रही हूं."
सुकीरथरणी तमिल साहित्य में बीते 25 सालों से सक्रिय हैं. इन्होंने महिला अधिकार और समाज के दबे-कुचले लोगों की आवाज़ को उठाया है. यही वजह है कि सम्मान लेने से इनकार करने के उनके फ़ैसले को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा मिली.
सुकीरथरणी ने इस पूरे मामले पर बीबीसी तमिल से ख़ास बातचीत की.
बीबीसी तमिल ने उनसे पूछा कि, 'सम्मान मिलने की जानकारी आपको कब मिली थी और समारोह से महज़ एक सप्ताह पहले आपने इसे नहीं लेने का फ़ैसला क्यों किया?'
इस सवाल के जवाब में सुकीरथरणी ने बताया, "बचपन से ही पेरियार, आंबेडकर और मार्क्स के विचारों से प्रेरित रही हूं. इनके दर्शन का मुझ पर असर रहा है. मेरे लेखन में भी इन तीनों के विचार ज़ाहिर होते हैं. मुझे न्यू इंडियन एक्सप्रेस समूह से 23 दिसंबर को जानकारी मिली थी कि देवी सम्मान के लिए मुझे चुना गया है. इसके बाद उन्होंने मुझे आधिकारिक मेल भेजा था."
सम्मान को पहले दी थी स्वीकृति
सुकीरथरणी ने बातचीत में आगे बताया, "शुरुआत में मैं बहुत ख़ुश थी. हालांकि नास्तिक होने की वजह से मैं देवी के नाम पर मिलने वाले सम्मान को लेने से हिचक भी रही थी. लेकिन लोगों ने मुझे बताया कि ये महिला शक्ति का सम्मान है. इसके बाद मैंने 28 दिसंबर को उन्हें सम्मान लेने की स्वीकृति दे दी."
इसके बाद ऐसा क्या हुआ कि सम्मान नहीं लेने की घोषणा करनी पड़ी?
इस बारे में लेखिका ने बताया, "मेरी स्वीकृति के बाद हिंडनबर्ग की रिपोर्ट सामने आयी. यह सम्मान समारोह आठ फ़रवरी को होना था. न्यू इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने इसको लेकर प्रोमो वीडियो चलाने, पोस्ट करने शुरू किए. तीन फ़रवरी को मैंने वीडियो देखा तो उस पर अदानी समूह का लोगो था."
सम्मान के साथ अदानी के जुड़ाव पर सुकीरथरणी को हैरानी हुई.
वो बताती हैं "मैंने न्यू इंडियन एक्सप्रेस समूह से पूछा कि इस इवेंट में अदानी समूह की क्या भूमिका है, उन्होंने बताया कि वो मुख्य प्रायोजक है. इसके बाद मैंने यह सम्मान नहीं लेने का फ़ैसला लिया. मेरा मानना है कि किसी भी स्तर पर हमें अपने सिद्धांतों और विचारधारा से समझौता नहीं करना चाहिए. मैं जिस तरह की राजनीति और सिद्धांतों की बात करती हूं, उसमें ऐसा कोई सम्मान नहीं लेना चाहिए जिसमें अदानी जैसे समहू का पैसा जुड़ा हुआ हो. वे भी इस बात को समझ गए."
तो क्या हिंडनबर्ग की पड़ताल, सम्मान नहीं लेने की वजह बनी या कोई और बात है?
इस सवाल के जवाब में सुकीरथरणी ने बताया, "अदानी समूह के कामकाज पर हिंडनबर्ग ने कुछ गंभीर आरोप लगाए थे. ऐसे आरोपों को देखते हुए कंपनी की आलोचना भी हो रही है. मैं भी भ्रष्टाचार और सावर्जनिक संपत्ति के इस्तेमाल पर काफ़ी कुछ लिखती रही हूं."
कवयित्री ने इस बात पर ज़ोर देकर कहा, "ऐसे में मैं यह सम्मान कैसे ले सकती थी. यह सही नहीं होता. यह केवल अदानी समूह की बात नहीं है, कोई दूसरी कंपनी भी होती तो मैं इनकार कर देती. सभी मल्टीनेशनल कंपनियां अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा सीएसआर में ख़र्च करती हैं.
ग्रामीण इलाकों में कई स्कूल उन पैसों से चलते हैं. हमलोग भी इन सबसे इनकार नहीं करते हैं. लेकिन भ्रष्टाचार का मामला सामने आने के बाद उस आयोजन में शामिल होना सही नहीं था."
'इनकार करने में परेशानी नहीं हुई'
सम्मान नहीं लेने के बाद किसी तरह के अफ़सोस का भाव तो नहीं आया है?
ये पूछे जाने पर सुकीरथरणी ने कहा, "बिल्कुल नहीं, यह एक स्पष्ट फ़ैसला था. तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन, दलित और आंबेडकर आंदोलनों का कहीं ज़्यादा असर है. उसकी लंबी विरासत है. यह विरासत भी ऐसे फ़ैसलों को बल देती है. मेरा लेखन सम्मान के लिए नहीं है, बल्कि लोगों के लिए है. लोग उसे पढ़ते हैं, मेरे लिए यही बहुत है."
लेकिन पुरस्कार लौटाने का फ़ैसला उन्होंने लाइम लाइट में आने के लिए तो नहीं लिया?
इस पर सुकीरथरणी ने बताया, "ऐसा बिल्कुल नहीं है. विश्व प्रसिद्ध पब्लिकेशन 'वेरसो बुक्स' ने विश्व साहित्य में बीते चार हज़ार साल की प्रभावी महिला लेखकों की एक सूची बनायी है. मेरा नाम उसकी शीर्ष 200 लेखिकाओं में शामिल है. मेरी रचनाओं का अनुवाद कन्नड़, मलयालम, तेलुगू, गुजराती, मराठी, हिंदी, अंग्रेज़ी, मलेशियन और जर्मन तक में हो चुका है. पुरस्कार लेने से इनकार करने से लाइमलाइट हासिल होगा, ये मैंने सोचा भी नहीं था."
सुकीरथरणी ने भले सोचा ना हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि पुरस्कार नहीं लेने की घोषणा के बाद तमिल साहित्य जगत से ही नहीं बल्कि देश भर के साहित्यक गलियारे से उनके पास लोगों के फ़ोन आए हैं.
सुकीरथरणी ने बताया कि 'सिद्धांत और विचारधारा को अगर सही समय पर अभिव्यक्त किया जाए तो सामाजिक तौर पर लोगों को जागरूक बनाने में भी मदद मिलती है.'
साहित्य में योगदान
सुकीरथरणी तमिलनाडु के रानीपेट ज़िले के लालापेट में गवर्नमेंट गर्ल्स हाईस्कूल में शिक्षिका भी हैं. तमिल साहित्य के अलावा अर्थशास्त्र में भी उन्होंने मास्टर की डिग्री हासिल की है.
अब तक उनके छह कविता संग्रह आ चुके हैं. काइपट्टी येन कनवु केल, इरावु मिरुगम, कामत्तिपू, थीनदापदाथा मुथम, अवलई मोजिपेयार्थल और इप्पडिक्कु येवल.
उनकी कई कविताएं तमिलनाडु के कॉलेज पाठ्यक्रम में शामिल हैं.
उनके लेखन में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के साथ-साथ स्त्री देह पर भी बात की गई है. उनके मुताबिक़ देह की वजह से भी महिलाएं हिंसा का शिकार होती हैं और यह दलित महिलाओं के साथ ज़्यादा होता है.
उधर, न्यू इंडियन एक्सप्रेस समूह का पुरस्कार समारोह 8 फ़रवरी को चेन्नई के आईटीसी ग्रैंड चोल होटल में आयोजित किया गया जिसमें वैज्ञानिक गगनदीप कांग, भरतनाट्यम नृत्यांगना प्रियदर्शिनी गोविंद, समाज सेविका राधिका संथानकृष्णा और स्क्वॉश खिलाड़ी जोशना चिनप्पा सहित 11 महिलाओं को सम्मानित किया गया.
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